आर्थिक विकास तभी सार्थक, जब अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे अवसर, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान
महिला को लाभार्थी नहीं, विकास की निर्माता तथा नागरिक को योजनाओं का प्राप्तकर्ता नहीं, राष्ट्र-निर्माता बनाना होगा
कुमार कृष्णन

विकसित भारत का सपना केवल बड़ी अर्थव्यवस्था, चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों, आधुनिक बंदरगाहों और तेज रफ्तार रेल का सपना नहीं है। विकास की चमक तब तक अधूरी है, जब तक उसके उजाले में गांव के आखिरी छोर पर रहने वाला व्यक्ति, घर और खेत दोनों संभालने वाली महिला, शहर बनाने वाला असुरक्षित मजदूर और डिग्री लेकर भी भविष्य को लेकर चिंतित युवा दिखाई न दे।
विकसित भारत की असली कसौटी यह नहीं कि देश का सकल घरेलू उत्पाद कितना बढ़ गया। वास्तविक सवाल यह है कि उस समृद्धि में नागरिक की हिस्सेदारी कितनी है तथा उसका जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वतंत्र हुआ है। यदि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में दशकों लगा दे तो उसकी सामाजिक सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विकास का अर्थ अवसर, सुरक्षा और सम्मान
विकास का पहला अर्थ अवसर, दूसरा सुरक्षा और तीसरा सम्मान है। नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा देना किसी कल्याणकारी राज्य की कृपा नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है।
आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य का जीवन बेहतर बनाना है। यदि अर्थव्यवस्था बढ़ रही हो, लेकिन नागरिक का जीवन महंगाई, बेरोजगारी, असुरक्षा और सामाजिक विषमता से घिरा रहे तो आंकड़ों की चमक और जमीनी वास्तविकता के बीच खतरनाक दूरी पैदा हो जाती है।
भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा पिछले वर्षों में बढ़ा है। खाद्य सुरक्षा, आवास, स्वास्थ्य बीमा, बैंक खाते, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और ग्रामीण रोजगार जैसी व्यवस्थाओं ने राज्य तथा नागरिक के संबंध को बदला है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा को केवल योजनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। असली प्रश्न यह है कि जरूरतमंद व्यक्ति तक सुविधा बिना बिचौलिये, अपमान और अनावश्यक कागजी बाधाओं के पहुंचती है या नहीं।
आर्थिक झटकों से सुरक्षा जरूरी
गरीबी से बाहर निकलने वाला परिवार सबसे अधिक इस बात से डरता है कि कहीं वह दोबारा गरीबी में न गिर जाए। बीमारी, बेरोजगारी, दुर्घटना, फसल की बर्बादी अथवा अचानक आई आर्थिक विपत्ति वर्षों की मेहनत मिटा सकती है।
इसलिए विकसित भारत में सामाजिक सुरक्षा को केवल गरीबों की सहायता नहीं, बल्कि नागरिकों को आर्थिक झटकों से बचाने वाली व्यापक व्यवस्था के रूप में देखना होगा।
मध्यम वर्ग का प्रश्न भी इससे जुड़ा है। अक्सर सामाजिक सुरक्षा की चर्चा में गरीब और वंचित वर्ग केंद्र में रहते हैं, जबकि मध्यम वर्ग को अपने दम पर चलने वाला मान लिया जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बच्चों की पढ़ाई और रोजगार की अनिश्चितता ने इस वर्ग पर भी भारी दबाव डाला है। कर देने वाले नागरिक को भरोसा होना चाहिए कि संकट की घड़ी में व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी।
लाभार्थी नहीं, विकास की निर्माता बने महिला
कोई भी देश अपनी आधी आबादी को केवल लाभार्थी बनाकर विकसित नहीं हो सकता। महिलाओं को विकास की लाभार्थी से विकास की निर्माता बनाना होगा। महिला की आर्थिक स्वतंत्रता परिवार की मजबूती के साथ समाज की लोकतांत्रिक शक्ति भी बढ़ाती है।
