विभाजन की पीड़ा के मंच पर राव इंद्रजीत ने दिखाई राजनीतिक पीड़ा; छह चुनावों का बखान किया, लेकिन तीन जीत कांग्रेस के टिकट पर मिलीं
बोधराज सीकरी से पूछा—‘कभी चुनाव लड़ा है?’ सवाल यह कि क्या समाजसेवा और संगठन में काम करने के लिए चुनाव लड़ना अनिवार्य है?
अस्पताल, बस अड्डा, जलभराव, कूड़ा और निगम के भ्रष्टाचार पर वैसी गर्जना कब सुनाई देगी?
ऋषिप्रकाश कौशिक

गुरुग्राम। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का राज्य स्तरीय समारोह उन लाखों परिवारों की पीड़ा, संघर्ष और विस्थापन को याद करने के लिए आयोजित किया गया था, जिन्होंने 1947 में अपना घर-बार और अपनों को खोया। मगर गुरुग्राम में आयोजित सरकारी कार्यक्रम का मंच केंद्रीय राज्यमंत्री एवं गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह की राजनीतिक नाराजगी का मंच बन गया।
राव इंद्रजीत सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें कार्यक्रम में बुलाया नहीं जाता, यदि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और प्रदेश अध्यक्ष की उपस्थिति नहीं होती। सवाल उठता है कि क्या यह दावा सरकारी दस्तावेज से मेल खाता है?
जिला प्रशासन की ओर से जारी निमंत्रण-पत्र पर हरियाणा सरकार का चिह्न है और नीचे आरएसवीपी के रूप में उपायुक्त, गुरुग्राम अंकित है। निमंत्रण-पत्र में राव इंद्रजीत सिंह का नाम बाकायदा ‘गरिमामयी उपस्थिति’ के अंतर्गत छपा हुआ है।
इसलिए दो बातें अलग-अलग समझनी होंगी—उन्हें व्यक्तिगत रूप से किसने फोन किया और सरकारी निमंत्रण में उन्हें आमंत्रित किया गया था या नहीं। फोन नहीं आने या मंच संचालन में अपेक्षित सम्मान नहीं मिलने की शिकायत हो सकती है, लेकिन निमंत्रण-पत्र में नाम छपे होने के बाद यह कहना कि उन्हें बुलाया ही नहीं गया, सवालों से परे नहीं रह सकता।
सरकारी कार्यक्रम था या भाजपा का आयोजन?
इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कार्यक्रम किसी पार्टी की जिला इकाई ने नहीं, बल्कि हरियाणा सरकार और जिला प्रशासन ने आयोजित किया था। सरकारी कार्यक्रम में अतिथियों का निर्धारण प्रशासन और सरकार करती है।
ऐसे में मंच से संगठन के पदाधिकारियों, स्थानीय नेताओं अथवा किसी सामाजिक वर्ग को कठघरे में खड़ा करना कितना उचित था? यदि सांसद को प्रोटोकॉल, निमंत्रण अथवा बोलने के अवसर को लेकर आपत्ति थी तो यह सवाल सीधे सरकार और प्रशासन से पूछा जाना चाहिए था।
क्या राजनीतिक नाराजगी का निशाना वे लोग बने, जिनके हाथ में सरकारी कार्यक्रम की अतिथि सूची तय करने का अधिकार ही नहीं था?
