शक्ति की उपासना के साथ संतुलित आहार, अनुशासित दिनचर्या और आत्मचिंतन का संदेश
डॉ. विनोद बब्बर

नवरात्र शक्ति-जागरण का पर्व है। भारतीय परंपरा में शक्ति की उपासना के अनेक प्रसंग मिलते हैं। भगवान राम द्वारा रावण से युद्ध से पहले देवी की आराधना का वर्णन प्रचलित धार्मिक कथाओं में मिलता है। देवी के विविध स्वरूप हमें यह समझाते हैं कि जीवन में शक्ति का अर्थ केवल शारीरिक सामर्थ्य नहीं, बल्कि विवेक, साहस, करुणा और आत्मसंयम भी है। नवरात्र इन्हीं गुणों को जागृत करने, संवारने और जीवन में उतारने का अवसर प्रदान करते हैं।
भारतीय गृहस्थ जीवन में इन नौ दिनों को शक्ति-पूजन, शक्ति-संवर्धन और शक्ति-संचय के रूप में देखा गया है। पूजा, व्रत, साधना और सद्व्यवहार के माध्यम से मनुष्य अपने शारीरिक, मानसिक और आत्मिक जीवन को अधिक संतुलित बनाने का प्रयास करता है। इस दृष्टि से नवरात्र की सार्थकता अनुष्ठानों के साथ उस जीवनचर्या में भी है, जिसे हम इन दिनों अपनाते हैं।
प्रकृति से जुड़ा पर्व
लोकजीवन में चैत्र के वासंतिक और आश्विन के शारदीय नवरात्र विशेष रूप से मनाए जाते हैं। दोनों ऐसे समय आते हैं, जब मौसम का स्वरूप बदल रहा होता है। चैत्र में वसंत के बीच गर्मी की ओर बढ़ने का संकेत मिलता है, जबकि आश्विन में वर्षा के बाद शरद का वातावरण बनने लगता है। हालांकि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इन परिवर्तनों का अनुभव भिन्न होता है।
ऋतु परिवर्तन का प्रभाव वृक्षों, लताओं, वनस्पतियों, जल और वायुमंडल में दिखाई देता है। कृषि प्रधान भारतीय समाज के लिए यह समय खेतों, फसलों और आगामी कृषि कार्यों से भी जुड़ा रहा है। प्रकृति की बदलती छटा के बीच देवी की उपासना जीवन में आशा और उत्साह का संचार करती है। घरों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर होने वाले आयोजन समाज को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ते हैं।
इस संबंध को समझते हुए आस्था और वैज्ञानिक प्रमाण के बीच स्पष्टता भी आवश्यक है। किसी परंपरा का सांस्कृतिक महत्व अपने आप में मूल्यवान है, लेकिन उससे जुड़े प्रत्येक स्वास्थ्य संबंधी दावे को वैज्ञानिक तथ्य मान लेना उचित नहीं। नवरात्र की वैज्ञानिक दृष्टि पर चर्चा तभी सार्थक होगी, जब हम उसके व्यावहारिक पक्षों को प्रमाण और विवेक की कसौटी पर भी देखें।
उपवास का अर्थ संयम
नवरात्र का व्रत भोजन छोड़ने के साथ इच्छाओं और आदतों पर संयम रखने का अवसर भी है। वाणी में मधुरता, व्यवहार में धैर्य, विचारों में सकारात्मकता और दिनचर्या में अनुशासन इस साधना को व्यापक अर्थ देते हैं। यदि व्रत के दिनों में भी क्रोध, कटुता और असंयम बना रहे, तो उसके आध्यात्मिक उद्देश्य पर विचार करना आवश्यक है।
भोजन के संदर्भ में भी संयम का अर्थ शरीर की आवश्यकता को समझना है। व्रत के नाम पर बार-बार तले हुए व्यंजन, अत्यधिक मिठाइयां अथवा आवश्यकता से अधिक भोजन करना संतुलन की भावना से मेल नहीं खाता। आहार की गुणवत्ता और मात्रा पर ध्यान देना, भूख और तृप्ति को समझना तथा अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार भोजन चुनना अधिक उपयोगी दृष्टिकोण है।
उपवास को सभी लोगों के लिए समान रूप से लाभदायक नहीं माना जा सकता। विशेषकर मधुमेह से पीड़ित और रक्त शर्करा कम करने वाली दवाएं लेने वाले लोगों में बिना चिकित्सकीय सलाह के उपवास जोखिम पैदा कर सकता है। व्रत के दौरान दवा, भोजन और पानी की व्यवस्था व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय होनी चाहिए। धार्मिक संकल्प निभाते समय स्वास्थ्य की आवश्यकताओं का सम्मान भी जरूरी है।
