आश्विन संक्रांति पर विशेष-निर्माण, वास्तुकला, शिल्प और अभियंत्रण के आराध्य देव की जयंती 17 सितम्बर।
डॉ. महेंद्र शर्मा पानीपत

पानीपत, प्रमोद कौशिक 16 सितम्बर : उत्तर भारत के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य एवं शास्त्री आयुर्वेदिक अस्पताल के संचालक डॉ. महेंद्र शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के महान शिल्पकार, वास्तुशास्त्र के प्रणेता तथा निर्माण और अभियंत्रण के आराध्य देव के रूप में पूजा जाता है। ‘विश्वकर्मा’ शब्द का अर्थ है-सम्पूर्ण विश्व की रचना और निर्माण करने वाला। भारतीय धार्मिक परम्पराओं में उन्हें संसार का प्रथम अभियंता और आधारभूत संरचना का देवता माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरम्भ में भगवान श्रीमन्नारायण क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनके चरणों में माता लक्ष्मी सेवा कर रही थीं। भगवान के हृदय में सृष्टि निर्माण का संकल्प उत्पन्न हुआ तो उनकी नाभि से निकले कमल पर ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्हें सृष्टि की रचना का दायित्व सौंपा गया। इसी दिव्य परम्परा में भगवान विश्वकर्मा का प्राकट्य माना जाता है।
शिल्प और वास्तुकला के महान आचार्य।
प्राचीन ग्रन्थों और लोकमान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा द्वारा अनेक दिव्य नगरों, भवनों, अस्त्र-शस्त्रों तथा यंत्रों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। इन्द्रपुरी, यमपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, स्वर्णमयी लंका और द्वारकापुरी जैसे भव्य नगरों का निर्माण उनसे जोड़ा जाता है।
कुबेर के पुष्पक विमान, भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र, भगवान शिव के त्रिशूल, भगवान परशुराम के परशु, यमराज के कालदण्ड तथा कर्ण के कवच -कुण्डल का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा की दिव्य शिल्पकला का परिणाम माना गया है। रामायण की मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम की सेना के नल और नील ने समुद्र पर रामसेतु का निर्माण किया। नल-नील को भी विश्वकर्मा की शिल्प परम्परा से जुड़ा माना जाता है।
ज्ञान-विज्ञान और कर्म के प्रतीक।
भगवान विश्वकर्मा केवल निर्माण के देवता ही नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, परिश्रम, सृजनशीलता और कौशल के भी प्रतीक हैं। उनकी परम्परा यह संदेश देती है कि श्रम केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सृष्टि की सेवा और आराधना भी है। छैनी, हथौड़े, औजारों और कुशल हाथों से संसार को उपयोगी तथा सुंदर बनाने वाला प्रत्येक कारीगर विश्वकर्मा की सृजन परम्परा को आगे बढ़ाता है।
विश्वकर्मा परम्परा में लौहकर्म, काष्ठकला, ताम्र एवं अन्य धातुओं का काम, पत्थर की नक्काशी, वास्तुकला और स्वर्णकारी जैसी विधाओं को विशेष स्थान दिया गया है। इसी कारण अभियंता, वास्तुकार, शिल्पकार, कारीगर, मिस्त्री, तकनीशियन और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से जुड़े श्रमिक भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानते हैं।
पंच शिल्प परम्पराएं।
परम्परागत मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा की शिल्पविद्या को पांच प्रमुख धाराओं से जोड़ा गया है-
मनु विश्वकर्मा-लौह एवं धातु कार्य।
मय-काष्ठकला, वास्तु और अद्भुत रचनात्मक शिल्प।
त्वष्टा—ताम्र तथा अन्य धातुओं की कारीगरी
शिल्पी—पत्थर, मूर्ति और भवन निर्माण कला।
दैवज्ञ-स्वर्णकारी एवं सूक्ष्म कलात्मक निर्माण।
ये सभी परम्पराएं भारतीय समाज में श्रम, कौशल और तकनीकी ज्ञान के सम्मान का संदेश देती हैं।
विश्वकर्मा पूजा का संदेश।
विश्वकर्मा जयंती पर कारखानों, कार्यशालाओं, औद्योगिक इकाइयों और निर्माण स्थलों पर औजारों तथा मशीनों की पूजा की जाती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि श्रम का सम्मान, तकनीकी ज्ञान का सदुपयोग और जनकल्याण के लिए किया गया निर्माण ही भगवान विश्वकर्मा की सच्ची आराधना है।
विश्वकर्मा गायत्री मंत्र
ॐ सर्वरूपाय विद्महे, विश्वकर्मणे च धीमहि।
तन्नो परब्रह्म प्रचोदयात्॥
निर्माण, सृजन और कौशल के आराध्य भगवान विश्वकर्मा की जयंती पर सभी अभियंताओं, वास्तुकारों, शिल्पकारों, कारीगरों और मेहनतकश श्रमिकों को हार्दिक शुभकामनाएं। भगवान विश्वकर्मा सभी के जीवन में उन्नति, समृद्धि और सृजनशीलता का प्रकाश भरें।