छह बार सांसद, लेकिन भाजपा से केवल तीन बार
राव इंद्रजीत सिंह ने अपने छह बार सांसद चुने जाने का उल्लेख कर राजनीतिक ताकत का अहसास कराया। छह बार सांसद बनना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन पूरा तथ्य भी जनता के सामने रहना चाहिए।
राव इंद्रजीत सिंह छह बार लोकसभा चुनाव जीते हैं, परंतु सभी छह चुनाव भाजपा के टिकट पर नहीं जीते। उनकी पहली तीन जीतें—1998, 2004 और 2009—कांग्रेस के टिकट पर हुई थीं। इसके बाद उन्होंने 2014, 2019 और 2024 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। वे 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे। उनके छह बार सांसद और चार बार विधायक रहने की पुष्टि सार्वजनिक चुनावी अभिलेखों में भी होती है।
इसलिए छह चुनावों की उपलब्धि को केवल भाजपा की राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना आधा इतिहास होगा। उसमें कांग्रेस के टिकट और मतदाताओं से मिली तीन जीतों का भी बराबर योगदान है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किसी नेता की वास्तविक उपलब्धि चुनाव जीतने की संख्या से नहीं, बल्कि इतने लंबे जनादेश के बाद क्षेत्र में हुए स्थायी सुधारों से आंकी जानी चाहिए।
जनता परेशान हुई, तब ऐसी गर्जना क्यों नहीं?
मंच पर अपने सम्मान के प्रश्न पर सांसद का स्वर जितना मुखर था, गुरुग्राम की जनता पूछ सकती है कि उसकी समस्याओं पर ऐसी ही गर्जना कब सुनाई देगी?
शहर को वर्षों से आधुनिक जिला नागरिक अस्पताल का इंतजार है। नए बस अड्डे और सिटी बस टर्मिनल की घोषणाएं होती रही हैं, लेकिन धरातल पर अपेक्षित परिणाम अभी भी प्रतीक्षा का विषय हैं। दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री ने अस्पताल का निर्माण शीघ्र शुरू कराने और सेक्टर-29 में सिटी बस टर्मिनल बनाने की घोषणा फिर की थी।
हर वर्ष बारिश में जलभराव, बदहाल नाले, कूड़े के ढेर, टूटी सड़कें और नगर निगम की कार्यशैली गुरुग्राम को शर्मसार करती हैं। भ्रष्टाचार और कामकाज पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। निगम में ऐसे दौर भी रहे, जब महापौर और उपमहापौर सहित प्रमुख पदों पर राव इंद्रजीत समर्थक माने जाने वाले चेहरे प्रभावी थे।
यदि सांसद विधायकों, महापौरों और दूसरे पदाधिकारियों को बनवाने में अपनी भूमिका बताते हैं, तो उनके कार्यकाल की उपलब्धियों और विफलताओं की राजनीतिक जिम्मेदारी से स्वयं को पूरी तरह अलग कैसे कर सकते हैं?
राजनीतिक प्रभाव का श्रेय लिया जाएगा तो उस प्रभाव के बावजूद कायम अव्यवस्था पर जवाब भी देना होगा।
बोधराज सीकरी से सवाल—क्या चुनाव लड़ना ही योग्यता है?
राव इंद्रजीत सिंह ने मंच से पंजाबी बिरादरी महा संगठन के अध्यक्ष बोधराज सीकरी से पूछा—“आपने कभी चुनाव लड़ा है?” उन्होंने स्वामी धर्मदेव के राजनीतिक प्रयास का भी उल्लेख किया। यह टिप्पणी कार्यक्रम के उद्देश्य और मंच की गरिमा—दोनों के संदर्भ में असहज सवाल खड़े करती है।
लोकतंत्र में क्या समाजसेवा करने, किसी समुदाय की बात रखने अथवा राजनीतिक दल में संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाने के लिए चुनाव लड़ना अनिवार्य है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा में ऐसे असंख्य कार्यकर्ता और पदाधिकारी रहे हैं, जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी संगठन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए चुनाव लड़ने को समाजसेवा अथवा संगठनात्मक योग्यता की कसौटी बनाना भाजपा की अपनी कार्यकर्ता-आधारित परंपरा पर भी सवाल खड़ा करता है।
क्या निशाना परोक्ष रूप से प्रदेश अध्यक्ष पर था?
