भारत जोड़ो यात्रा के बाद ‘छात्रों की गूंज’: क्या कांग्रेस तलाश रही है नया वोट बैंक?

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छात्रों के सवालों को राजनीतिक समर्थन में बदलना राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती

सौरभ वार्ष्णेय

राजनीति में जनसभाएं, रैलियां और जनसंपर्क अभियान केवल भीड़ जुटाने के साधन नहीं होते। इनके माध्यम से राजनीतिक दल समाज के अलग-अलग वर्गों से रिश्ता बनाते हैं, उनके मुद्दों को पहचान देते हैं और अपने संगठन में नई ऊर्जा भरने का प्रयास करते हैं। कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद राहुल गांधी की पहल ‘छात्रों की गूंज’ भी इसी दृष्टि से ध्यान खींच रही है।

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस छात्रों के बीच अपनी विचारधारा और राजनीतिक संदेश पहुंचाने में सफल हो रही है या यह अभियान आने वाले चुनावों के लिए नया वोट बैंक तैयार करने की रणनीति है?

कांग्रेस का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान 17 जून 2026 को राजस्थान के कोटा से शुरू हुआ। इसके बाद यह देहरादून, प्रयागराज, पुणे और अब इंदौर तक पहुंच चुका है। कांग्रेस इसे राहुल गांधी के कुछ कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय देशव्यापी अभियान का रूप देना चाहती है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार पार्टी अगले दो वर्षों में करीब 800 शहरों तक छात्र संपर्क बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। इससे इस अभियान का राजनीतिक महत्व स्वतः स्पष्ट हो जाता है।

व्यापक संपर्क से लक्षित संवाद तक

भारत जोड़ो यात्रा का मूल स्वर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संपर्क था। राहुल गांधी ने पैदल यात्रा के माध्यम से अलग-अलग राज्यों में जाकर विभिन्न वर्गों के लोगों से संवाद किया। यह कांग्रेस के लिए राजनीतिक पुनर्संपर्क का बड़ा प्रयोग भी था। इस यात्रा ने राहुल गांधी को अपनी छवि नए ढंग से प्रस्तुत करने और जनता से सीधे जुड़ने का अवसर दिया।

इसके मुकाबले ‘छात्रों की गूंज’ का दायरा अधिक केंद्रित है। इसका प्रमुख लक्ष्य छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी और रोजगार की तलाश में लगे युवा हैं।

कोटा में शिक्षा के बढ़ते खर्च, प्रवेश परीक्षाओं की कठिनाइयों और विद्यार्थियों पर पड़ रहे मानसिक दबाव जैसे विषय उठाए गए। देहरादून तथा प्रयागराज में पेपर लीक, सरकारी भर्तियों में देरी, परीक्षाओं के रद्द होने और बेरोजगारी के सवाल सामने आए। पुणे और इंदौर के कार्यक्रमों में भी शिक्षा व्यवस्था, अवसरों की असमानता तथा युवाओं के भविष्य को चर्चा के केंद्र में रखा गया।

इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस ने छात्र राजनीति के लिए मुद्दों का एक निश्चित पैकेज तैयार किया है—पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा और रोजगार के घटते अवसर।

क्या छात्रों तक पहुंच रहा है कांग्रेस का संदेश?

इस सवाल का उत्तर फिलहाल ‘हां, लेकिन सीमित अर्थों में’ दिया जा सकता है। कांग्रेस ने विद्यार्थियों के सामने ऐसे मुद्दे रखे हैं, जिनका उनके रोजमर्रा के जीवन और भविष्य से सीधा संबंध है।

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र पेपर लीक को किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं देखता। उसके लिए यह कई वर्षों की मेहनत, परिवार के आर्थिक त्याग और अपने भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। इसी प्रकार भर्ती परीक्षा में देरी अथवा परीक्षा रद्द होना नौकरी की तैयारी कर रहे युवा के जीवन को सीधे प्रभावित करता है। कांग्रेस को इसी असंतोष में राजनीतिक अवसर दिखाई दे रहा है।

प्रयागराज सहित कई कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में छात्र और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी पहुंचे तथा उन्होंने परीक्षा व्यवस्था एवं रोजगार से संबंधित सवाल उठाए। लेकिन किसी राजनीतिक कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी को सीधे कांग्रेस के समर्थन अथवा वोट में बदल देना उचित निष्कर्ष नहीं होगा।

किसी कार्यक्रम में पहुंचना, राहुल गांधी की बात सुनना और कांग्रेस को वोट देना—ये तीन अलग-अलग स्थितियां हैं। अभी इतना ही कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने छात्रों के बीच अपने मुद्दे पहुंचाने के लिए एक प्रभावी मंच तैयार किया है। यह मंच भविष्य में कितना राजनीतिक समर्थन पैदा करता है, इसका प्रमाण स्वतंत्र जनमत सर्वेक्षणों और चुनाव परिणामों से ही मिलेगा।

संवाद भी, राजनीतिक आधार बनाने का प्रयास भी

किसी सामाजिक समूह के बीच लगातार संपर्क अभियान चलाना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक आधार तैयार करने की कोशिश भी होता है। कांग्रेस के मामले में यह बात इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी ‘छात्रों की गूंज’ को कुछ शहरों तक सीमित नहीं रखना चाहती। देश के सैकड़ों शहरों तक पहुंचने की योजना बताती है कि पार्टी युवा मतदाताओं के बीच दीर्घकालिक राजनीतिक आधार विकसित करना चाहती है।

इसलिए इसे केवल सामाजिक संवाद कहना राजनीतिक दृष्टि से अधूरा होगा। लेकिन यह घोषित कर देना कि कांग्रेस का नया वोट बैंक तैयार हो गया है, जल्दबाजी होगी।

