बचपन की ज़ुबान पर गालियों के निहितार्थ : असली दोषी कौन ? बच्चे, समाज,समय या शिक्षा?

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“बच्चे वही बोलते हैं जो समाज उन्हें सिखाता है। इसलिए सुधार बच्चों की जुबान से नहीं, बड़ों के आचरण से शुरू होना चाहिए।”

डॉ. घनश्याम बादल

किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियों या राजनीतिक शक्ति से नहीं होती; उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी नई पीढ़ी को कैसी भाषा, कैसे संस्कार और कौन-से नैतिक मूल्य सौंप रहा है। हाल के दिनों में एक आंदोलन के दौरान कुछ बच्चों द्वारा सार्वजनिक मंचों पर अशोभनीय और अपमानजनक भाषा का प्रयोग तथा उसके बाद छिड़ी बहस ने पूरे देश के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि किसी एक बच्चे ने क्या कहा बल्कि यह है कि उस बच्चे की जुबान तक वे शब्द पहुँचे कैसे?

बताया गया कि संबंधित बच्ची ने बाद में खेद भी व्यक्त किया और प्रशासन की ओर से भी उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई न करने का संकेत दिया गया। यह एक संतुलित मानवीय दृष्टिकोण है। नाबालिगों के साथ कानून का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए। किंतु यदि हम केवल माफी पर ही रुक जाएँ और उन परिस्थितियों की पड़ताल न करें जिन्होंने बच्चों की भाषा और सोच को इस मुकाम तक पहुँचाया है, तो हम समस्या की जड़ से आँखें चुरा रहे होंगे।

आज कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि बच्चों को निशाना बनाना उचित नहीं है, क्योंकि गाली-गलौज तो हमारे सार्वजनिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुकी है। संसद की बहसों से लेकर चुनावी मंचों तक, सोशल मीडिया से लेकर फिल्मों और ओटीटी मंचों तक, अशालीन भाषा का खुला प्रयोग दिखाई देता है। यदि बड़े ही मर्यादा भूल जाएँ तो बच्चों से मर्यादा की अपेक्षा कैसी?

यह तर्क पूरी तरह निराधार भी नहीं है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते और सुनते हैं। उनका पहला विद्यालय परिवार होता है, दूसरा समाज और तीसरा शिक्षा संस्थान। आज इन तीनों के बीच डिजिटल माध्यम चौथा और सबसे प्रभावशाली शिक्षक बन चुका है। मोबाइल की स्क्रीन पर कुछ ही मिनटों में बच्चा ऐसी भाषा और व्यवहार से परिचित हो जाता है जिसे पहले देखने-सुनने में वर्षों लग जाते थे। जब लोकप्रियता का पैमाना शालीनता नहीं, बल्कि सनसनी बन जाए, तब भाषा का स्तर गिरना स्वाभाविक है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि गालियों को सामान्य मान लिया जाए? बिल्कुल नहीं। यदि समाज यह स्वीकार कर ले कि “सब ऐसा ही करते हैं”, तो फिर सभ्यता और संस्कृति का आधार ही समाप्त हो जाएगा। सभ्य समाज की पहचान यही है कि वह गलत को गलत कहने का साहस रखता है, चाहे वह गलती किसी बच्चे से हुई हो, किसी नेता से, किसी अभिनेता से या किसी प्रभावशाली व्यक्ति से।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि आज अभद्र भाषा केवल क्रोध की अभिव्यक्ति नहीं रह गई है, बल्कि उसे साहस, विद्रोह और आधुनिकता का प्रतीक बना दिया गया है। सोशल मीडिया पर जितनी तीखी भाषा, उतनी अधिक पहुँच; फिल्मों में जितनी अधिक गालियाँ, उतनी अधिक ‘यथार्थवादी’ होने की प्रशंसा; राजनीतिक भाषणों में जितना अधिक व्यक्तिगत आक्रमण, उतनी अधिक सुर्खियाँ। ऐसे वातावरण में बच्चों को संयमित भाषा का पाठ पढ़ाना कठिन अवश्य है, असंभव नहीं।

यहाँ शिक्षा व्यवस्था की भी समीक्षा आवश्यक है। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा प्रायः औपचारिकता बनकर रह गई है। परीक्षा में अंक दिलाने वाले विषयों पर जितना जोर है, चरित्र निर्माण पर उतना नहीं। बच्चों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कोडिंग और रोबोटिक्स सिखाई जा रही है, किंतु संवाद की शालीनता, मतभेद की मर्यादा और असहमति की संस्कृति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। ज्ञान बढ़ रहा है, किंतु विवेक का विकास उसी अनुपात में नहीं हो पा रहा।

परिवारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अनेक घरों में बच्चे माता-पिता को ही सामान्य बातचीत में अपशब्दों का प्रयोग करते देखते हैं। यदि घर का वातावरण संयमित नहीं होगा तो विद्यालय अकेला क्या कर लेगा? संस्कार केवल पुस्तकों से नहीं आते; वे व्यवहार से आते हैं।

राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। आंदोलनों में बच्चों की भागीदारी नई बात नहीं है, किंतु किसी भी दल या संगठन का दायित्व है कि वह बच्चों को नफरत या अशालीनता का माध्यम न बनने दे। बच्चों का उपयोग राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए किया जाए, यह भी गंभीर नैतिक प्रश्न है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन असभ्यता का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।

सरकार के सामने भी चुनौती कम नहीं है। केवल दंडात्मक कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगी। आवश्यकता है कि विद्यालयों में मूल्य-आधारित शिक्षा को प्रभावी बनाया जाए, डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल शिष्टाचार को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए और बच्चों के मानसिक एवं नैतिक विकास पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू किया जाए। साथ ही, मीडिया, फिल्म उद्योग और डिजिटल मंचों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।

यह भी याद रखना होगा कि बच्चों से गलती हो सकती है। गलती पर उन्हें अपराधी नहीं, शिक्षार्थी की तरह देखा जाना चाहिए। किंतु समाज के बड़े लोगों से वही उदारता तभी अपेक्षित है जब वे स्वयं अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करें। यदि नेता, अभिनेता, प्रभावशाली सोशल मीडिया व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन के अन्य लोग अपनी भाषा को मर्यादित नहीं करेंगे तो बच्चों को केवल उपदेश देकर सुधारना संभव नहीं होगा।

यह प्रसंग किसी एक बच्ची, एक आंदोलन या एक राजनीतिक विवाद तक सीमित नहीं है। यह उस दर्पण की तरह है जिसमें आज का भारतीय समाज स्वयं को देख सकता है। यदि इस दर्पण में हमें अपनी भाषा, अपना व्यवहार और अपनी सार्वजनिक संस्कृति विकृत दिखाई दे रही है, तो दोष दर्पण का नहीं, हमारे चेहरे का है।

समय आ गया है कि हम बच्चों की जुबान नहीं, अपने आचरण को सुधारें। क्योंकि बच्चे वही बोलते हैं जो समाज उन्हें सिखाता है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी संस्कार, संवेदना और सभ्यता की भाषा बोले, तो सबसे पहले हमें स्वयं उसी भाषा में बोलना सीखना होगा। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही भविष्य के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

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Author: Bharat Sarathi

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