यह सवाल भी राजनीतिक हलकों में उठना स्वाभाविक है कि बोधराज सीकरी से पूछा गया—“क्या आपने कभी चुनाव लड़ा है”—क्या यह टिप्पणी केवल उन्हीं तक सीमित थी या इसके पीछे संगठन में जिम्मेदारियां पाने वाले गैर-निर्वाचित चेहरों को लेकर व्यापक नाराजगी थी?
हरियाणा भाजपा की कमान इस समय डॉ. अर्चना गुप्ता के हाथ में है। उन्हें मई 2026 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।
क्या बोधराज सीकरी से चुनाव लड़ने का प्रश्न पूछकर परोक्ष रूप से प्रदेश नेतृत्व की राजनीतिक पात्रता पर भी संदेश दिया गया? इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, इसलिए इसे तथ्य नहीं कहा जा सकता; लेकिन भाषण के संदर्भ, संगठन से नाराजगी और प्रदेश अध्यक्ष का उल्लेख होने के कारण यह राजनीतिक व्याख्या अवश्य जन्म लेती है। स्वयं राव इंद्रजीत सिंह ही स्पष्ट कर सकते हैं कि उनका निशाना केवल सीकरी थे या संगठन में बिना चुनाव लड़े पद पाने वाले अन्य नेता भी।
पंजाबी समाज को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश क्यों?
विभाजन का सबसे गहरा घाव झेलकर गुरुग्राम और हरियाणा में बसे पंजाबी परिवारों ने अपने परिश्रम से व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं को मजबूत किया। ऐसे स्मृति दिवस पर उनसे जुड़े प्रतिनिधियों को राजनीतिक चुनाव और हार-जीत की कसौटी पर कसना संवेदनशीलता नहीं कहा जा सकता।
धर्मवीर गाबा अथवा अन्य नेताओं की चुनावी सफलता का उदाहरण देकर पूरे समाज के योगदान को केवल मतों के गणित में समेटना भी उचित नहीं है। किसी समुदाय का सम्मान केवल इस आधार पर निर्धारित नहीं हो सकता कि उसके नाम पर चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति जीता या हारा।
अपने सम्मान पर आक्रोश, जनता के अधिकारों पर मौन क्यों?
राव इंद्रजीत सिंह वरिष्ठ नेता हैं। छह बार सांसद और चार बार विधायक रहने के कारण उनका राजनीतिक अनुभव तथा प्रभाव निर्विवाद है। इसलिए उनसे अपेक्षा भी सामान्य सांसद से अधिक है।
लेकिन जनता का सीधा सवाल है—यदि सरकारी मंच पर अपेक्षित सम्मान न मिलने का आभास इतना पीड़ादायक था कि सार्वजनिक रूप से नाराजगी जतानी पड़ी, तो वर्षों से नागरिक सुविधाओं के लिए भटक रही जनता की पीड़ा पर वैसा ही आक्रोश क्यों नहीं दिखाई देता?
- जिला नागरिक अस्पताल का निर्माण समय पर क्यों नहीं हुआ?
- आधुनिक बस अड्डा अब तक धरातल पर क्यों नहीं उतरा?
- हर बारिश में गुरुग्राम क्यों डूबता है?
- नगर निगम में भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर सांसद की आवाज इतनी प्रखर क्यों नहीं सुनाई देती?
- उनके राजनीतिक प्रभाव वाले पदाधिकारी निगम में रहे तो व्यवस्था में स्थायी सुधार क्यों नहीं आया?
विभाजन विभीषिका के मंच पर निजी राजनीतिक पीड़ा नहीं, विस्थापित परिवारों का दर्द केंद्र में होना चाहिए था। लोकतंत्र में छह चुनाव जीतने का उल्लेख गौरव हो सकता है, लेकिन वह जनता के प्रश्नों से बचने का कवच नहीं बन सकता।
राजनीति में असली सम्मान निमंत्रण-पत्र पर नाम छपने से नहीं, जनता की समस्याएं हल करने से मिलता है।








