होम डिलीवरी की सुविधा में छिपा सुरक्षा संकट

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डार्क स्टोरों की अनियमितताओं से लेकर डिलीवरी एजेंटों के सत्यापन तक खड़े हो रहे गंभीर सवाल

नाबालिगों से डिलीवरी और बिना पुलिस सत्यापन घरों तक पहुंच भविष्य में बन सकती है बड़ी चुनौती

अनिल धर्मदेश

भारत में क्विक कॉमर्स यानी त्वरित होम डिलीवरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती वर्षों में महानगरों तक सीमित रहे इस कारोबार की पहुंच अब छोटे शहरों, उपनगरों और कस्बों तक हो गई है। इस व्यापार मॉडल के तीव्र, अनियोजित और असीमित विस्तार के साथ उत्पादों की गुणवत्ता तथा उनकी डिलीवरी से जुड़ी अनेक गंभीर चुनौतियां भी सामने आने लगी हैं। सुरक्षा और उपयोगिता के मानकों की अनदेखी इस संकट को और गहरा कर रही है।

डार्क स्टोरों में गंभीर अनियमितताएं

विभिन्न शहरों में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के नियामकों द्वारा किए गए औचक निरीक्षणों में डार्क स्टोरों यानी आम ग्राहकों की नजरों से दूर संचालित गोदामों में चिंताजनक उल्लंघन सामने आए हैं। मुंबई के मलाड वेस्ट, बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद सहित कई स्थानों पर साफ-सफाई, कीट नियंत्रण, एक्सपायरी तिथि, निर्धारित तापमान तथा कचरा प्रबंधन से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं के कारण क्विक डिलीवरी कंपनियों के गोदाम सील करने पड़े हैं।

इन मामलों ने क्विक कॉमर्स को लेकर समाज की चिंता बढ़ाई है। हालांकि, इससे भी गंभीर चुनौती सामान को ग्राहक के घर तक पहुंचाने वाले डिलीवरी एजेंटों के सत्यापन की है।

पहचान-पत्र देखकर भरोसा, लेकिन सत्यापन पर सवाल

क्विक डिलीवरी कंपनियां अपने फील्ड एजेंटों को औपचारिक पहचान-पत्र और मोबाइल ऐप तक पहुंच उपलब्ध कराती हैं। इससे ग्राहकों को यह भरोसा हो जाता है कि कंपनी ने संबंधित व्यक्ति की पूरी जांच-पड़ताल की होगी, जबकि धरातल की स्थिति कई बार इसके विपरीत दिखाई देती है।

छोटे शहरों और कस्बों में नियुक्त किए जाने वाले अधिकतर फील्ड एजेंट कंपनियों के नियमित कर्मचारी नहीं, बल्कि संविदा या गिग वर्कर होते हैं। सभी एजेंटों का पुलिस सत्यापन तो दूर, कई मामलों में कंपनियों द्वारा भी उनकी पर्याप्त जांच नहीं की जाती। कर्मचारियों अथवा एजेंटों के रेफरल के आधार पर ही नई नियुक्तियां किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थिति यहां तक है कि कुछ छोटे शहरों में नाबालिग बच्चे भी स्कूटी पर सामान की डिलीवरी करते दिखाई देते हैं।

घरों और मोहल्लों की सुरक्षा को खतरा

स्टाफ प्रशिक्षण का अभाव, बिना मेडिकल फिटनेस प्रमाणपत्र तथा बिना दस्ताने और सुरक्षा उपकरणों के डार्क स्टोरों में काम जैसी अनियमितताएं पहले ही सामने आ चुकी हैं। अब डिलीवरी एजेंटों का सत्यापन भविष्य में शहरी सुरक्षा की बड़ी चुनौती बन सकता है।

आपराधिक मानसिकता का कोई व्यक्ति ऐसी कंपनी से जुड़कर सामान पहुंचाने के बहाने मोहल्लों और घरों की रेकी आसानी से कर सकता है। वह बुजुर्गों या अकेली महिलाओं वाले घरों की पहचान करने के साथ ही आसपास लगे कैमरों, प्रवेश और निकास के रास्तों तथा सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी जुटा सकता है। इसके बाद चोरी अथवा अन्य अपराध को अंजाम देना उसके लिए आसान हो सकता है।

कॉलोनियों के मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मी भी नामी कंपनियों की वर्दी, पहचान-पत्र या डिलीवरी बैग देखकर एजेंटों को प्रायः सहजता से प्रवेश दे देते हैं। यह भरोसा तभी सुरक्षित माना जा सकता है, जब कंपनी ने संबंधित व्यक्ति का समुचित सत्यापन कराया हो।

नाबालिग एजेंटों से यातायात सुरक्षा भी संकट में

नाबालिगों द्वारा दोपहिया वाहनों से सामान की डिलीवरी किया जाना परिवहन और सड़क सुरक्षा की दृष्टि से भी गंभीर मामला है। तेजी से सामान पहुंचाने के दबाव में डिलीवरी एजेंटों द्वारा यातायात नियमों की अनदेखी तथा दुर्घटनाओं का शिकार होने का खतरा बना रहता है।

जिस प्रकार कंपनियों से ‘10 मिनट में डिलीवरी’ जैसी समय-सीमा आधारित गारंटी हटाने को कहा गया, ताकि डिलीवरी एजेंट जल्दबाजी में यातायात नियम न तोड़ें और दुर्घटनाओं से बच सकें, उसी प्रकार प्रत्येक डिलीवरी एजेंट का पुलिस सत्यापन भी अनिवार्य किया जाना चाहिए।

कंपनियों को अपने सभी एजेंटों का पूरा रिकॉर्ड रखना चाहिए तथा उनकी सत्यापित सूची हर महीने श्रम विभाग में जमा करानी चाहिए। पहचान संबंधी दस्तावेजों, आयु, ड्राइविंग लाइसेंस, पुलिस सत्यापन और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से कंपनी पर तय होनी चाहिए।

क्विक होम डिलीवरी आधुनिक जीवन की उपयोगी सुविधा अवश्य है, लेकिन सुविधा के नाम पर नागरिकों की खाद्य, यातायात और घरेलू सुरक्षा से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। समय रहते प्रभावी नियमन नहीं किया गया तो आज की यही सुविधा कल समाज के सामने एक गंभीर संकट बन सकती है।

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Author: Bharat Sarathi

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