राष्ट्रीय गीत का सम्मान जरूरी, लेकिन देशभक्ति को राजनीतिक तराजू पर तौलना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं
सौरभ वार्ष्णेय

वंदे मातरम् केवल दो शब्दों का उच्चारण नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों, राष्ट्रभक्ति की भावना और विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसके गायन से वातावरण देशभक्ति से गुंजायमान हो उठता है। जिस गीत ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वही आज राजनीतिक बहस और विवाद का विषय बन गया है।
सवाल यह नहीं है कि वंदे मातरम् का सम्मान होना चाहिए या नहीं। भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके योगदान को देखते हुए इसका सम्मान निर्विवाद रूप से होना चाहिए। असली सवाल यह है कि राष्ट्रीय भावना से जुड़े इस गीत को बार-बार राजनीतिक विवाद के केंद्र में क्यों खड़ा कर दिया जाता है?
अभी 15 अगस्त को कांग्रेस कार्यालय में वंदे मातरम् को लेकर विरोधी दलों ने फिर राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। ऐसा लगता है कि अब देशभक्ति को भी राजनीतिक तराजू में तौला जा रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह स्थिति उचित नहीं है। देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना चुका है और 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा। क्या तब भी हम ऐसे ही विवादों में उलझे रहेंगे या देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाने पर विचार करेंगे? आज के राजनेताओं को इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचना होगा।
विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति
भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी विविधता है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं और विचारधाराएं सदियों से साथ-साथ रही हैं। स्वतंत्रता आंदोलन ने भी इसी विविधता को एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ने का काम किया था।
वंदे मातरम् उसी दौर की राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण स्वर था। इसलिए जब इसे राजनीतिक बयानबाजी का हथियार बनाया जाता है तो विवाद केवल एक गीत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय भावना पर भी प्रश्न खड़े होने लगते हैं जिसने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान देश को एकजुट किया था।
स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरक स्वर
वंदे मातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में सामने आया। बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे उत्साह और संघर्ष की भावना के साथ अपनाया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में इसके उद्घोष ने लोगों में राष्ट्रप्रेम और आत्मविश्वास पैदा किया।
लेकिन इतिहास के साथ उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को भी समझना होगा। भारत तब भी एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज था। राष्ट्रवादी आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए आवश्यक था कि सभी समुदायों को उसमें समान भागीदारी का अनुभव हो।
वंदे मातरम् के कुछ अंशों में प्रयुक्त धार्मिक प्रतीकों को लेकर समय-समय पर आपत्तियां सामने आईं। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1937 में कांग्रेस ने सार्वजनिक अवसरों पर गीत के शुरुआती दो पदों के उपयोग का निर्णय लिया। यह निर्णय बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व ने राष्ट्रीय भावना और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया था।
राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत का अपना सम्मान
स्वतंत्र भारत में भी वंदे मातरम् को विशेष सम्मान मिला। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। इसी अवसर पर संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के अनुरूप समान सम्मान दिए जाने की बात कही।
इस प्रकार राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत—दोनों की भारत के राष्ट्रीय जीवन में अपनी विशिष्ट पहचान बनी। समस्या तब पैदा होती है, जब इस ऐतिहासिक संतुलन को राजनीतिक मुकाबले में बदलकर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि कौन अधिक राष्ट्रवादी है और कौन कम।
गीत या नारे से नहीं मापी जा सकती राष्ट्रभक्ति
राष्ट्रभक्ति किसी एक गीत, नारे अथवा प्रतीक तक सीमित नहीं हो सकती। देश के प्रति सम्मान का अर्थ संविधान के प्रति निष्ठा, कानून का पालन, नागरिक अधिकारों की रक्षा, कर्तव्यों का निर्वहन और राष्ट्रहित में ईमानदार योगदान भी है।
वंदे मातरम् का सम्मान करना राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति की देशभक्ति को केवल इस आधार पर मापना कि उसने किसी अवसर पर कौन-सा नारा लगाया या गीत गाया, लोकतांत्रिक समाज के लिए स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं है।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना भी समाज में बनी रहनी चाहिए। किसी राष्ट्रीय गीत अथवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीक का जानबूझकर अपमान करना उचित नहीं है। लोकतंत्र केवल अधिकारों का नहीं, जिम्मेदारियों का भी नाम है। इसलिए वंदे मातरम् के सम्मान और उसके राजनीतिक दुरुपयोग के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।
