एक दशक में 94 हजार सरकारी विद्यालय बंद और 2.26 करोड़ नामांकन कम; दूसरी ओर निजी स्कूलों में बढ़ते कॉरपोरेट निवेश ने शिक्षा के व्यावसायीकरण पर खड़े किए गंभीर सवाल
गजेन्द्र सिंह

भारत में शिक्षा को हमेशा से लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकसेवा और राष्ट्र निर्माण का दायित्व माना गया है। इसी सोच के कारण विद्यालयी शिक्षा का बड़ा हिस्सा सरकार और गैर-लाभकारी संस्थाओं द्वारा संचालित होता रहा है लेकिन आज देश की शिक्षा व्यवस्था दो बिल्कुल अलग दिशाओं में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। एक ओर सरकारी विद्यालय लगातार सिमट रहे हैं उनकी संख्या घट रही है, विद्यार्थियों का नामांकन कम हो रहा है और संसाधनों का संकट गहराता जा रहा है। दूसरी ओर निजी विद्यालय अभूतपूर्व विस्तार के दौर में हैं। करोड़ों रुपये के निवेश से भव्य भवन, विशाल परिसर, अत्याधुनिक सुविधाएँ और प्रीमियम ब्रांड तैयार किए जा रहे हैं, जबकि फीस भी लगातार बढ़ रही है। शिक्षा का यह बदलता परिदृश्य एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है क्या भारत में शिक्षा धीरे-धीरे सार्वजनिक उत्तरदायित्व से निकलकर एक निवेश योग्य व्यवसाय में बदलती जा रही है?
इस चिंता को और गहरा करते हैं नीति आयोग के हालिया आँकड़े। पिछले दस वर्षों में देशभर में 94,000 सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं। वर्ष 2014-15 में जहाँ सरकारी विद्यालयों की संख्या 11.07 लाख थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर 10.13 लाख रह गई। अर्थात् एक दशक में औसतन प्रतिदिन 25 सरकारी विद्यालय बंद हुए। स्थिति केवल विद्यालयों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसी अवधि में सरकारी विद्यालयों में 2.26 करोड़ विद्यार्थियों का नामांकन कम हुआ है। सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों की संख्या और उनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ये आँकड़े केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं हैं, वे भारत की शिक्षा व्यवस्था की दिशा बदलने का संकेत देते हैं।
पिछले तीन दशकों में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि लगभग हर बच्चा विद्यालय तक पहुँचने लगा। यद्यपि सीखने के परिणाम अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सके, फिर भी सार्वभौमिक नामांकन एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। चुनौती शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की थी, लेकिन आज हम गुणवत्ता में सुधार करने के बजाय नामांकन के स्तर पर भी पीछे लौटते दिखाई दे रहे हैं। इसका सबसे गंभीर प्रभाव उन बच्चों पर पड़ता है जिनके पास निजी विद्यालय का विकल्प नहीं है। विशेषकर ग्रामीण भारत में पड़ोस का सरकारी विद्यालय ही लड़कियों की शिक्षा जारी रहने का सबसे बड़ा आधार होता है। विद्यालय बंद होने या दूर चले जाने पर परिवहन, सुरक्षा, सामाजिक मान्यताओं और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण सबसे पहले बेटियों की शिक्षा प्रभावित होती है।
इसी समय शिक्षा क्षेत्र में एक बिल्कुल अलग कहानी लिखी जा रही है। पिछले दशक में जिस प्रकार प्राइवेट इक्विटी फंडों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किया था, अब उनका अगला बड़ा लक्ष्य भारत का निजी स्कूली शिक्षा क्षेत्र बन गया है। वैश्विक निवेशकों की दृष्टि में स्कूल अब केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि स्थिर आय और दीर्घकालिक प्रतिफल देने वाली निवेश योग्य परिसंपत्तियाँ बन चुके हैं। इसके पीछे मजबूत आर्थिक कारण भी हैं। भारत में लगभग 25 करोड़ स्कूली आयु वर्ग के बच्चे हैं। बढ़ता मध्यम वर्ग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर अधिक खर्च करने को तैयार है। निजी विद्यालय नियमित शुल्क आय प्रदान करते हैं, जबकि महामारी के बाद एड-टेक क्षेत्र में आई मंदी ने निवेशकों का ध्यान फिर से भौतिक विद्यालयों की ओर आकर्षित किया है। इसी कारण हाल के वर्षों में कई बड़े निवेश हुए हैं। वर्ष 2026 में विट्रुवियन पार्टनर्स ने ऑर्किड्स द इंटरनेशनल स्कूल में हिस्सेदारी खरीदते हुए कंपनी का मूल्य लगभग 7,200 करोड़ रुपये आँका। वहीं कोलकाता नाइट राइडर्स समर्थित केकेआर समर्थित लाइटहाउस लर्निंग ग्रुप ने गुरुग्राम के मशहूर पाथवेज़ स्कूल को लगभग ₹1,500 करोड़ के सौदे में खरीदने का फैसला किया है। इससे पहले लाइटहाउस लर्निंग, हेरिटेज एक्सपीरियंशियल लर्निंग स्कूल का भी अधिग्रहण कर चुका है। आज भारत का विद्यालयी शिक्षा बाज़ार 10 खरब रुपये से अधिक का माना जा रहा है।
