राजेश श्रीवास्तव

20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र के लिए केंद्र सरकार ने जिन विधेयकों की सूची जारी की है, उसमें परिसीमन से संबंधित किसी संविधान संशोधन विधेयक का उल्लेख नहीं है। हालांकि राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर चर्चा जारी है कि सरकार सत्र के दौरान परिस्थितियों के अनुसार ऐसा विधेयक पेश कर सकती है। इस संबंध में अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। ऐसा विधेयक संबंधित मंत्री या निजी सदस्य द्वारा भी पेश किया जा सकता है। संसदीय परंपरा में ऐसे उदाहरण भी रहे हैं जब कुछ महत्वपूर्ण विधेयक प्रारंभिक कार्यसूची में शामिल न होकर बाद में पेश किए गए। इसलिए केवल एजेंडे में नाम न होने से किसी संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
विशेष बहुमत सबसे बड़ी चुनौती
परिसीमन से जुड़े किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होगा। इसका अर्थ है कि सदन में आवश्यक उपस्थिति के साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई का समर्थन मिलना चाहिए।
इसी कारण सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त राजनीतिक समर्थन सुनिश्चित करने की होगी। वर्तमान संसदीय गणित को देखते हुए सत्तापक्ष को सहयोगी दलों के साथ-साथ कुछ अन्य दलों के समर्थन या कम से कम मतदान के समय उनकी तटस्थता की आवश्यकता पड़ सकती है।
राजनीतिक चर्चाएं और वास्तविकता
पिछले कुछ समय से विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच संभावित समर्थन, बातचीत और रणनीति को लेकर अनेक तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में क्षेत्रीय दलों के रुख को लेकर अलग-अलग दावे किए गए हैं। हालांकि इन दावों की अधिकांश मामलों में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें अंतिम राजनीतिक स्थिति मानना उचित नहीं होगा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी दल का अंतिम रुख सामान्यतः विधेयक का प्रारूप सामने आने, संसदीय चर्चा और पार्टी नेतृत्व के औपचारिक निर्णय के बाद ही स्पष्ट होता है।
परिसीमन क्यों है महत्वपूर्ण?
परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण करना होता है। यदि भविष्य में लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव लाया जाता है, तो उसके साथ परिसीमन की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। साथ ही महिला आरक्षण कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी इस विषय की चर्चा राजनीतिक और संवैधानिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई है।
राज्यों की चिंता
दक्षिण भारत सहित कुछ राज्यों ने पहले भी यह चिंता व्यक्त की है कि यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया तो परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। दूसरी ओर अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
वहीं केंद्र सरकार पहले भी यह कह चुकी है कि सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि अंतिम स्वरूप किसी प्रस्तावित विधेयक के प्रावधानों पर ही निर्भर करेगा।
संसद में होगी असली परीक्षा
यदि सरकार मानसून सत्र के दौरान परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक लाती है, तो उसकी सबसे बड़ी परीक्षा संसद के दोनों सदनों में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल करना होगी। यदि विधेयक नहीं लाया जाता, तो यह माना जाएगा कि सरकार अभी व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की प्रक्रिया में है।
फिलहाल यह विषय राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है, लेकिन अंतिम स्थिति संसद में सरकार द्वारा उठाए जाने वाले औपचारिक कदमों और विभिन्न दलों के घोषित रुख के बाद ही स्पष्ट होगी।