आयुर्वेद और विवेक
आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसमें आहार, विहार और दिनचर्या को महत्व दिया गया है। लंघन की अवधारणा भी इसी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए लंबे समय तक भूखे रहने की सार्वभौमिक सलाह नहीं समझना चाहिए।
आयुर्वेद के प्रति सम्मान रखते हुए यह कहना भी सही नहीं होगा कि उसकी सभी औषधियां दुष्प्रभावों से मुक्त हैं। कुछ आयुर्वेदिक उत्पादों में ऐसे धातु या अन्य घटक हो सकते हैं, जो हानि पहुंचाएं। इसलिए औषधि का चयन और प्रयोग योग्य चिकित्सकीय मार्गदर्शन में होना चाहिए। किसी चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता का आकलन उसकी सुरक्षा और उपलब्ध प्रमाण के आधार पर करना ही विवेकपूर्ण दृष्टिकोण है।
इसी प्रकार उपवास को शरीर के सभी कथित विष निकाल देने या प्रत्येक रोग से बचाव का निश्चित उपाय बताना अतिशयोक्ति होगी। नवरात्र हमें अपनी आदतों की समीक्षा का अवसर अवश्य देते हैं। इस अवसर का उपयोग शरीर के संकेत समझने और जीवन में संतुलन लाने के लिए किया जा सकता है।
ऋतु संधि में सजगता
मौसम बदलने पर हमारे पहनावे, भोजन, रहन-सहन और दैनिक गतिविधियों में भी बदलाव आता है। इसलिए ऋतु संधि का संदेश अपनी दिनचर्या के प्रति अधिक सजग होना है। मूल बात यह है कि बदलते वातावरण के अनुरूप हम अपने व्यवहार को कितनी समझदारी से ढालते हैं।
नवरात्र को दिन और रात की बराबरी अथवा शरीर की जैविक घड़ी के स्वतः पुनर्व्यवस्थित होने से जोड़ना भी सावधानी मांगता है। दिन-रात की लगभग बराबर अवधि विषुव से जुड़ी खगोलीय स्थिति है, जबकि नवरात्र की तिथियां चंद्र पंचांग के अनुसार बदलती हैं। इसलिए दोनों को हर वर्ष एक ही समय घटित होने वाली प्रक्रिया नहीं मानना चाहिए।
हां, पूजा और साधना के लिए नियमित समय तय करना अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करने का अवसर बन सकता है। सुबह समय पर उठना, दैनिक कार्यों में अनुशासन रखना और आत्मचिंतन के लिए समय निकालना इस पर्व के ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें जीवन में आगे भी बनाए रखा जा सकता है।
प्रकृति से संवाद
नवरात्र में अनेक परिवारों में जौ बोने की परंपरा है। अंकुरित होते बीज जीवन, उर्वरता और सृजन के प्रतीक के रूप में देखे जा सकते हैं। मिट्टी में छिपे बीज से नई हरियाली का निकलना हमें धैर्य, देखभाल और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है।
पूजा के लिए फूल एकत्र करने और पौधों की देखभाल जैसी गतिविधियां भी प्रकृति से जुड़ने का अवसर बन सकती हैं। यह जुड़ाव पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी में भी दिखाई देना चाहिए। अनावश्यक फूल-पत्तियां तोड़ने, पूजा सामग्री को जलस्रोतों में फेंकने या उत्सव के बाद आसपास गंदगी छोड़ने से बचना इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
प्रकृति की उपासना का वास्तविक अर्थ उसके प्रति आदरपूर्ण व्यवहार में है। यदि नवरात्र हमें अपने घर, पड़ोस और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता के प्रति अधिक सजग बनाएं, तो यह पर्व की भावना का सुंदर विस्तार होगा।
श्रद्धा के साथ स्वच्छ हवा
