तुलसी जयंती — 19 अगस्त : तुलसीदास से आज की दुनिया तक: राम-दर्शन और समाज परिवर्तन

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तुलसी जयंती — 19 अगस्त

तुलसीदास से आज की दुनिया तक: राम-दर्शन और समाज परिवर्तन

रामचरितमानस ने धार्मिक कथा को लोकमंगल, न्याय, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ा

डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर

सही साहित्य वह है, जो सामाजिक विवेक, मानवीय करुणा और परिवर्तन की आकांक्षा से जुड़ा हो। यह विचार साहित्य के उस आदर्श को व्यक्त करता है, जिसमें रचना केवल कला या मनोरंजन नहीं रहती, बल्कि समाज के जीवन में बदलाव लाने का माध्यम भी बनती है। तुलसीदास कृत रामचरितमानस इसी आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रेम की कविताएं हों अथवा समकालीन सामाजिक उपन्यास—जब कोई रचना मनुष्य के भीतर करुणा जगाती और सामाजिक विवेक को झकझोरती है, तभी वह वास्तविक साहित्यिक उपलब्धि बनती है।

तुलसीदास ने रामचरितमानस में केवल रामकथा का मनोरम वर्णन नहीं किया, बल्कि राम को आदर्श पुरुष और आदर्श समाज-निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने पाठक के मन में नैतिक प्रश्नों और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना जगाई। राम का राज्याभिषेक केवल राजतिलक का प्रसंग नहीं, बल्कि न्याय, दया और कर्तव्य पर आधारित शासन-व्यवस्था का प्रतीक है।

रामचरितमानस में राम को लोकमंगल, न्याय और करुणा के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जैसी प्रसिद्ध उक्ति वाल्मीकि रामायण की परम्परा से संबंधित मानी जाती है, हालांकि इसके मूल पाठ और प्रसंग को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। इसके मूल में निहित भावना यही है कि जन्मभूमि की गरिमा बनाए रखने के लिए समाज में विवेक, सहयोग और उत्तरदायित्व आवश्यक हैं। रामकथा ने व्यापक जनमानस में सामाजिक नैतिकता, सद्भाव और सहिष्णुता के बीज बोए।

तुलसी के समाज-दर्शन का आधार करुणा

तुलसी के समाज-दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व करुणा है। सीता और राम के संघर्षों तथा बालकांड से उत्तरकांड तक फैले प्रसंगों में करुणा, मर्यादा और दूरदर्शिता की शिक्षा निरंतर दिखाई देती है। राम का वनवास स्वीकार करना और प्रजा के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करना बताता है कि सच्चे नेतृत्व में मानवीय संवेदना और न्याय का संतुलन आवश्यक है।

तुलसी ने अत्यंत सहज लोकभाषा में यह संदेश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया। यही साहित्य की वास्तविक परिवर्तनकारी शक्ति है। उनकी रचना ने दर्शन और नीति को विद्वानों की सीमित दुनिया से निकालकर सामान्य जनजीवन का हिस्सा बना दिया।

कबीर से प्रेमचंद तक परिवर्तन की चेतना

तुलसीदास के समकालीन और बाद के अनेक रचनाकार भी इस सामाजिक कसौटी पर खरे उतरते हैं। कबीर और तुलसी की शैली तथा दृष्टि में भिन्नताएं अवश्य थीं, लेकिन दोनों ने अपने-अपने ढंग से समाज की बुराइयों, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता को चुनौती दी।

कबीर की वाणी मनुष्य के भीतर दबे सत्य को जगाती है। वह कर्म, आत्मबोध और मानवीय समानता की पक्षधर है। इसी प्रकार लोक-साहित्य और प्रेमचंद के सामाजिक उपन्यासों में भी समाज को बदलने की तीव्र आकांक्षा तथा करुणात्मक दृष्टि दिखाई देती है। प्रेमचंद ने गोदान में किसान की पीड़ा दिखाकर केवल सहानुभूति नहीं जगाई, बल्कि उस पीड़ा के आर्थिक और सामाजिक कारणों को सामने रखते हुए पाठक को व्यवस्था पर विचार करने के लिए विवश किया।

