राष्ट्रगान बदलने से इतिहास नहीं बदलता

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‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करने के लिए ‘जन गण मन’ को अपमानित करना क्यों जरूरी?

कुमार कृष्णन

बहुचर्चित धारावाहिक ‘महाभारत’ में भीष्म की भूमिका निभाने वाले अभिनेता मुकेश खन्ना के एक बयान ने फिर वह पुराना संदूक खोल दिया है, जिसमें राष्ट्रवाद, राष्ट्रगान, ‘वंदे मातरम्’, रवींद्रनाथ टैगोर और अंग्रेजों की चापलूसी के आरोप बंद पड़े हैं। उन्होंने ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान बनाने की मांग की है।

उनका दावा है कि ‘जन गण मन’ अंग्रेजी राजपरिवार की प्रशंसा में लिखा गया था। हालांकि इतिहास में प्रचलित विवाद इसे 1911 में भारत आए सम्राट जॉर्ज पंचम से जोड़ता रहा है। मुकेश खन्ना ने अपने ताजा बयान में इसे रानी एलिजाबेथ के सम्मान में लिखा गीत बताया है—जबकि यह दावा समय और तथ्यों, दोनों की कसौटी पर टिकता नहीं।

राष्ट्रभक्ति के बाजार में ऐसे बयान खूब चलते हैं। एक बयान आता है, सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंट जाता है और इतिहास बेचारा बीच में खड़ा होकर सोचता रहता है—भाई, मेरा भी कभी पढ़ लिया करो!

एक के सम्मान के लिए दूसरे का अपमान क्यों?

‘वंदे मातरम्’ पर किसी भारतीय को गर्व क्यों नहीं होगा? वह स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा में बसा गीत रहा है। बंग-भंग आंदोलन से लेकर आजादी की लड़ाई तक उसने असंख्य देशवासियों में संघर्ष का उत्साह भरा। उसके ऐतिहासिक योगदान और सम्मान को कम नहीं किया जा सकता।

लेकिन ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करने के लिए ‘जन गण मन’ को अंग्रेजों की चापलूसी बताना क्यों जरूरी हो गया?

यहीं इतिहास और राजनीतिक सुविधा के बीच का अंतर समझना चाहिए।

‘जन गण मन’ के सार्वजनिक गायन और जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा का समय लगभग एक ही था। दिसंबर 1911 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के दौरान यह गीत गाया गया। इसी संयोग ने बाद में संदेह और विवाद को जन्म दिया। कुछ तत्कालीन अखबारों ने भी इसे सम्राट के स्वागत से जोड़ दिया, लेकिन केवल संयोग इतिहास का प्रमाण नहीं होता।

रवींद्रनाथ टैगोर ने बाद में इस आरोप का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया था कि उनके गीत का ‘भाग्य विधाता’ कोई ब्रिटिश सम्राट नहीं, बल्कि भारत के भाग्य को दिशा देने वाली शाश्वत सत्ता है। उन्होंने इस आरोप को अपने लिए अपमानजनक माना था।

टैगोर ने लौटा दी थी ‘सर’ की उपाधि

जिस व्यक्ति पर ब्रिटिश सम्राट की चापलूसी का आरोप लगाया जा रहा है, उसका इतिहास भी देखना चाहिए।

रवींद्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार की दी हुई ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी। वर्ष 1919 में उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि जब देशवासियों के सम्मान और जीवन को कुचला जा रहा हो, तब सरकारी सम्मान धारण करना उचित नहीं।

जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी सत्ता का सम्मान लौटा दिया, उसे उसी सत्ता के सम्राट का स्तुतिगान लिखने वाला बताना इतिहास को अपनी सुविधा से पढ़ना है।

दोनों गीतों की अलग ऐतिहासिक भूमिका

‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ के बीच तुलना आज की खोज नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी इस पर बहस हुई थी।