‘लखपति दीदी’ जैसे प्रयासों का महत्व इसी दृष्टि से समझा जाना चाहिए। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को बचत, ऋण, उद्यम और बाजार से जोड़ने की प्रक्रिया ने ग्रामीण महिलाओं की भूमिका बदलने की संभावना पैदा की है।
लेकिन लक्ष्य केवल महिला की आय को एक निश्चित सीमा तक पहुंचाना नहीं होना चाहिए। उसे आर्थिक निर्णय लेने, संपत्ति में अधिकार पाने तथा बाजार तक पहुंच बनाने में सक्षम करना होगा। उसके श्रम का उचित मूल्य भी उसे मिलना चाहिए।
आरक्षण के साथ राजनीतिक स्वायत्तता भी
महिला आरक्षण केवल संसद में सीटों की संख्या का सवाल नहीं है। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उस ऐतिहासिक कमी को दूर करने का प्रयास है, जिसमें आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं निर्णय लेने वाली संस्थाओं में कम दिखाई देती रही हैं।
पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी ने दिखाया है कि नेतृत्व का अवसर मिलने पर वे स्थानीय शासन की प्राथमिकताओं को बदल सकती हैं। पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा जैसे सवाल राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बने हैं।
अब चुनौती पंचायत से संसद तक महिला नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखने की है। आरक्षण रास्ता खोल सकता है, लेकिन नेतृत्व मजबूत करने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वायत्तता आवश्यक है। महिला प्रतिनिधि को किसी पुरुष नेता की प्रतिनिधि बनाकर छोड़ देना सशक्तीकरण नहीं है। वास्तविक सशक्तीकरण तब होगा, जब वह स्वयं निर्णय लेगी, सवाल पूछेगी और जवाबदेही तय करेगी।
लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं
विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त नागरिक भागीदारी है। लोकतंत्र में नागरिक केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं, बल्कि शासन का सहभागी होता है।
जनगणना जैसी विशाल राष्ट्रीय प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की नीतियां जिन आंकड़ों पर बनती हैं, उनकी विश्वसनीयता इसी भागीदारी पर निर्भर करती है। जनगणना केवल लोगों की संख्या गिनने का काम नहीं है। इससे पता चलता है कि कहां आबादी बढ़ रही है, कहां रोजगार चाहिए, कहां स्कूल और अस्पतालों की आवश्यकता है तथा किन क्षेत्रों में राज्य की उपस्थिति कमजोर है।
नागरिक भागीदारी का अर्थ केवल सरकारी योजनाओं का लाभ लेना नहीं है। सड़क पर कूड़ा न फेंकना, कर चुकाना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कानून का पालन करना, मतदान करना, गलत सूचनाओं से बचना और स्थानीय समस्याओं के समाधान में सहयोग देना भी नागरिकता का हिस्सा है।
लोकतंत्र अधिकारों से चलता है, लेकिन केवल अधिकारों से टिकता नहीं। इसके लिए कर्तव्यबोध भी आवश्यक है।
पंचप्रण को बनाना होगा जनसंकल्प
यहीं पंचप्रण का विचार महत्वपूर्ण हो जाता है। विकसित भारत का संकल्प तभी जनसंकल्प बनेगा, जब नागरिक स्वयं को केवल सरकार से मांगने वाला व्यक्ति न समझे, बल्कि राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को भी पहचाने।
सरकारें नीतियां बना सकती हैं, संस्थाएं खड़ी कर सकती हैं और संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन समाज का चरित्र केवल सरकारी आदेशों से नहीं बदलता।
नागरिक सुरक्षा भी विकास की शर्त
आधुनिक नागरिक सुरक्षा तंत्र का अर्थ केवल पुलिस की संख्या बढ़ाना नहीं है। तकनीक आधारित पुलिस व्यवस्था, त्वरित न्याय, साइबर सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, महिला एवं बाल सुरक्षा और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील प्रशासन—इन सभी को एक साथ देखना होगा।
सुरक्षित नागरिक ही स्वतंत्र होकर आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सकता है।
नक्सलवाद: सुरक्षा के साथ विकास भी