विवेक केवल बुद्धि नहीं, मानवीय प्रतिबद्धता भी

साहित्य का परिवर्तनकारी प्रभाव तभी सशक्त होता है, जब वह जीवन के वास्तविक अनुभवों से जुड़ा हो, सामान्य मानवीय संवेदनाओं को शब्द दे और विवेक का सूत्र भी थामे रखे। रामचरितमानस अपने कथात्मक प्रसंगों के माध्यम से बताता है कि विवेक का अर्थ केवल बुद्धि का प्रयोग नहीं, बल्कि मानवीय प्रतिबद्धता भी है।

दूसरे के दुःख को महसूस करना, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और समाज के लिए बेहतर व्यवस्था की कल्पना करना भी विवेक के ही रूप हैं। तुलसी का राम-चरित्र पाठक को रोजमर्रा के नैतिक द्वंद्वों का सामना करने का साहस देता है। इसी साहस से समाज में छोटे-बड़े परिवर्तन संभव होते हैं।

आज भी प्रासंगिक है तुलसी का संदेश

आज मीडिया, राजनीति और सामाजिक संस्थाएं तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं। ऐसे समय में उस साहित्य की आवश्यकता और बढ़ जाती है, जो समस्याओं की तह तक जाकर प्रश्न उठाए। आधुनिक कवि, लेखक, पटकथा लेखक और उपन्यासकार भी अपने समय के अन्याय को उजागर करने, मानवीय पीड़ा को सामने लाने और समाधान की चेतना उत्पन्न करने का कार्य कर रहे हैं।

समय और उदाहरण अवश्य बदल गए हैं, लेकिन मूल धारणा आज भी वही है—साहित्य केवल सुंदर भाषा नहीं, बल्कि समाज की समझ और संवेदना का प्रतिनिधि होना चाहिए। महादेवी वर्मा की संवेदनशील रचनाएं महिलाओं की आंतरिक दुनिया को सामने लाते हुए सामाजिक संरचनाओं की समीक्षा करती हैं। इसी प्रकार अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी साहित्य ने औपनिवेशिक शोषण और अन्याय के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाई। इन सभी के केंद्र में समानता, मानवता, करुणा और परिवर्तन की आकांक्षा है।

साहित्य प्रश्न भी उठाए और मार्ग भी दिखाए

साहित्यिक रचनाएं तभी सामाजिक रूप से सार्थक बनती हैं, जब वे पाठक के हृदय में प्रश्न, विमर्श और आवश्यक असहमति का बीज बोती हैं। रामचरितमानस का बड़ा योगदान यह है कि उसने धार्मिक कथा को जनजीवन, शासन और नैतिक व्यवहार से जोड़ दिया। इससे धर्म निजी अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ता है।

आज के लेखकों और सार्वजनिक चिंतकों को भी कथा में सामाजिक विश्लेषण, करुणा की भाषा और परिवर्तन की दिशा को एक साथ प्रस्तुत करना चाहिए। सही साहित्य केवल आलोचना नहीं करता, बल्कि आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाता है।

तुलसीदास ने रामचरितमानस में विजय और पराजय, दया और कर्तव्य तथा त्याग और मर्यादा के माध्यम से आदर्श जीवन-पथ प्रस्तुत किया। लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा तब होगी, जब आज का पाठक और लेखक इन आदर्शों को आधुनिक संदर्भों में लागू करने का साहस दिखाए—चाहे प्रश्न आर्थिक असमानता का हो, लैंगिक भेदभाव का अथवा धार्मिक कट्टरता का।

जब साहित्य इन ज्वलंत समस्याओं को करुणा, विवेक और मानवीय संवेदना के साथ उठाएगा, तभी वह समाज में परिवर्तन की आहट बनकर गूंजेगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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