दीपक, धूप और सुगंधित पदार्थ पूजा के वातावरण का हिस्सा हैं। उनका धार्मिक और भावनात्मक महत्व है, लेकिन उनके धुएं से सभी रोगाणु नष्ट होने और परिवार को संक्रमण से सुरक्षा मिलने का दावा उचित नहीं है।
धूप, अगरबत्ती और मोमबत्ती जैसे पदार्थ जलाने से घर के भीतर सूक्ष्म कण बढ़ सकते हैं। इसलिए पूजा स्थल पर हवा का पर्याप्त आवागमन रखना और अत्यधिक धुएं से बचना समझदारी है। स्वच्छ वायु और श्रद्धापूर्ण वातावरण साथ-साथ बनाए जा सकते हैं।
मन की शक्ति का जागरण
नवरात्र मानसिक और आत्मिक अनुशासन का भी अवसर हैं। देवी के सामने बैठकर प्रार्थना करना, धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना और उदात्त चरित्रों का स्मरण करना हमें अपने आचरण की समीक्षा के लिए प्रेरित कर सकता है। दुर्गा सप्तशती, देवी भागवत, रामायण या अन्य प्रेरक ग्रंथों का अध्ययन तभी अधिक सार्थक होता है, जब उनके संदेश व्यवहार में उतरें।
पाठ की संख्या के साथ उसके अर्थ पर भी ध्यान देना जरूरी है। साहस की कथा पढ़कर अन्याय के सामने मौन रहना, करुणा का संदेश सुनकर पीड़ित की उपेक्षा करना अथवा संयम की चर्चा करते हुए क्रोध में डूबे रहना साधना के उद्देश्य को अधूरा छोड़ देता है। आत्मिक शक्ति का परिचय कठिन परिस्थितियों में हमारे धैर्य, विवेक और संवेदनशीलता से मिलता है।
इन नौ दिनों में हम स्वयं से पूछ सकते हैं कि क्या हमारी वाणी किसी को चोट पहुंचाती है, क्या हमारा व्यवहार दूसरों के प्रति न्यायपूर्ण है और क्या हम अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभा रहे हैं। ऐसा आत्मचिंतन शक्ति-उपासना को दैनिक जीवन से जोड़ता है।
कन्या पूजन का व्यापक संदेश
नवरात्र में कन्या पूजन देवी के बाल स्वरूप के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा है। इसका सामाजिक संदेश तभी पूर्ण होता है, जब बेटियों और महिलाओं के प्रति सम्मान वर्ष भर हमारे व्यवहार में दिखाई दे।
कन्या को पूजनीय मानने के साथ उसकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और अवसरों की समानता के प्रति भी जिम्मेदारी निभानी होगी। महिलाओं की गरिमा किसी आयु, वैवाहिक स्थिति या अनुष्ठान पर निर्भर नहीं है। परिवार और समाज में उनके विचारों को महत्व देना, भेदभाव का विरोध करना और उनकी क्षमताओं को आगे बढ़ने देना शक्ति की उपासना का व्यावहारिक रूप है।
देवी के विविध स्वरूप हमें सृजन, ज्ञान, धैर्य और अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देते हैं। इन गुणों का सम्मान अपने आसपास की महिलाओं के जीवन और अधिकारों में भी दिखाई देना चाहिए।
नौ दिनों से आगे की साधना
नवरात्र जीवन में ठहरकर अपनी दिशा देखने का अवसर हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ यदि हम अपनी आदतों में भी आवश्यक परिवर्तन करें, तो पर्व का संदेश अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। आहार में संयम, विचारों में स्पष्टता, व्यवहार में करुणा और कर्तव्य के प्रति सजगता इस साधना के स्थायी फल बन सकते हैं।
आस्था हमें प्रेरणा देती है और वैज्ञानिक विवेक स्वास्थ्य संबंधी दावों को परखने में सहायता करता है। दोनों के प्रति ईमानदार रहकर नवरात्र को समझना संभव है। शक्ति-जागरण की सार्थकता इसी में है कि पूजा के बाद भी हमारे भीतर दूसरों का सम्मान करने, अन्याय का सामना करने और अपने जीवन को अधिक संतुलित बनाने का संकल्प जीवित रहे।








