हर जिद पूरी करना नहीं है सच्चा प्यार; जिम्मेदारी, आत्मसंयम और सही-गलत की समझ देना भी अभिभावकों का दायित्व
सुरेश गोयल धूप वाला
पूर्व जिला महामंत्री, भाजपा, हिसार

प्रत्येक माता-पिता का सबसे बड़ा सपना होता है कि उनका बच्चा जीवन में सफल, सम्मानित और खुशहाल बने। इस उद्देश्य से वे बच्चों को हर प्रकार की सुविधा और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने का भरसक प्रयास करते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि संतान की मुस्कान में ही माता-पिता अपनी सबसे बड़ी खुशी देखते हैं।
लेकिन केवल लाड़-प्यार और भौतिक सुविधाएं बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी नहीं होतीं। इनके साथ अनुशासन, नैतिक संस्कार और जिम्मेदारी की भावना न हो तो अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चे के व्यक्तित्व विकास में बाधा बन सकता है।
हर जिद पूरी करना उचित नहीं
आज अनेक बच्चे छोटी-छोटी बातों पर जिद करने लगते हैं। इच्छा तत्काल पूरी न होने पर वे क्रोधित होते हैं, रोते हैं या अनुचित व्यवहार करने लगते हैं। कई बार माता-पिता उनकी नाराजगी से बचने के लिए हर जिद पूरी कर देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत बच्चे के स्वभाव का हिस्सा बन जाती है और वह अपनी प्रत्येक इच्छा पूरी होने को अधिकार समझने लगता है।
आगे चलकर यही प्रवृत्ति उसकी शिक्षा, सामाजिक जीवन और पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। माता-पिता का कर्तव्य केवल बच्चों की इच्छाएं पूरी करना नहीं, बल्कि उन्हें सही और गलत का अंतर समझाना भी है।
बच्चों की आवश्यकताओं और अनुचित मांगों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और जरूरी सुविधाएं देना माता-पिता का दायित्व है, लेकिन प्रत्येक अनावश्यक मांग पूरी करना समझदारी नहीं। बच्चों को कभी-कभी ‘नहीं’ सुनने की आदत भी होनी चाहिए, ताकि वे जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और असफलताओं का सामना करना सीख सकें।
अनुशासन का अर्थ कठोरता नहीं
बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में अनुशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुशासन का अर्थ कठोरता या भय पैदा करना नहीं, बल्कि उनमें नियमों का पालन, समय की पाबंदी, जिम्मेदारी और आत्मसंयम विकसित करना है।
जिस बच्चे को बचपन से समय का महत्व, बड़ों का सम्मान, ईमानदारी और परिश्रम का मूल्य सिखाया जाता है, वही आगे चलकर जिम्मेदार नागरिक बनता है। बच्चों को स्वतंत्रता अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी का बोध भी जरूरी है।
संगति और वातावरण पर रखें नजर
कहा गया है—‘जैसी संगत, वैसी रंगत।’ बच्चे अपने मित्रों और आसपास के वातावरण से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं। अच्छी मित्र मंडली उनमें सकारात्मक सोच, अच्छे संस्कार और अनुशासन विकसित करती है। इसके विपरीत गलत संगति उन्हें अनुशासनहीनता, गलत आदतों और सामाजिक बुराइयों की ओर ले जा सकती है।
इसलिए माता-पिता को बच्चों के मित्रों, दिनचर्या और गतिविधियों की जानकारी रखनी चाहिए। यह निगरानी संदेह या कठोरता से नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और प्रेम के साथ होनी चाहिए।
डिजिटल अनुशासन भी आवश्यक
मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। इनका अनियंत्रित उपयोग बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकता है। अभिभावकों को बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने के साथ उन्हें सुरक्षित और उपयोगी डिजिटल व्यवहार भी सिखाना चाहिए।
माता-पिता को स्वयं भी संयमित व्यवहार अपनाकर बच्चों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना होगा। बच्चे केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के आचरण से सबसे अधिक सीखते हैं।
संतुलित परवरिश ही सच्चा प्रेम
बच्चों का पालन-पोषण केवल उनकी इच्छाएं पूरी करने का नाम नहीं है। सच्चा प्रेम वही है, जिसमें स्नेह के साथ अनुशासन, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और आधुनिक शिक्षा के साथ श्रेष्ठ संस्कार भी शामिल हों।
माता-पिता यदि इन सभी बातों का संतुलन बनाए रखें तो उनके बच्चे न केवल जीवन में सफल होंगे, बल्कि संवेदनशील, संस्कारी और चरित्रवान नागरिक बनकर परिवार, समाज और राष्ट्र का गौरव भी बढ़ाएंगे। यही प्रत्येक माता-पिता की वास्तविक सफलता और सबसे बड़ी उपलब्धि है।







