असहमति लोकतंत्र की शक्ति, लेकिन निजी वैमनस्य और चरित्र हनन से कमजोर हो रही राजनीतिक संस्कृति
ज्ञान चंद पाटनी

भारतीय राजनीति में असहमति कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से ही विचारधाराओं, नीतियों और नेतृत्व को लेकर तीखे मतभेद रहे हैं। संसद में बहसें हुईं, सड़कों पर आंदोलन हुए, सरकारों की आलोचना हुई और विपक्ष ने सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा किया। इन सबके बीच लोकतंत्र की एक बुनियादी मर्यादा बनी रही—राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने से बचा जाए।
वर्तमान दौर में यही मर्यादा धीरे-धीरे टूटती दिखाई दे रही है। राजनीतिक मतभेद अब केवल नीतियों और विचारों तक सीमित नहीं हैं। विरोधी नेता को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के बजाय शत्रु समझने की भावना गहरी हो रही है। भाषा अधिक आक्रामक और आरोप व्यक्तिगत होते जा रहे हैं। राजनीतिक संघर्ष में मानवीय संवेदनशीलता के लिए जगह लगातार सिमट रही है। यह स्थिति केवल राजनीति नहीं, भारतीय लोकतंत्र के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
आशीष बनर्जी की मृत्यु ने उठाए सवाल
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तृणमूल कांग्रेस के पांच बार के विधायक, पूर्व मंत्री एवं विधानसभा के पूर्व उपसभापति आशीष बनर्जी की रहस्यमय मृत्यु ने इस व्यापक प्रश्न को एक बार फिर सामने ला दिया है। उनका शव रामपुरहाट स्थित पार्टी कार्यालय से मिला था। पुलिस को मौके से कथित सुसाइड नोट भी प्राप्त हुआ है और मामले की जांच जारी है।
बताया गया है कि कथित पत्र में उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर, भ्रष्टाचार के आरोपों और बदनाम किए जाने के प्रयासों का उल्लेख किया। राजनीति में आने को गलती बताते हुए उन्होंने परिवार के युवाओं को राजनीति से दूर रहने की सलाह भी दी।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर दावा किया कि चुनावी पराजय के बाद आशीष बनर्जी को उत्पीड़न और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है। इसलिए किसी राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। फिर भी यह घटना राजनीति में बढ़ती कटुता और उसके मानवीय मूल्य पर गंभीरता से विचार करने को विवश करती है। आशीष बनर्जी की मृत्यु और पुलिस जांच से जुड़ी प्रारंभिक जानकारियां भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आई हैं।
असहमति के बिना लोकतंत्र अधूरा
लोकतंत्र की बुनियाद ही असहमति पर टिकी है। यदि सभी लोग एक ही विचार रखें, सरकार के प्रत्येक निर्णय से सहमत हों और विपक्ष की कोई प्रभावी भूमिका न हो तो लोकतंत्र का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति होता है।
समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक दल संगठित गिरोहों की तरह काम करने लगते हैं, जिनका लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्त करना, अपने लोगों को बचाना और प्रतिद्वंद्वी दल के नेताओं को कानूनी एवं राजनीतिक उलझनों में फंसाकर चुनौती देने योग्य न छोड़ना हो।
किसी नेता द्वारा नीति का विरोध किए जाने पर उसका उत्तर तर्क से दिया जाना चाहिए। विपक्ष सवाल उठाए तो सरकार को तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। इसी तरह विपक्ष को भी विरोध करते समय संवैधानिक मर्यादा और शालीनता का ध्यान रखना चाहिए। राजनीतिक बहस जब व्यक्तिगत आरोपों, चरित्र हनन और अपमान में बदल जाती है तो लोकतंत्र शर्मसार होता है।
जांच निष्पक्ष हो, आरोप राजनीतिक हथियार न बनें
भ्रष्टाचार का खात्मा जरूरी है। भ्रष्टाचार के ठोस आरोपों की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच एजेंसियों और कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए होने लगे अथवा विपक्ष सत्ता पक्ष को बदनाम करने के लिए तथ्यहीन आरोप गढ़े, तो देश का वातावरण असहज होना स्वाभाविक है।
आज राजनीतिक मंचों से लेकर टेलीविजन बहसों और सोशल मीडिया तक ऐसी भाषा सामान्य होती जा रही है, जिसमें विरोधी को तर्कों के आधार पर गलत सिद्ध करने के बजाय अपमानित किया जाता है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच वैचारिक मतभेद भी व्यक्तिगत वैमनस्य में बदल रहे हैं। कई बार यही कटुता राजनीतिक हिंसा का कारण बन जाती है।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। अधूरी जानकारी, चुनिंदा वीडियो क्लिप और अपुष्ट आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को तुरंत खलनायक घोषित करना आसान हो गया है। तथ्य सामने आने से पहले ही डिजिटल भीड़ अपना फैसला सुना देती है।
चुनावी हार स्थायी दुश्मनी नहीं
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका आवश्यक है। चुनाव में एक पक्ष जीतता है और दूसरा हारता है, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों को उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर मिलकर काम करना होता है। आज का विपक्ष कल सत्ता में आ सकता है और आज का सत्ता पक्ष कल विपक्ष में बैठ सकता है।
इसलिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को स्थायी दुश्मनी में बदलने की प्रवृत्ति अंततः पूरी व्यवस्था को तहस-नहस कर सकती है। राजनीतिक नेता का प्रत्येक वक्तव्य उसके समर्थकों तक पहुंचता है और कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर हजारों प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। समर्थकों की भीड़ कई बार अपने नेता से भी अधिक आक्रामक हो जाती है। विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति को अपमानित करना राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण समझ लिया जाता है। इससे समाज में असहमति स्वीकार करने की लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर होती है।
संस्थाओं की विश्वसनीयता पर असर
राजनीति में बढ़ती शत्रुता का सबसे गंभीर प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ता है। लोकतंत्र केवल नेताओं और राजनीतिक दलों से नहीं चलता। इसके लिए प्रशासन, न्यायपालिका, चुनाव व्यवस्था, जांच एजेंसियों और मीडिया की विश्वसनीयता भी जरूरी है।
जब राजनीतिक संघर्ष अत्यधिक कटु हो जाता है तो प्रत्येक सरकारी कार्रवाई को राजनीतिक बदले की दृष्टि से देखा जाने लगता है। जांच हो तो उसे प्रतिशोध बताया जाता है और जांच न हो तो सरकार पर किसी को बचाने का आरोप लगता है। किसी अधिकारी के निर्णय के पीछे भी राजनीतिक दबाव खोजा जाने लगता है, भले ही उसके प्रमाण उपलब्ध न हों। जनता का विश्वास संस्थाओं की निष्पक्षता से उठने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होना तय है।
संवाद और सम्मान की संस्कृति लौटानी होगी
राजनीतिक दलों का लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं होना चाहिए। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और विश्वसनीयता बनी रहे। सत्ता में रहते हुए विरोधियों के अधिकारों का सम्मान और विपक्ष में रहते हुए संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा रखना परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है, जब वैचारिक रूप से घोर विरोधी नेता भी निजी स्तर पर एक-दूसरे का सम्मान करते थे। संसद में तीखी बहस के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रहते थे। आज फिर उसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा होता है, कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं। इस अंतर को भुला दिया गया तो नुकसान किसी एक नेता या दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होगा।