‘वंदे मातरम्’ का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान इतना विराट था कि उसकी उपेक्षा संभव नहीं थी। लेकिन उसके बाद के अंतरों में देवी-रूपक होने के कारण कुछ मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई। दूसरी ओर ‘जन गण मन’ की भाषा और भाव को अधिक समावेशी माना गया।

आजादी की लड़ाई के नेताओं के सामने भी यह सवाल था कि स्वतंत्र भारत का प्रतीक ऐसा कैसे हो, जिसे पूरा देश अपना सके।

आज के राष्ट्रवादियों को यह बात विशेष रूप से समझनी चाहिए कि राष्ट्र केवल बहुसंख्यक की भावना का नाम नहीं होता। राष्ट्र वह है, जिसमें असहमति रखने वाले नागरिक को भी अपने लिए सम्मानजनक स्थान मिले।

संविधान सभा ने किसी गीत को नहीं हराया

संविधान सभा में इस विषय पर मतभेद छिपाए नहीं गए थे। स्वयं कई सदस्यों ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान बनाने की वकालत की थी। अंततः 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका के कारण ‘वंदे मातरम्’ को भी ‘जन गण मन’ के समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।

अर्थात संविधान सभा ने किसी एक गीत को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित नहीं किया। उसने दोनों की ऐतिहासिक भूमिका और गरिमा को स्वीकार किया।

यही बात आज की राजनीति को शायद सबसे कम पसंद आती है, क्योंकि उसे अक्सर एक को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित करने में अधिक आनंद आता है।

लेकिन इतिहास इतना सरल नहीं होता।

‘वंदे मातरम्’ हमारा राष्ट्रीय गीत है और ‘जन गण मन’ हमारा राष्ट्रगान। दोनों स्वतंत्रता संघर्ष की अलग-अलग स्मृतियों और भावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं। एक को ऊंचा उठाने के लिए दूसरे को गिराने की जरूरत नहीं।

राष्ट्रगान बदलने से क्या बदलेगा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रगान बदलने से क्या देश की समस्याएं बदल जाएंगी?

क्या बेरोजगार युवा को रोजगार मिल जाएगा? क्या किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा? क्या विद्यालयों में शिक्षक पहुंच जाएंगे? क्या सीमा पर खड़ा जवान बेहतर सुविधाओं से लैस हो जाएगा? क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा और संविधान में नागरिकों के अधिकार अधिक मजबूत हो जाएंगे?

अगर इन सवालों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो राष्ट्रगान बदलने की राजनीति आखिर किस समस्या का समाधान है?

राष्ट्रभक्ति की सबसे आसान किस्म वही है, जिसमें किसी गीत पर बहस की जाए और देश की वास्तविक समस्याओं पर चुप्पी साध ली जाए।

राष्ट्रगान गाते समय हम खड़े होते हैं, लेकिन क्या राष्ट्र के सामने भी खड़े होते हैं?

यही असली सवाल है।

इतिहास में फुटनोट भी होते हैं

राजनीति को इतिहास से अधिक सनसनी पसंद आती है। इसलिए सौ साल पुराने विवाद को संदर्भ से काटकर बार-बार कहा जाता है—देखिए, राष्ट्रगान तो अंग्रेजों के राजा के लिए लिखा गया था!

इतिहास की किताबें बंद करके केवल सोशल मीडिया खोल लिया जाए तो हर व्यक्ति इतिहासकार दिखाई देने लगता है।

मगर इतिहास में फुटनोट भी होते हैं।

फुटनोट बताता है कि 1950 में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाने का फैसला किसी ब्रिटिश सरकार ने नहीं, स्वतंत्र भारत के प्रतिनिधियों ने किया था। उसी निर्णय में ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया गया।

यही लोकतंत्र है।

लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि हमारी व्यक्तिगत पसंद का गीत ही राष्ट्र का गीत हो। लोकतंत्र का अर्थ है कि राष्ट्र अपने प्रतीकों का चुनाव बहस, सहमति और ऐतिहासिक विवेक के आधार पर करे।

