सवाल पूछती दो पीढ़ियां, कठघरे में व्यवस्था

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रोजगार और परीक्षाओं को लेकर युवा आंदोलित, स्कूल की बुनियादी सुविधाओं के लिए बच्चे भी सड़क पर; दोनों के असंतोष की जड़ में व्यवस्था पर घटता विश्वास

डॉ. घनश्याम बादल

देश में इन दिनों जेन-जी और जेन-अल्फा—दो पीढ़ियों का असंतोष सामने आ रहा है। एक ओर युवा रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया, प्रश्नपत्रों की विश्वसनीयता और व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर उनसे भी छोटी पीढ़ी के बच्चे स्कूल, शिक्षक, जर्जर भवन, खराब सड़क और पढ़ाई की बुनियादी सुविधाओं जैसे सवालों को लेकर धरना-प्रदर्शन करने पर मजबूर हैं। उम्र का अंतर भले ही बड़ा हो, लेकिन दोनों के आक्रोश की जड़ एक ही दिखाई देती है—उन्हें लगता है कि व्यवस्था उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है।

एक पीढ़ी पूछ रही है कि पढ़-लिखकर भी उसका भविष्य सुरक्षित क्यों नहीं है और दूसरी पूछ रही है कि पढ़ने के लिए जरूरी सुविधाएं भी उसे क्यों नहीं मिल रही हैं। एक का संकट भविष्य का है और दूसरी की परेशानी वर्तमान की, लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा जुड़ा है—व्यवस्था पर घटता विश्वास।

मेहनत की कीमत कौन तय करेगा?

युवा आंदोलनों में रोजगार और परीक्षा व्यवस्था का प्रश्न सबसे प्रमुख है। वर्षों तक तैयारी करने वाला विद्यार्थी जब परीक्षा देता है और उसके बाद प्रश्नपत्र लीक, अनियमितता, परीक्षा रद्द होने अथवा भर्ती प्रक्रिया की अस्पष्टता की खबर सामने आती है तो उसका गुस्सा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। उसके भीतर सवाल जन्म लेता है कि आखिर उसकी मेहनत की कीमत कौन तय करेगा?

दूसरी ओर छोटी उम्र के बच्चे जब विद्यालय की बदहाल स्थिति, शिक्षकों की कमी या विद्यालय तक पहुंचने वाली खराब सड़क के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो यह केवल एक स्कूल की समस्या नहीं रह जाती। यह उस व्यवस्था पर सवाल बन जाती है, जो बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी का दावा तो करती है, लेकिन उनके वर्तमान की छोटी-छोटी जरूरतों को भी समय पर पूरा नहीं कर पाती।

असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आंदोलन के पीछे कौन है। प्रश्न यह है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्यों हुईं कि बच्चों और युवाओं को सड़क पर उतरना पड़ा। यदि शिकायत जायज है तो उसके पीछे किसी राजनीतिक शक्ति की मौजूदगी भी उसे नाजायज नहीं बना देती। इसी तरह यदि शिकायत गलत है तो केवल बड़ी भीड़ के समर्थन के कारण उसे सही नहीं माना जा सकता।

राजनीतिक इस्तेमाल से बचाना होगा

खतरा तब पैदा होता है, जब वास्तविक जन-असंतोष राजनीतिक अवसरवाद का हथियार बन जाता है। युवा किसी व्यवस्था संबंधी प्रश्न को लेकर आंदोलन करें तो यह उनका अधिकार है, लेकिन आंदोलन को किसी राजनीतिक दल की शक्ति-परीक्षा बना देना उसकी नैतिक शक्ति को कमजोर कर सकता है।

बच्चों के मामले में तो सावधानी और भी जरूरी है। छोटे बच्चों को राजनीतिक नारों, दलगत संघर्ष और सत्ता-विरोधी प्रदर्शनों का माध्यम बनाना लोकतांत्रिक चेतना नहीं, बल्कि बचपन का राजनीतिक इस्तेमाल है। बच्चों को सवाल पूछना सिखाया जाना चाहिए, न कि उन्हें राजनीतिक मोहरा बनाकर स्वार्थ सिद्ध किया जाए।

इन आंदोलनों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और प्रशासन इन आवाजों को किस रूप में देखते हैं। यदि इन्हें केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर प्रदर्शनकारियों को दबाने का प्रयास हुआ और मूल समस्याएं जस की तस रहीं तो आज का आंदोलन कल और बड़ा हो सकता है। यदि इन्हें लोकतंत्र की चेतावनी समझकर समस्याओं का समाधान किया गया तो यही आंदोलन व्यवस्था सुधारने की शक्ति भी बन सकते हैं।

