काउंसलिंग, मानसिक परेशानी की शुरुआती पहचान और 24×7 टेली-मानस सहायता पर जोर
चंडीगढ़, 16 सितंबर। हरियाणा में आत्महत्या रोकथाम के प्रयासों को और मजबूत किया जा रहा है। इसके तहत भावनात्मक परेशानी की शुरुआती पहचान, काउंसलिंग, समय पर पेशेवर हस्तक्षेप और चौबीसों घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यह जानकारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा ने आत्महत्या रोकथाम माह के अवसर पर दी। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा विभिन्न कार्यस्थलों पर जागरूकता और काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि आत्महत्या की रोकथाम को केवल मानसिक बीमारी के उपचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए व्यापक जनस्वास्थ्य दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इन सभी को भावनात्मक परेशानी की शुरुआती पहचान कर लोगों को उचित सहायता उपलब्ध कराने में सहयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “समय पर मिलने वाली सहायता महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है। परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और समुदायों की यह जिम्मेदारी है कि वे भावनात्मक परेशानी को पहचानें और व्यक्ति को उचित पेशेवर सहायता तक पहुंचने में मदद करें।”
इस वर्ष आत्महत्या रोकथाम के लिए निर्धारित थीम ‘चेंजिंग द नैरेटिव ऑन सुसाइड’ (आत्महत्या के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव) है। इसका उद्देश्य चुप्पी, कलंक और गलत धारणाओं की जगह खुलकर बात करने, करुणा, समझ और समय पर सहायता लेने की भावना को बढ़ावा देना है।
हरियाणा का जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) अब राज्य के प्रत्येक जिले में संचालित हो रहा है। इसके तहत मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आकलन, काउंसलिंग, उपचार और आवश्यकता के अनुसार विशेषज्ञ सेवाओं के लिए रेफरल की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
तत्काल सहायता के लिए टेली-मानस (14416 और 1-800-891-4416) की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध है। प्रशिक्षित काउंसलर और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तनाव, चिंता, अवसाद, नशे से जुड़ी समस्याओं, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत चुनौतियों तथा आत्महत्या संबंधी विचारों को लेकर सहायता प्रदान करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर कॉल करने वालों को आगे की देखभाल और उपचार से भी जोड़ा जाता है।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि 10 अक्टूबर, 2022 को शुरुआत से लेकर अब तक टेली-मानस पर कुल 19,773 कॉल प्राप्त हुई हैं। इनमें से 92.4 प्रतिशत कॉल सीधे लाभार्थियों द्वारा की गईं, जो हेल्पलाइन के प्रति लोगों में जागरूकता और विश्वास का मजबूत संकेत है।
कॉल करने वालों में अधिकांश, यानी 82 प्रतिशत लोग 18 से 45 वर्ष की आयु वर्ग के हैं। यह दर्शाता है कि यह संकट युवाओं और कामकाजी आयु वर्ग की आबादी से कितना गहराई से जुड़ा हुआ है।
कुल कॉल में एक तिहाई से अधिक मामले उदासी और अवसाद से संबंधित चिंताओं के हैं। इसके बाद परीक्षा, कामकाज और रिश्तों से जुड़ा तनाव प्रमुख है। चिंता, नशे से जुड़ी समस्याएं और नींद संबंधी परेशानियां भी प्रमुख शिकायतों में शामिल हैं। ये सभी मिलकर कुल संपर्कों के 80 प्रतिशत से अधिक हैं।
जनवरी 2026 से अब तक 9,106 कॉल प्राप्त हुई हैं।
इस व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए गूगल की आत्महत्या रोकथाम संबंधी सुविधा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसके तहत ‘सुसाइड’ या संकट से संबंधित शब्दों को सर्च करने पर सत्यापित हेल्पलाइन नंबर तुरंत दिखाई देते हैं, जिससे जरूरत के समय महत्वपूर्ण सहायता की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सके।
