सुरक्षा के नाम पर पाबंदियां नहीं, स्वतंत्रता और जवाबदेही चाहिए
विवेक रंजन श्रीवास्तव

वर्ष 2012 के निर्भया कांड की भयावह यादें आज भी देश की चेतना को झकझोरती हैं। महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध यौन हिंसा की घटनाएं बार-बार सवाल उठाती हैं कि आक्रोश, आंदोलनों और आश्वासनों के बावजूद बेटियों को सुरक्षित जीवन का भरोसा क्यों नहीं मिल पाया? शिक्षण संस्थानों से लेकर सड़कों तक उठती विरोध की आवाजें केवल किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं हैं। वे उस व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं, जिसमें सुरक्षा का वादा तो किया जाता है, लेकिन असुरक्षा का बोझ अंततः महिलाओं को ही उठाना पड़ता है।
विरोध प्रदर्शनों में गूंजते तीखे नारों को स्त्री-पुरुष टकराव बताकर खारिज करना आसान है। कठिन है उस पीड़ा और अविश्वास को समझना, जिससे ये स्वर जन्म लेते हैं। यह आक्रोश उस पितृसत्तात्मक सोच के विरुद्ध है, जो महिला की स्वतंत्रता को संदेह की नजर से देखती है और अपराध होने पर भी उसके कपड़ों, समय, स्थान तथा व्यवहार में दोष खोजने लगती है। सवाल यह है कि घर की दहलीज लांघते ही किसी महिला को अपनी सुरक्षा के लिए हर कदम पर भय और आशंका से समझौता क्यों करना पड़े?
पाबंदियों से नहीं मिलेगी सुरक्षा
विडंबना यह है कि किसी घटना के बाद सुधार की पहली मार अक्सर छात्राओं की स्वतंत्रता पर पड़ती है। छात्रावासों में प्रवेश का समय और कठोर कर दिया जाता है, बाहर निकलने पर रोक बढ़ा दी जाती है और सुरक्षा के नाम पर उनकी आवाजाही सीमित कर दी जाती है। ऐसी सोच अपराध की परिस्थितियों को बदलने के बजाय संभावित पीड़िता का दायरा छोटा करती है। इससे बेटियों को संदेश मिलता है कि सुरक्षित रहने की कीमत उन्हें अपनी पढ़ाई, अवसरों और आजादी में कटौती करके चुकानी होगी।
बेटियों की मांग स्पष्ट है—व्यवस्था बदलिए, हमारी स्वतंत्रता पर पहरा मत लगाइए। उन्हें सहमकर जीने की सलाह नहीं, निर्भय होकर आगे बढ़ने का वातावरण चाहिए। पर्याप्त और चालू पथप्रकाश, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, संवेदनशील पुलिस, सुगम शिकायत व्यवस्था तथा शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई सुरक्षा के बुनियादी आधार होने चाहिए। प्रशासन की जवाबदेही केवल घटना के बाद बयान जारी करने तक सीमित नहीं रह सकती।
शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी महज नियमावली बनाने से पूरी नहीं होती। परिसर में ऐसा विश्वास होना चाहिए कि शिकायत करने वाली छात्रा को चुप नहीं कराया जाएगा, उसकी पहचान और गरिमा सुरक्षित रखी जाएगी तथा उसकी बात गंभीरता से सुनी जाएगी। संस्थान की प्रतिष्ठा बचाने का सही रास्ता शिकायत दबाना नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई करना है।
बदलाव घर से शुरू हो
महिला सुरक्षा का प्रश्न केवल पुलिस की गश्त और निगरानी कैमरों तक सीमित नहीं है। स्थायी बदलाव की शुरुआत घरों और प्राथमिक शिक्षा से होगी। बेटियों को सावधान रहने की सीख देने के साथ बेटों को दूसरों की सीमाओं, इच्छाओं और स्वतंत्रता का सम्मान करना सिखाना होगा। बचपन से यह समझ विकसित करनी होगी कि किसी महिला की सहमति का कोई विकल्प नहीं है और ‘ना’ का अर्थ स्पष्ट रूप से ‘ना’ ही होता है।
सम्मान का आधार रिश्तों की पहचान भी नहीं होना चाहिए। किसी महिला के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार इसलिए जरूरी नहीं कि वह किसी की मां, बहन या बेटी है; वह एक स्वतंत्र व्यक्ति है और इसी नाते सम्मान की अधिकारी है। उसकी शिक्षा, काम, पहनावे, मित्रता और जीवन संबंधी निर्णयों को नियंत्रित करने की मानसिकता पर भी सवाल उठाना होगा।
घरों में बराबरी का व्यवहार और विद्यालयों में लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा इस बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं। पाठ्यपुस्तकों के संदेश तभी प्रभावी होंगे, जब बच्चों को परिवार और समाज के व्यवहार में भी समानता दिखाई देगी। महिलाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों को मजाक कहकर टालना और लड़कों के अनुचित व्यवहार को सामान्य मान लेना बंद करना होगा।
वादों से आगे बढ़े व्यवस्था
सड़क पर उतरकर सवाल पूछती बेटियां व्यवस्था के सामने सुधार का स्पष्ट आग्रह रख रही हैं। उनके आक्रोश को अनुशासनहीनता बताना या उनके नारों पर बहस करके मूल प्रश्न से बचना समस्या को और गहरा करेगा। उनकी बात सुनना, शिकायतों का समाधान करना और सुरक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर करना प्रशासन तथा समाज की साझा जिम्मेदारी है।
महिलाओं की सुरक्षा कोई खैरात नहीं, उनका अधिकार है। सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं; अच्छी व्यवस्था दोनों को सुनिश्चित करती है। बेटियों को ऐसा समाज चाहिए, जहां आगे बढ़ने के लिए उन्हें भय से समझौता न करना पड़े। अब व्यवस्था को कागजी वादों से आगे बढ़कर अपने काम से भरोसा पैदा करना होगा।








