सवाल मतदाता पंजीकरण के साथ चुनाव आयोग की पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही का भी
सौरभ वार्ष्णेय

भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शासन में नागरिक की भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इस भागीदारी की शुरुआत मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से होती है। इसलिए मतदाता पंजीकरण में कोई बदलाव, अतिरिक्त घोषणा या नई शर्त महज प्रशासनिक विषय नहीं माना जा सकता। उसके साथ नागरिक के अधिकार, प्रक्रिया की वैधानिकता और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता जुड़ी होती है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान फॉर्म-6 से जुड़ी अतिरिक्त शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।
पांच अक्टूबर की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने रिकॉर्ड सामने आने पर यह देखने की बात कही कि बदलाव किसने किए। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत ने अभी किसी व्यक्ति का दोष या बदलावों की अवैधता अंतिम रूप से निर्धारित कर दी है। मामला न्यायिक परीक्षण के अधीन है।
मूल फॉर्म और अतिरिक्त घोषणा का सवाल
इस विवाद में चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने रखना आवश्यक है। आयोग के अधिकारियों का कहना है कि मूल फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि एसआईआर की दस्तावेजी प्रक्रिया के अंतर्गत उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई है। इस स्पष्टीकरण के बाद विवाद का केंद्रीय प्रश्न यह बनता है कि ऐसी घोषणा जोड़ने का वैधानिक आधार क्या है और उसका मतदाता पंजीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है।
किसी व्यवस्था को केवल उसका नाम देकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि अतिरिक्त घोषणा पूरी किए बिना किसी पात्र नागरिक का आवेदन आगे नहीं बढ़ता, तो व्यवहार में वह पंजीकरण की एक अतिरिक्त शर्त बन सकती है। इसलिए जांच केवल इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि मूल फॉर्म के मुद्रित प्रारूप में बदलाव हुआ या नहीं। यह देखना भी जरूरी है कि ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया में नागरिक से क्या मांगा जा रहा है और जानकारी उपलब्ध न होने पर उसके आवेदन के साथ क्या होता है।
फॉर्म-6 विवाद से संबंधित रिपोर्टों के अनुसार, ऑनलाइन प्रक्रिया में पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में आवेदक अथवा उसके माता-पिता या दादा-दादी के नाम से संबंधित घोषणा जोड़ी गई थी। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पुराने पारिवारिक विवरण उपलब्ध न होने की स्थिति में नए मतदाता के लिए कौन-सा स्पष्ट और सुलभ विकल्प मौजूद है।
मतदाता सूची की शुद्धता आवश्यक है। लेकिन शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें अपात्र प्रविष्टियां हटें और पात्र नागरिक अनावश्यक कठिनाइयों के कारण बाहर न रह जाएं। प्रशासनिक सुविधा और नागरिक की भागीदारी के बीच संतुलन बनाना ही इस व्यवस्था की वास्तविक कसौटी है।
विपक्ष को मुद्दा, आयोग पर जवाब का दबाव
इस प्रकरण का पहला राजनीतिक मायना यह है कि चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को अब दस्तावेजों और संस्थागत निर्णयों की कसौटी पर परखने का अवसर मिला है। विपक्ष इस घटनाक्रम को अपनी आशंकाओं के समर्थन में प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन अदालत द्वारा स्पष्टीकरण मांगना और विपक्ष के सभी आरोपों का सही सिद्ध हो जाना अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक आलोचना की विश्वसनीयता भी इसी अंतर को बनाए रखने पर निर्भर करेगी।
विपक्ष के लिए अधिक प्रभावी रास्ता यह होगा कि वह प्रभावित मतदाताओं के ठोस उदाहरण, आवेदन में आई बाधाएं और संबंधित दस्तावेज सामने रखे। केवल आरोपों की तीव्रता बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि कोई पात्र व्यक्ति पंजीकरण से वंचित हुआ या नहीं और यदि हुआ तो उसे राहत कैसे मिलेगी।
सत्तापक्ष के सामने भी राजनीतिक चुनौती है। चुनाव आयोग पर उठे प्रत्येक सवाल को विपक्ष की चुनावी रणनीति बताकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था में जनता का विश्वास सरकार की लोकतांत्रिक स्वीकार्यता के लिए भी आवश्यक है। इसलिए पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब का समर्थन किसी एक दल के हित का विषय नहीं होना चाहिए।