हरियाणा के आत्महत्या रोकथाम प्रयासों में विद्यार्थियों और युवा वयस्कों को सहायता उपलब्ध कराना एक प्रमुख प्राथमिकता है। स्वास्थ्य विभाग ने युवाओं के भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर को लेकर अनिश्चितता, माता-पिता की अपेक्षाएं, रिश्तों में टूटन, साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया का दबाव, अकेलापन और नशे जैसी समस्याओं को गंभीर जोखिम कारकों के रूप में पहचाना है।
विद्यार्थियों के लिए विभाग का संदेश स्पष्ट है: “एक परीक्षा, एक परिणाम या एक रिश्ता पूरे जीवन को परिभाषित नहीं करता।”
डॉ. मिश्रा ने कहा कि आत्महत्या के पीछे शायद ही कभी कोई एक कारण होता है। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव, आर्थिक और पारिवारिक समस्याएं, रिश्तों में कठिनाइयां, पढ़ाई और रोजगार का दबाव, सामाजिक अलगाव, नशे का सेवन, पुरानी बीमारियां, अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियां अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।
स्वास्थ्य विभाग परिवारों, शिक्षकों और मित्रों से आग्रह करता है कि वे शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचानें। इनमें लगातार उदासी या निराशा, लोगों से दूरी बनाना, नींद या भूख में महत्वपूर्ण बदलाव, पढ़ाई या काम में एकाग्रता अथवा रुचि में कमी, स्वयं को बेकार या दूसरों पर बोझ समझना तथा मृत्यु या आत्महत्या का जिक्र करना शामिल है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि इस तरह के व्यवहार को ‘ध्यान आकर्षित करने की कोशिश’ या कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “आत्महत्या की रोकथाम केवल मानसिक बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं है। यह कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे लोगों का साथ देने, उनकी बात सुनने, समय पर उपचार उपलब्ध कराने और ऐसा समाज बनाने से जुड़ी है, जहां लोग बिना किसी डर, शर्म या कलंक के अपनी परेशानियों के बारे में बात कर सकें।”
स्वास्थ्य विभाग ने सलाह दी है कि आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार व्यक्त करने वाले किसी भी व्यक्ति की बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। संकट की स्थिति में उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और जल्द से जल्द पेशेवर सहायता से जोड़ना चाहिए।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि राज्य की आत्महत्या रोकथाम रणनीति में परेशानी की शुरुआती पहचान, पेशेवर सहायता तक बेहतर पहुंच और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े कलंक को कम करने पर जोर दिया जाएगा। जिला स्तर की सेवाएं और 24×7 टेली-मानस प्लेटफॉर्म सहायता उपलब्ध कराने के दो प्रमुख माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि आत्महत्या रोकथाम को केवल एक दिन के अभियान के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर जनस्वास्थ्य की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए लगातार जागरूकता, सुलभ काउंसलिंग, भावनात्मक परेशानी की शुरुआती पहचान और समय पर पेशेवर हस्तक्षेप राज्य की रणनीति के प्रमुख आधार बने रहेंगे।
डॉ. मिश्रा ने कहा, “परिवारों और समुदायों के लिए संदेश सरल है: भावनात्मक परेशानी को नजरअंदाज न करें, बिना किसी पूर्वाग्रह के व्यक्ति की बात सुनें और उसे पेशेवर सहायता तक पहुंचने में मदद करें। कभी-कभी, एक संवेदनशील बातचीत किसी की जान बचाने की दिशा में पहला कदम हो सकती है।”
हरियाणा बच्चों के कल्याण, आत्मविश्वास और भविष्य के लिए समय पर हस्तक्षेप के महत्व को ध्यान में रखते हुए मानसिक स्वास्थ्य सहायता सीधे स्कूलों तक पहुंचा रहा है।
राज्य में एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य नेटवर्क है, जिसमें 23 जिला नागरिक अस्पताल, 50 उपमंडल अस्पताल और 122 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) शामिल हैं। इस प्रकार राज्य में कुल 195 स्वास्थ्य संस्थान हैं।
इस स्वास्थ्य नेटवर्क के साथ 3,214 माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय जुड़े हुए हैं। इसके अनुसार, प्रत्येक स्वास्थ्य संस्थान के साथ औसतन लगभग 17 स्कूलों का जुड़ाव बनता है।