नक्सलवाद से मुक्ति का प्रश्न भी इसी व्यापक विकास दृष्टि से जुड़ा है। हिंसा का अंत केवल सुरक्षा अभियानों से संभव नहीं होगा। जिन क्षेत्रों में सड़क, स्कूल, अस्पताल, रोजगार और न्याय की पहुंच कमजोर रही, वहां विकास की अनुपस्थिति ने असंतोष को स्थान दिया है।
नक्सलवाद के स्थायी समाधान के लिए सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलना होगा। राज्य की उपस्थिति केवल पुलिस चौकी के रूप में नहीं, बल्कि स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, बैंक, सड़क और न्याय व्यवस्था के रूप में भी दिखाई देनी चाहिए।
नशामुक्ति केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं
नशामुक्त भारत को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना भी भूल होगी। नशा सामाजिक और आर्थिक समस्या है। जिन युवाओं के सामने रोजगार की अनिश्चितता, शिक्षा से निराशा और सामाजिक अकेलापन है, वहां नशे का बाजार आसानी से जगह बना लेता है।
इसलिए नशामुक्ति के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ परिवार, स्कूल, खेल, रोजगार, परामर्श और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था भी जरूरी है।
नागरिक को राष्ट्र-निर्माता मानना होगा
विकास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम नागरिक को कभी लाभार्थी, कभी उपभोक्ता और कभी मतदाता के रूप में देखते हैं, लेकिन राष्ट्र-निर्माता के रूप में कम देखते हैं। विकसित भारत में यह दृष्टि बदलनी होगी। नागरिक सरकारी योजनाओं का प्राप्तकर्ता भर नहीं, लोकतंत्र का स्वामी है।
विकास की भाषा में ‘साझेदारी’ को केंद्रीय स्थान देना होगा। किसान केवल कृषि नीति का लाभार्थी नहीं, खाद्य सुरक्षा का निर्माता है। श्रमिक केवल मजदूर नहीं, बुनियादी ढांचे का निर्माता है। महिला केवल परिवार की देखभाल करने वाली नहीं, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की सक्रिय शक्ति है। युवा केवल रोजगार पाने वाला नहीं, बल्कि नवाचार और परिवर्तन का वाहक है।
गरीब भी केवल सहायता पाने वाला व्यक्ति नहीं है। उसे अपनी प्रतिभा, श्रम और आकांक्षाओं के साथ विकास की मुख्यधारा में स्थान मिलना चाहिए।
दो पटरियों पर चलेगा विकसित भारत
विकसित भारत का रास्ता दो समानांतर पटरियों पर चलेगा। पहली पटरी आर्थिक समृद्धि और दूसरी सामाजिक न्याय, सुरक्षा तथा नागरिक भागीदारी की होगी। पहली पटरी तेज दौड़े और दूसरी पीछे रह जाए तो विकास असंतुलित हो जाएगा। दोनों साथ चलेंगी, तभी विकास टिकाऊ और लोकतांत्रिक बनेगा।
किसी राष्ट्र की महानता केवल उसके सबसे अमीर नागरिक की संपत्ति से नहीं, बल्कि सबसे कमजोर नागरिक की सुरक्षा से भी मापी जाती है। यह देखना होगा कि वह भय में जी रहा है अथवा भरोसे में, अवसर से वंचित है अथवा उसका भागीदार है और व्यवस्था से अपमानित होता है अथवा उसमें सम्मान पाता है।
2047 का भारत यदि विकसित भारत कहलाना चाहता है तो उसे केवल विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रखनी होगी। उसे ऐसा समाज बनाना होगा, जहां विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, महिला निर्णय की मेज तक पहुंचे, गरीब सुरक्षा के घेरे में हो, मध्यम वर्ग भविष्य को लेकर आश्वस्त हो और नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझे।
विकसित भारत की असली कसौटी यही होगी कि देश कितना समृद्ध हुआ, इसके साथ यह भी बताया जा सके कि उसका नागरिक कितना सुरक्षित, सम्मानित और सहभागी हुआ।
यही आर्थिक विकास को सामाजिक विकास तथा राष्ट्र की समृद्धि को नागरिक की खुशी में बदलने का रास्ता है।
“किसी राष्ट्र की महानता केवल उसके सबसे अमीर नागरिक की संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमजोर नागरिक की सुरक्षा और सम्मान से भी मापी जाती है।”