इतिहास को चुनावी हथियार न बनाएं
राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इतिहास को समझें, लेकिन उसे चुनावी हथियार न बनाएं। वंदे मातरम् पर चर्चा यदि इतिहास, साहित्य, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में होती है तो वह सार्थक हो सकती है। परंतु यदि इसका इस्तेमाल किसी विरोधी दल अथवा समुदाय को राष्ट्रविरोधी साबित करने के लिए किया जाए तो ऐसी बहस समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करेगी।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारों तक सीमित होना चाहिए? देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, युवाओं की शिक्षा और रोजगार, सीमाओं की सुरक्षा, प्रदूषण तथा गरीबी जैसी गंभीर चुनौतियां हैं। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए ईमानदारी से काम करना भी राष्ट्रभक्ति है।
सीमा पर देश की रक्षा करता सैनिक, खेत में अन्न पैदा करता किसान, नई पीढ़ी तैयार करता शिक्षक, अनुसंधान करता वैज्ञानिक और अपने श्रम से अर्थव्यवस्था को गति देता मजदूर—सभी का योगदान राष्ट्रभक्ति का जीवंत उदाहरण है।
वास्तविक मुद्दों से ध्यान न भटकाए राजनीति
दुर्भाग्य से हमारी राजनीतिक बहस में वास्तविक मुद्दों की जगह प्रतीकों को केंद्र में लाने की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है। प्रतीकों की अपनी भूमिका होती है, लेकिन वे तभी सार्थक होते हैं जब उनके पीछे छिपी भावना और जिम्मेदारी को भी समझा जाए।
वंदे मातरम् का मूल संदेश मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण है। यदि हम इस भावना को समझ लें तो विवाद स्वतः छोटा हो जाएगा। राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान स्वाभाविक होना चाहिए, किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं। देशभक्ति आदेश देकर पैदा नहीं की जा सकती। वह इतिहास, शिक्षा, संस्कार और देश के प्रति अपनेपन से विकसित होती है।
जब राष्ट्रप्रेम को राजनीतिक पहचान की कसौटी बना दिया जाता है, तब लोकतांत्रिक समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
राष्ट्रवाद किसी दल की संपत्ति नहीं
वंदे मातरम् के संदर्भ में राजनीतिक दलों को संयम दिखाना चाहिए। सत्ता पक्ष को समझना होगा कि राष्ट्रवाद किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि ऐतिहासिक राष्ट्रीय प्रतीकों को केवल राजनीतिक विरोध के कारण खारिज करना उचित नहीं है। दोनों पक्षों को इतिहास के प्रति सम्मान और वर्तमान के प्रति जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए।
भारत की राष्ट्रीय पहचान बहुस्तरीय है। इसमें वंदे मातरम् है, जन गण मन है, तिरंगा है, संविधान है और स्वतंत्रता आंदोलन की असंख्य स्मृतियां हैं। इसमें शहीद-ए-आजम भगत सिंह का साहस, महात्मा गांधी का सत्याग्रह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस का संघर्ष, सरदार पटेल की एकता की भावना और डॉ. भीमराव आंबेडकर की संवैधानिक लोकतंत्र की दृष्टि भी शामिल है। भारत को किसी एक प्रतीक तक सीमित नहीं किया जा सकता।
राजनीति का हथियार नहीं, एकता का मंत्र बने
वंदे मातरम् पर विवाद खड़ा करने से पहले हमें पूछना चाहिए कि क्या हम उस भारत की भावना को समझ रहे हैं, जिसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था? वह ऐसा भारत था जिसमें विभिन्न समुदायों ने मिलकर विदेशी शासन का मुकाबला किया। स्वतंत्रता का संघर्ष किसी एक जाति, धर्म अथवा भाषा का नहीं, पूरे भारत का आंदोलन था।
आज आवश्यकता है कि वंदे मातरम् को विवाद का विषय बनाने के बजाय इतिहास और राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में देखा जाए। जहां सम्मान आवश्यक है, वहां सम्मान हो; जहां संवैधानिक स्वतंत्रता का प्रश्न हो, वहां संविधान सर्वोपरि रहे और जहां राजनीतिक मतभेद हों, वहां लोकतांत्रिक संवाद हो।
वंदे मातरम् का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसके नाम पर समाज में दूरी पैदा होने के बजाय देश के प्रति साझा जिम्मेदारी की भावना मजबूत हो। राजनीति को राष्ट्रभावना से प्रेरणा लेनी चाहिए, राष्ट्रभावना को राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। इसलिए वंदे मातरम् पर होने वाली बहस को नारों की राजनीति से ऊपर उठना होगा। इतिहास को इतिहास की तरह पढ़ा जाए, राष्ट्रीय प्रतीकों को सम्मान दिया जाए और लोकतांत्रिक अधिकारों को भी उतनी ही गंभीरता से समझा जाए।
राष्ट्र केवल गीतों और नारों से नहीं बनता। राष्ट्र नागरिकों के विश्वास, संविधान की मर्यादा, सामाजिक सद्भाव और करोड़ों लोगों के ईमानदार योगदान से बनता है। वंदे मातरम् पर बहस हो तो भारत को जोड़ने के लिए हो, बांटने के लिए नहीं। यही इस गीत की ऐतिहासिक भावना के प्रति सच्चा सम्मान होगा।








