भावांतर योजना पर उठाए सवाल, रबी फसलों की एमएसपी वृद्धि से 720 करोड़ रुपये के लाभ के दावे को बताया भ्रामक
रेवाडी, 7 अक्टूबर। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने आरोप लगाया कि अहीरवाल में भावांतर योजना के तहत बाजरा बेचने वाले किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि अभी तक हुई खरीद में बाजरा बेचने वाले करीब 90 प्रतिशत किसानों को भावांतर राशि जोड़ने के बावजूद एमएसपी से 50 से 200 रुपये प्रति क्विंटल तक कम दाम मिल रहे हैं।
विद्रोही ने कहा कि अहीरवाल की मंडियों में बाजरे की खरीद की स्थिति सरकार के उन दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें किसानों को उनकी उपज का पूरा समर्थन मूल्य देने की बात कही जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भावांतर योजना किसानों को घोषित एमएसपी सुनिश्चित करने के बजाय सरकार के लिए प्रत्यक्ष खरीद की जिम्मेदारी से बचने का माध्यम बन रही है। उन्होंने सवाल किया कि यदि सरकार किसानों को समर्थन मूल्य देने के प्रति ईमानदार है तो ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करती, जिसमें प्रत्येक पात्र किसान को उसकी उपज का पूरा घोषित मूल्य मिले?
विद्रोही ने मुख्यमंत्री के प्रदेश में सभी 24 फसलों की एमएसपी पर खरीद संबंधी दावे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार के बयानों और मंडियों की वास्तविक स्थिति में अंतर है। उनके अनुसार, बाजरा किसानों को समर्थन मूल्य से कम दाम मिलना इस बात का उदाहरण है कि सरकारी दावों का लाभ जमीन पर सभी किसानों तक नहीं पहुंच रहा।
एमएसपी वृद्धि और बढ़ती लागत पर सवाल
रबी फसलों की एमएसपी वृद्धि से हरियाणा के किसानों को 720 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ मिलने संबंधी मुख्यमंत्री के बयान को विद्रोही ने भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि हरियाणा की प्रमुख रबी फसल गेहूं है और उनके अनुसार, रबी सत्र 2026-27 के लिए गेहूं के समर्थन मूल्य में 25 रुपये प्रति क्विंटल, यानी लगभग 0.97 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।
विद्रोही ने खाद्य महंगाई दर 5.95 प्रतिशत होने का दावा करते हुए कहा कि इसके मुकाबले गेहूं के समर्थन मूल्य में लगभग एक प्रतिशत की वृद्धि बेहद मामूली है। उन्होंने तर्क दिया कि महंगाई और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए केवल समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी को किसानों की वास्तविक आय में वृद्धि बताना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि किसान की फसल उत्पादन लागत पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़ी है। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि 720 करोड़ रुपये के अतिरिक्त लाभ का आकलन किस आधार पर किया गया है और बढ़ी हुई लागत को उसमें किस तरह शामिल किया गया है। विद्रोही ने सवाल उठाया कि जब समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी खेती की लागत और महंगाई के अनुरूप नहीं है तो इसे किसानों के लिए बड़ी आर्थिक राहत कैसे बताया जा सकता है?
विद्रोही ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रचार के माध्यम से अपनी नीतियों को लाभकारी साबित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि किसानों की स्थिति का आकलन सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि उपज बेचने के बाद उनके हाथ में आने वाली वास्तविक राशि और खेती पर हुए खर्च के आधार पर होना चाहिए।