युवा मतदाता कोई एकरूप समूह नहीं है। उसकी प्राथमिकताएं जाति, क्षेत्र, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अलग-अलग होती हैं। कॉलेज के विद्यार्थियों, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों, बेरोजगार युवाओं, निजी क्षेत्र में काम करने वालों और ग्रामीण युवाओं की समस्याएं तथा राजनीतिक अपेक्षाएं एक जैसी नहीं हैं।

छात्रों के किसी कार्यक्रम में दिखाई देने वाली लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं कि पूरा युवा वर्ग कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया है।

कांग्रेस के सामने विश्वसनीयता की परीक्षा

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुद्दे उठाने की नहीं, बल्कि उनका भरोसेमंद समाधान प्रस्तुत करने की है। पेपर लीक पर सरकार को घेरना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह परीक्षा व्यवस्था को कैसे बदलेगी।

भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाने के लिए उसकी क्या योजना है? सरकारी नौकरियों के रिक्त पद कितने समय में भरे जाएंगे? निजी शिक्षा की बढ़ती लागत को कैसे नियंत्रित किया जाएगा? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कैसे घटेगा? पेपर लीक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, परीक्षा एजेंसियों और संगठित गिरोहों के विरुद्ध कैसी जवाबदेही तय होगी?

यही कारण है कि ‘छात्रों की गूंज’ का अगला चरण केवल भाषणों का विस्तार नहीं, बल्कि स्पष्ट नीतिगत प्रस्तावों का विस्तार होना चाहिए। यदि कांग्रेस केवल सरकार विरोधी नारों तक सीमित रहती है तो अभियान की राजनीतिक सीमा भी वहीं समाप्त हो जाएगी। यदि वह विद्यार्थियों के मुद्दों पर ठोस और व्यावहारिक विकल्प सामने रखती है तो यह संवाद स्थायी राजनीतिक विश्वास में बदल सकता है।

संगठन को सक्रिय करने का प्रयोग

भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी ने अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच जाकर संवाद स्थापित किया था। ‘छात्रों की गूंज’ में वह एक विशिष्ट वर्ग के बीच लगातार पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। अंतर यह है कि भारत जोड़ो यात्रा का संदेश व्यापक था, जबकि छात्रों की गूंज का संदेश मुद्दा-केंद्रित है।

इसे कांग्रेस का संगठनात्मक प्रयोग भी माना जा सकता है। उत्तराखंड में कांग्रेस नेताओं ने इस अभियान को युवाओं के साथ पार्टी के पुनर्संपर्क और संगठन को सक्रिय करने के अवसर के रूप में देखा। हरियाणा में भी युवा कांग्रेस ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक पहुंचने के लिए 40 दिवसीय अभियान की योजना बनाई है। इसका अर्थ है कि राहुल गांधी के कार्यक्रम को ऊपर से नीचे तक पार्टी संगठन में फैलाने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन संगठन की असली परीक्षा यह होगी कि बड़े कार्यक्रमों के बाद जिला, ब्लॉक और कॉलेज स्तर पर छात्रों के साथ संपर्क बना रहता है या नहीं। केवल राहुल गांधी की सभा आयोजित करने से स्थायी राजनीतिक आधार नहीं बनेगा। इसके लिए छात्र संगठनों को सक्रिय करना, स्थानीय समस्याओं पर आंदोलन चलाना और युवाओं को संगठन में जिम्मेदारी देना आवश्यक होगा।

नया वोट बैंक या दीर्घकालिक निवेश?

छात्र और युवा किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण मतदाता समूह हैं। आज का कॉलेज छात्र आने वाले चुनावों का मतदाता है। उसके राजनीतिक विचार समय के साथ परिवार और सामाजिक दायरे को भी प्रभावित कर सकते हैं।

फिर भी राजनीति में किसी अभियान की सफलता का अंतिम पैमाना उसकी चुनावी परिणति होती है। इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ को सफल या असफल घोषित करने से पहले देखना होगा कि क्या छात्रों की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलती हैं, क्या कांग्रेस के प्रति उनका भरोसा बढ़ता है और क्या यह भरोसा मतदान व्यवहार में दिखाई देता है।

इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को मिली हार यह भी बताती है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभियान की चर्चा और छात्र राजनीति में वास्तविक चुनावी समर्थन के बीच अभी दूरी बनी हुई है। कांग्रेस को इस संकेत को गंभीरता से लेना होगा।

सवाल भीड़ का नहीं, भरोसे का है

‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद ‘छात्रों की गूंज’ को कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। पहले कांग्रेस ने व्यापक समाज से संवाद की कोशिश की थी; अब वह उस वर्ग के बीच लगातार पहुंच बना रही है, जिसके सामने शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और भविष्य से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं।

यह केवल छात्र संवाद है अथवा नया वोट बैंक बनाने की कवायद—इसका अंतिम उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन सैकड़ों शहरों तक पहुंचने की योजना यह अवश्य बताती है कि कांग्रेस इसे तात्कालिक आयोजन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक संपर्क अभियान के रूप में देख रही है।

अब गेंद कांग्रेस के पाले में है। छात्रों की समस्याओं को आवाज देना पहला कदम है, लेकिन उनके समाधान का भरोसेमंद रास्ता बताना दूसरा और अधिक कठिन कदम होगा। यदि कांग्रेस यह कदम उठा पाती है, तभी ‘छात्रों की गूंज’ एक राजनीतिक संवाद से आगे बढ़कर स्थायी युवा आधार बनाने की दिशा में जा सकेगी।

असली सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी छात्रों के बीच कितनी भीड़ जुटा रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या छात्र उनकी बात को अपने भविष्य की बात मानने लगे हैं?

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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