19 जुलाई 1969 को इंदिरा गांधी द्वारा किए गए बैंक राष्ट्रीयकरण को बताया ऐतिहासिक फैसला, केंद्र सरकार की नीतियों पर उठाए सवाल
रेवाडी, 19 जुलाई। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने कहा कि आज से 57 वर्ष पूर्व 19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्णय लिया था। उनका कहना है कि इस फैसले ने आमजन, किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं, छोटे व्यापारियों और गरीब तबकों के लिए बैंकिंग व्यवस्था के द्वार खोले, जिससे उनकी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति मजबूत हुई तथा देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली।
विद्रोही ने अपने बयान में कहा कि इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए इस कदम का उद्देश्य आम लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना था, लेकिन वर्तमान मोदी-भाजपा-एनडीए सरकार बैंकों को पुनः निजीकरण की दिशा में ले जाकर उस भावना को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि बैंकों का निजीकरण हुआ तो बैंक आम जनता से दूर होकर सीमित बड़े पूंजीपतियों के प्रभाव में चले जाएंगे।
उन्होंने कहा कि आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई बैंकों में जमा करते हैं, लेकिन निजीकरण की स्थिति में उस पूंजी का लाभ आम जनता के बजाय बड़े उद्योगपतियों को मिलेगा। उनके अनुसार, बैंक निजीकरण की प्रक्रिया गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, महिलाओं, युवाओं और छोटे व्यापारियों की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
वेदप्रकाश विद्रोही ने देश के गरीब, किसान, मजदूर, पिछड़े, दलित, आदिवासी, महिला, युवा और छोटे व्यापारियों से एकजुट होकर बैंकों के निजीकरण का विरोध करने की अपील की। उन्होंने कहा कि 19 जुलाई 1969 को बैंक राष्ट्रीयकरण जिस जनहितकारी भावना से किया गया था, उसे बनाए रखने के लिए समाज को संगठित होकर प्रयास करना चाहिए।