यहीं भारत की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। जिस समय सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था कमजोर हो रही है, उसी समय निजी विद्यालय निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक परिसंपत्तियों में बदलते जा रहे हैं। एक ओर गाँवों और छोटे कस्बों में सरकारी विद्यालय बंद हो रहे हैं, दूसरी ओर महानगरों, शहरो एवं कस्बों में करोड़ों रुपये की लागत से अंतरराष्ट्रीय स्तर के निजी परिसर तैयार किए जा रहे हैं। एक ओर शिक्षा सामाजिक अधिकार है, दूसरी ओर वह निवेश पोर्टफोलियो का हिस्सा बनती जा रही है। यहाँ प्रश्न निजी निवेश का विरोध करने का नहीं है। भारत को शिक्षा में अधिक निवेश, नवाचार, तकनीकी सुधार और बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है। निजी क्षेत्र ने अनेक स्थानों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर भी बढ़ाए हैं। समस्या निजी निवेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा की निरंतर उपेक्षा है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा को पूरी तरह बाज़ार की शक्तियों के भरोसे छोड़ा जा सकता है? प्राइवेट इक्विटी फंड का उद्देश्य निवेशकों के लिए अधिकतम लाभ अर्जित करना होता है। उनकी सफलता का पैमाना लाभ, विस्तार, मूल्यांकन और निवेश से निकास है। इसके विपरीत शिक्षा का उद्देश्य नागरिक निर्माण, सामाजिक समानता, अवसरों का विस्तार, लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण और मानव क्षमता का विकास है। इन उद्देश्यों को लाभ-हानि के वित्तीय पैमानों से नहीं आँका जा सकता।
यदि शिक्षा केवल निवेश योग्य परिसंपत्ति बनती गई, तो कई गंभीर चुनौतियाँ सामने आएँगी, फीस में निरंतर वृद्धि, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण, शिक्षकों पर लागत कम करने का दबाव, और सीखने की गुणवत्ता की तुलना में ब्रांडिंग एवं विस्तार पर अधिक ध्यान। परिणामस्वरूप शिक्षा सामाजिक समानता का माध्यम बनने के बजाय आर्थिक असमानता को और गहरा कर सकती है। विश्व के जिन देशों ने मानव पूंजी के आधार पर स्थायी विकास किया है जैसे फ़िनलैंड, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर, उन्होंने सार्वजनिक शिक्षा को कभी कमजोर नहीं होने दिया। निजी संस्थानों की भूमिका अवश्य रही, लेकिन सरकार ने विद्यालयी शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला माना। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी समान अवसर, गुणवत्ता और समावेशन पर बल देती है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति तभी संभव है जब सरकार सरकारी विद्यालयों में निवेश बढ़ाए, शिक्षकों को सशक्त बनाए, आधारभूत ढाँचे को मजबूत करे, सीखने के परिणामों में सुधार लाए और निजी शिक्षा के लिए ऐसा नियामक ढाँचा विकसित करे जो लाभ और लोकहित के बीच संतुलन बनाए रख सके।
भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति केवल निजी निवेश से साकार नहीं होगी। वह तभी वास्तविक राष्ट्रीय संपदा बनेगी जब देश का प्रत्येक बच्चा समान अवसरों के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सके। स्कूलों में निवेश आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है सार्वजनिक शिक्षा में राष्ट्र का निवेश। क्योंकि निजी पूंजी विद्यालय बना सकती है, परंतु राष्ट्र का भविष्य केवल ऐसी शिक्षा व्यवस्था ही गढ़ सकती है जो प्रत्येक बच्चे के लिए समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण हो।