आयोग के लिए सबसे ठोस उत्तर रिकॉर्ड, निर्णय की प्रक्रिया और नागरिकों के लिए स्पष्ट निर्देश होंगे। संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा केवल आलोचना का प्रतिवाद करने से सुरक्षित नहीं होती; वह तब मजबूत होती है, जब उसके निर्णयों का आधार समझ में आए और गलतियों के सुधार की व्यवस्था दिखाई दे।
व्यक्ति से बड़ी संस्था
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठा एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि एसआईआर से संबंधित विवादित निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिए गए थे या आयोग ने उन्हें सर्वसम्मति अथवा बहुमत से स्वीकार किया था। अदालत ने इस संबंध में जवाब मांगा है। इसलिए सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का प्रश्न इस मामले के केंद्र में है।
चुनाव आयोग जैसी संस्था में सदस्यों के बीच मतभेद होना अपने आप में असामान्य नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मतभेद दर्ज हों, उन पर विचार हो और निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिया जाए। असहमति को संस्था की कमजोरी मान लेना भी उचित नहीं होगा। कई बार असहमति ही निर्णय को अधिक संतुलित और जवाबदेह बनाती है।
यदि रिकॉर्ड से निर्धारित प्रक्रिया के पालन की पुष्टि होती है, तो आयोग को जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करने का मजबूत आधार मिलेगा। लेकिन यदि प्रक्रिया की अनदेखी सामने आती है, तो संबंधित निर्णयों और जिम्मेदारियों की जांच आवश्यक होगी। केवल संस्थागत सहमति भी किसी निर्णय की वैधानिकता या नागरिक पर उसके प्रभाव से जुड़े सभी प्रश्नों का स्वतः उत्तर नहीं बन जाती।
न्यायिक संयम का भी संदेश
इस मामले में अदालत की सख्ती के साथ उसके संयम को समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया। अदालत ने केवल अखबार की रिपोर्ट के आधार पर ऐसा आदेश देने में असमर्थता जताई। यह स्पष्ट करता है कि गंभीर आरोपों की जांच और आरोपों को सिद्ध मान लेने के बीच न्यायिक अंतर कायम है।
इसका संदेश दोनों पक्षों के लिए है। जवाब मांगे जाने को अंतिम दोषसिद्धि नहीं कहा जा सकता और तत्काल कार्रवाई न होने को सभी आरोपों से मुक्ति भी नहीं माना जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया में निष्कर्ष रिकॉर्ड, संबंधित पक्षों के जवाब और कानूनी परीक्षण के आधार पर निकलना चाहिए।
राजनीतिक बहस में अक्सर यही सावधानी पीछे छूट जाती है। सुनवाई की एक टिप्पणी को अंतिम फैसला बताना या अंतरिम राहत न मिलने को पूर्ण समर्थन मान लेना जनमानस में भ्रम पैदा करता है। संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से नुकसानदेह है।
केंद्र में रहे मतदाता
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वह नागरिक है, जो मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है। राजनीतिक दलों की रणनीति, आयोग की सफाई और न्यायालय की सुनवाई के बीच उसकी व्यावहारिक कठिनाइयां पीछे नहीं छूटनी चाहिए। उसे स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि आवेदन कैसे करना है, कौन-से दस्तावेज आवश्यक हैं और आवेदन अस्वीकार होने पर शिकायत अथवा अपील का रास्ता क्या है।
मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी अपात्र नाम का शामिल होना समस्या है तो किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना भी उतना ही गंभीर विषय है। विश्वसनीय व्यवस्था वही होगी, जिसमें सत्यापन के साथ सुनवाई, सुधार और शिकायत के प्रभावी अवसर भी उपलब्ध हों।
फॉर्म-6 का विवाद इसलिए एक प्रपत्र से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक विश्वास का प्रश्न बन गया है। इसके राजनीतिक मायने निश्चित रूप से हैं, लेकिन समाधान राजनीतिक आरोपों में नहीं, स्पष्ट रिकॉर्ड और जवाबदेह प्रक्रिया में मिलेगा। अब आवश्यक है कि संबंधित दस्तावेज सामने आएं, अदालत में उठे प्रश्नों के ठोस उत्तर दिए जाएं और मतदाता की कठिनाइयों का समाधान हो।
चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन सुनिश्चित नहीं होती। उसकी शुरुआत मतदाता पंजीकरण से होती है और हर चरण में नागरिक का भरोसा बनाए रखना पड़ता है। जहां प्रक्रिया उचित है, वहां तथ्य संदेह दूर करें; जहां गलती है, वहां सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित हो। लोकतंत्र में यही अपेक्षा चुनाव आयोग से भी है और राजनीतिक दलों से भी।