किसी को ‘वंदे मातरम्’ अधिक प्रिय लगता है तो वह उसे पूरे सम्मान के साथ गाए, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह ‘जन गण मन’ को अपमानित करके ही अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करे।

राष्ट्र किसी दल की निजी संपत्ति नहीं

टैगोर को अंग्रेजों का कवि बताने से पहले यह भी याद रखना चाहिए कि गांधी उन्हें ‘गुरुदेव’ कहते थे। टैगोर और गांधी के बीच मतभेद थे, लेकिन परस्पर सम्मान बना रहा। सुभाषचंद्र बोस जैसे उग्र राष्ट्रवादी भी टैगोर के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।

यही भारत की सुंदरता थी—जहां गांधी और टैगोर बहस कर सकते थे, बोस और टैगोर संवाद कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र की चिंता किसी एक व्यक्ति अथवा विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं थी।

आज हम राष्ट्र को भी पार्टी कार्यालय की तरह देखने लगे हैं। जिसे अपना पसंदीदा रंग दिखाई दिया, उसे राष्ट्रवादी घोषित कर दिया और जिसने दूसरा रंग देखा, उसे संदिग्ध बना दिया।

राष्ट्र इससे बड़ा है। राष्ट्रगान भी इससे बड़ा है।

राष्ट्रभक्ति आचरण से मापी जाती है

‘वंदे मातरम्’ सुनकर किसी के भीतर स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति जागती है तो वह सम्मान की अधिकारी है। ‘जन गण मन’ सुनकर किसी को भारत की विविधता, नदियां, पर्वत, प्रदेश और करोड़ों लोगों की सामूहिक चेतना दिखाई देती है तो वह भावना भी उतनी ही सम्मान की अधिकारी है।

राष्ट्रप्रेम को प्रतियोगिता क्यों बनाया जाए? कौन अधिक राष्ट्रवादी है—‘वंदे मातरम्’ गाने वाला या ‘जन गण मन’ गाने वाला?

यह सवाल ही गलत है।

राष्ट्रभक्ति आवाज की ऊंचाई से नहीं, आचरण की गहराई से मापी जाती है। जो राष्ट्रगान के समय खड़ा हो जाए, लेकिन कमजोर नागरिक के अधिकारों की रक्षा के समय बैठा रहे, उससे राष्ट्र को क्या हासिल होगा?

राष्ट्रगान बदलने की मांग करने से पहले राष्ट्र की हालत बदलने की मांग होनी चाहिए।

विद्यालय में बच्चा भूखा न बैठे। किसान कर्ज में न डूबे। नौजवान नौकरी के लिए दर-दर न भटके। अस्पताल में गरीब इलाज के बिना न मरे। अदालत में न्याय वर्षों तक न अटके। महिलाओं को सुरक्षा मिले। दलितों और आदिवासियों को सम्मान मिले। अल्पसंख्यकों को बराबरी का भरोसा मिले और नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रहे।

यही राष्ट्रगान की असली धुन है।

बाकी गीत हैं—बहुत सुंदर गीत। भारत इतना बड़ा देश है कि उसमें एक से अधिक सुंदर गीतों के लिए पर्याप्त जगह है।

इसलिए ‘वंदे मातरम्’ को पूरा सम्मान दीजिए, लेकिन ‘जन गण मन’ को अंग्रेजों की चापलूसी बताकर राष्ट्रभक्ति के प्रमाणपत्र मत बांटिए।

क्योंकि राष्ट्रगान बदलने से इतिहास नहीं बदलता। इतिहास को बदलने के लिए पहले उसे गलत पढ़ना पड़ता है—और आजकल यही काम सबसे तेजी से हो रहा है।

इतिहास बेचारा फिर वही कह रहा है— मुझे पढ़ो, अपने पक्ष में मत गढ़ो।

राष्ट्रभक्ति आवाज की ऊंचाई से नहीं, आचरण की गहराई से मापी जाती है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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