आंदोलन नहीं, उसकी वजह रोकिए

सरकार को समझना होगा कि आंदोलन रोकना और आंदोलन की वजह रोकना दो अलग बातें हैं। पुलिस लगाकर भीड़ हटाई जा सकती है, लेकिन बेरोजगारी, परीक्षा की अव्यवस्था, भर्ती में देरी अथवा शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को पुलिस नहीं हटा सकती।

सरकार को ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें परीक्षा और भर्ती से संबंधित शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता और भर्ती की पारदर्शिता केवल सरकारी घोषणाओं के विषय नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य के सवाल हैं।

प्रशासन की जिम्मेदारी इससे भी पहले शुरू होती है। किसी बच्चे को विद्यालय की समस्या लेकर जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचना पड़े, इससे पहले अधिकारी को विद्यालय तक पहुंच जाना चाहिए। विद्यालय की छत जर्जर हो, शिक्षकों की कमी हो, सड़क खराब हो, पानी न हो या शौचालय की व्यवस्था ठीक न हो तो इन समस्याओं का पता बच्चों के धरने पर बैठने के बाद नहीं चलना चाहिए।

शासन की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि उसने आंदोलन समाप्त करा दिया, बल्कि यह है कि उसने आंदोलन की नौबत ही नहीं आने दी।

बच्चों का सवाल पूछना अनुशासनहीनता नहीं

विद्यालयों की भूमिका भी बदलनी होगी। बच्चों का सवाल पूछना अनुशासनहीनता नहीं है। विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा परिणाम देने की मशीन नहीं हो सकता। वहां बच्चों को अपनी शिकायत रखने का अधिकार और उसके समाधान का रास्ता मिलना चाहिए।

छात्र परिषद, शिकायत निवारण व्यवस्था और नियमित संवाद जैसी प्रणालियां बच्चों को सड़क पर उतरने के बजाय संस्थागत रास्ते से अपनी बात रखने का अवसर दे सकती हैं। लोकतंत्र की शिक्षा संविधान की किताब पढ़ाने भर से नहीं होती। लोकतंत्र तब समझ में आता है, जब बच्चे अनुभव करते हैं कि उनकी बात सुनी भी जाती है।

अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उन्हें बच्चों की शिकायत यह कहकर खारिज नहीं करनी चाहिए कि पढ़ाई करो, राजनीति मत करो। इसके साथ ही हर आंदोलन को बिना तथ्य समझे समर्थन देना भी उचित नहीं है। बच्चे से तीन सवाल पूछे जाने चाहिए—समस्या क्या है, उसका प्रमाण क्या है और वह समाधान क्या चाहता है? ये तीन सवाल किसी भी भावनात्मक आक्रोश को लोकतांत्रिक संवाद में बदल सकते हैं।

आने वाला भारत अधिक सवाल पूछेगा

आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हो सकती है। आज की युवा पीढ़ी सूचना के लिए किसी सरकारी विज्ञप्ति की प्रतीक्षा नहीं करती। वह अपने अनुभव को तत्काल सार्वजनिक कर सकती है। उससे छोटी पीढ़ी भी इसी वातावरण में बड़ी हो रही है। इसलिए आने वाला भारत ऐसी पीढ़ियों का होगा, जो आदेश सुनने से अधिक सवाल पूछेंगी, केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होंगी और अपने अधिकारों के लिए जवाब मांगेंगी।

आज सड़क पर खड़ा युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, वह व्यवस्था पर विश्वास मांग रहा है। स्कूल के बाहर खड़ा बच्चा केवल सड़क अथवा शिक्षक नहीं मांग रहा, वह पूछ रहा है कि उसके भविष्य की जिम्मेदारी किसकी है।

इन दोनों आवाजों को अलग-अलग देखकर सरकार कुछ समय के लिए राहत पा सकती है, लेकिन उनकी साझा बेचैनी को समझे बिना स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। सवाल केवल यह नहीं है कि कौन-सी पीढ़ी आंदोलन कर रही है; असली सवाल यह है कि वह आंदोलन क्यों कर रही है।

आज जरूरत आंदोलन कुचलने की नहीं, उसकी वजह खत्म करने की है। जो बच्चा आज अपने स्कूल की सड़क के लिए सवाल पूछ रहा है, वही कल देश की व्यवस्था, संविधान और सत्ता से जवाब मांगेगा। उसकी आवाज आज सुनी गई तो वह लोकतंत्र की ताकत बनेगी; दबाई गई तो कल उसका अविश्वास और ऊंचा बोलेगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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