सरदूल सिंह

शहीद ऊधम सिंह का नाम लेते ही एक ऐसे अद्वितीय देशभक्त का चित्र आँखों के सामने उभर आता है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन व्यवस्था परिवर्तन और जन-कल्याणकारी समाज के निर्माण के लिए समर्पित कर दिया।
ऊधम सिंह का जन्म पंजाब के सुनाम कस्बे (वर्तमान मानसा जिला) में 26 दिसंबर 1899 को एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। नियति की क्रूरता देखिए कि वे बचपन में ही अनाथ हो गए और जल्द ही उनके बड़े भाई का भी साया उठ गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण अमृतसर के अनाथालय में हुआ।
दर्शनशास्त्र सिखाता है कि “मनुष्य अपनी परिस्थितियों की उपज होता है।” कठिन और विपरीत परिस्थितियों ने ऊधम सिंह के व्यक्तित्व में अद्वितीय समर्पण और जुझारूपन पैदा किया। उन्होंने गहराई से समझा कि व्यक्तिगत दुखों का समाधान व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन में निहित है।
क्रांतिकारी आंदोलनों की वैचारिक पृष्ठभूमि
उस दौर में देश गरीबी, आर्थिक विषमता और औपनिवेशिक अत्याचारों से कराह रहा था। 1872 की ‘कूका लहर’, 1907 का ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ किसान आंदोलन और विदेशी धरती से संचालित ‘गदर पार्टी’ के सशस्त्र संघर्ष ने पंजाब और बंगाल में क्रांति की ज़मीन तैयार कर दी थी। करतार सिंह सराभा जैसे युवा नायकों की शहादत और 1917 की रूसी साम्यवादी क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई वैचारिक दिशा दी।
इसी दौर में, 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर का जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ। इस नरसंहार के समय ऊधम सिंह की उम्र महज़ 20 वर्ष थी। इस वीभत्स घटना ने उनके मन पर कभी न मिटने वाली छाप छोड़ी। स्वभाव से मेहनती और दृढ़निश्चयी होने के कारण वे तेज़ी से क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए।
इंकलाब का व्यापक अर्थ और लंदन का कैक्सटन हॉल
गदर साहित्य और अवैध हथियारों के साथ पकड़े जाने पर ऊधम सिंह को 5 वर्ष की जेल हुई। जेल में भगत सिंह और ‘नौजवान भारत सभा’ के साथियों से हुई मुलाकातों ने उनके क्रांतिकारी विचारों को और अधिक परिपक्व किया। उनके लिए इंकलाब का अर्थ केवल अंग्रेजों को भगाना नहीं, बल्कि “आदमी द्वारा आदमी के शोषण” अर्थात पूंजीपति वर्ग के द्वारा परोलेटेरिएट वर्ग के शोषण का अंत” करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था का अंत करना तथा समाजवादी व्यवस्था की स्थापना था।
विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (1929) के दौर में वे दुनिया के कई महाद्वीपों में घूम-घूमकर विभिन्न हुनर सीखते रहे। उनका अंतिम लक्ष्य जलियांवाला बाग के मुख्य गुनहगार को उसके किए की सजा देना और साम्राज्यवादी शक्तियों को ललकारना था।
आखिरकार, 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सभा में ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग के मुख्य ज़िम्मेदार माइकल ओ’डायर को गोली मारकर अपना संकल्प पूरा किया। वहीं पर उनको गिरफ्तार कर मात्र 4 माह 17 दिन की सुनवाई पश्चात 31जुलाई 1940 को फांसी दे दी गई।
साम्राज्यवादी नीतियों पर प्रहार
अपनी गिरफ्तारी के बाद अदालत में दिए बयान में उन्होंने व्यक्तिगत रंजिश या खून-खराबे से साफ इंकार किया। उन्होंने गर्व से कहा:
मेरा अंग्रेज़ जनता या मजदूरों से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है। कई अंग्रेज़ मेरे मित्र हैं। मैं केवल उस शोषक और अत्याचारी साम्राज्यवादी नीति का विरोधी हूँ जो भारत का खून चूस रही है।
वे जातीय, कबीलाई और धार्मिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर धर्मनिरपेक्ष और मानवीय मूल्यों के नायक बने।
वर्तमान दौर में शहीद ऊधम सिंह की प्रासंगिकता
आज भी युवा पीढ़ी के सामने आजीविका, रोजगार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बड़ी चुनौतियाँ मौजूद हैं। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस दौर में रोजगार के पारंपरिक अवसर सिमट रहे हैं और आर्थिक विषमता गहराती जा रही है।
ऐसे समय में ऊधम सिंह का विचार और दर्शन अत्यधिक प्रासंगिक हो जाता है:
शोषणमुक्त व्यवस्था:
केवल सत्ता का हस्तांतरण काफी नहीं है, बल्कि एक समतावादी और कल्याणकारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है।
रोजगार की संवैधानिक गारंटी:
नई तकनीक के दौर में काम के दिन को 8 घंटे से घटाकर 6 या उससे भी कम करते हुए न्यायसंगत पुनर्गठन करके हर हाथ को काम और योग्यता अनुसार रोजगार की गारंटी मिलनी चाहिए।
धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर एक एकजुट, संवेदनशील और न्यायप्रिय समाज की रचना करना ही समय की माँग है।
निष्कर्ष:
शहीद ऊधम सिंह और उनके साथियों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनके बलिदान को याद करने में नहीं बल्कि उनके द्वारा देखे गए शोषणमुक्त और समतावादी भारत के सपने को साकार करने में है।








