तेल आपूर्ति के तीन रास्तों पर संकट, दुनिया पर ‘ऑयल शॉक’ का खतरा

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होर्मुज में घटी जहाजों की आवाजाही, लाल सागर में हूती हमलों का जोखिम और सऊदी पाइपलाइन बंद; कच्चा तेल 100 डॉलर के पार

भारत के पास विविध आयात स्रोत और मजबूत रिफाइनिंग क्षमता, फिर भी महंगाई व रुपये पर दबाव की आशंका

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय असाधारण अनिश्चितता से गुजर रहा है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में हूती हमलों का खतरा बना हुआ है, जबकि ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन भी अस्थायी रूप से बंद है। इन घटनाओं ने दुनिया के तीन महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों पर एक साथ दबाव बढ़ा दिया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब पांचवें हिस्से के तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है। रॉयटर्स की 17 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार बुधवार को इस मार्ग से केवल तीन वाणिज्यिक जहाज गुजरे, जबकि दस दिनों का औसत करीब 17 जहाज था। इसका अर्थ यह नहीं कि तेल आपूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है, लेकिन समुद्री व्यापार में आई भारी गिरावट संकट की गंभीरता बताती है।

इसी बीच हूती हमलों से लाल सागर और बाब-अल-मंदेब मार्ग भी असुरक्षित बना हुआ है। जहाजरानी कंपनियों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाने, अधिक बीमा प्रीमियम चुकाने और मालभाड़ा बढ़ाने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

सऊदी पाइपलाइन बंद होने से बढ़ी चिंता

सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह से जोड़ती है। इसकी क्षमता प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल पहुंचाने की बताई जाती है। यह पाइपलाइन होर्मुज का प्रमुख वैकल्पिक मार्ग है। इसलिए इसका बंद होना वैश्विक आपूर्ति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार अगस्त में सऊदी अरब का कच्चा तेल उत्पादन घटकर करीब 62.4 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यदि पाइपलाइन शीघ्र चालू नहीं हुई तो यानबू में उपलब्ध निर्यात योग्य भंडार पर भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि संभावित व्यवधान को तत्काल वास्तविक आपूर्ति कटौती मानना जल्दबाजी होगी।

120 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल?

मध्य-पूर्व के तनाव के बीच ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। बाजार में 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका व्यक्त की जा रही है, लेकिन यह निश्चित भविष्यवाणी नहीं है।

यदि होर्मुज में व्यवधान लंबा चला, हूती हमले बढ़े और सऊदी पाइपलाइन की मरम्मत में देरी हुई तो कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसके विपरीत पाइपलाइन जल्द बहाल होने और वैकल्पिक मार्गों से आपूर्ति बढ़ने पर दबाव कम हो सकता है। सऊदी अरब ने ओमान के सोहार बंदरगाह के पास जहाज से जहाज में तेल स्थानांतरण सहित वैकल्पिक व्यवस्थाएं तेज की हैं।

महंगाई से लेकर परिवहन तक असर

महंगा कच्चा तेल केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे विमानन ईंधन, परिवहन, प्लास्टिक, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक और बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ती है। तेल आयातक देशों के व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा विनिमय दर पर भी दबाव पड़ सकता है।

कम विदेशी मुद्रा भंडार वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों के लिए लंबे समय तक महंगा तेल विशेष चुनौती बन सकता है। ईंधन पर सब्सिडी देने वाली सरकारों का राजकोषीय बोझ भी बढ़ेगा।

भारत की तैयारी मजबूत, पर खतरा बरकरार

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए कच्चे तेल और समुद्री मालभाड़े में लंबे समय तक वृद्धि का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। हालांकि विविध आयात स्रोत, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, विशाल रिफाइनिंग क्षमता और सार्वजनिक तेल कंपनियों का मजबूत नेटवर्क भारत को बाहरी झटकों से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करता है।

फिर भी कच्चा तेल लंबे समय तक 100 से 120 डॉलर के बीच रहा तो महंगाई, व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए भारत की स्थिरता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे संकट से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

कुल मिलाकर वैश्विक तेल आपूर्ति अभी पूरी तरह ठप नहीं हुई है, लेकिन होर्मुज, बाब-अल-मंदेब और सऊदी पाइपलाइन पर एक साथ पैदा हुआ संकट गंभीर चेतावनी है। आने वाले दिनों में तेल बाजार की दिशा युद्ध की स्थिति, पाइपलाइन की बहाली और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों की क्षमता पर निर्भर करेगी।

-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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