कहा—नियुक्ति के समय निर्धारित योग्यता और चयन प्रक्रिया पूरी कर चुके अनुभवी शिक्षकों को राहत दे सरकार; सेवाकाल का सम्मान करते हुए बनाए स्पष्ट नीति
चंडीगढ़, 16 सितंबर। हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह ने वर्षों से सरकारी विद्यालयों में सेवाएं दे रहे अध्यापकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी/एचटीईटी) अनिवार्य किए जाने का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि 20 वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों से दोबारा पात्रता परीक्षा लेना न्यायसंगत नहीं है। सरकार को मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अनुभवी शिक्षकों को राहत देनी चाहिए।
राव नरेंद्र सिंह ने कहा कि जिन अध्यापकों की नियुक्ति उस समय सरकार द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, भर्ती नियमों और चयन प्रक्रिया के अनुसार हुई थी, उनकी योग्यता और वर्षों के अनुभव को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि टीईटी के संबंध में एक सितंबर 2025 के फैसले में दिशा-निर्देश दिए गए थे। इसके बाद 29 मई 2026 के निर्णय में टीईटी उत्तीर्ण करने की समय-सीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ाई गई है। संबंधित सरकारों से टीईटी नियमित रूप से और अधिमानतः वर्ष में दो बार आयोजित करने को भी कहा गया है।
दो दशक की सेवा क्या योग्यता नहीं?
राव नरेंद्र सिंह ने सवाल किया कि जो शिक्षक नियुक्ति के समय सभी निर्धारित योग्यताएं पूरी करके चयन प्रक्रिया से गुजरा और पिछले दो दशकों से विद्यार्थियों को पढ़ा रहा है, उससे अचानक नया टेस्ट लेकर सरकार क्या हासिल करना चाहती है?
उन्होंने कहा कि शिक्षक की योग्यता केवल एक परीक्षा से निर्धारित नहीं होती। उसकी शैक्षणिक योग्यता, चयन प्रक्रिया, सेवाकाल, शिक्षण अनुभव और विद्यार्थियों के प्रति योगदान भी योग्यता के महत्वपूर्ण आधार हैं।
व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी हो विचार
उन्होंने कहा कि शिक्षकों पर कोई नया नियम लागू करने से पहले सरकार को उनके लंबे सेवाकाल, नियुक्ति के समय लागू नियमों और वर्तमान व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए।
राव नरेंद्र सिंह के अनुसार, केंद्र सरकार ने बताया है कि सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 से पहले नियुक्त ऐसे शिक्षकों को सेवानिवृत्ति तक सेवा जारी रखने की अनुमति दी है, जिनकी एक सितंबर 2025 को पांच वर्ष से कम सेवा शेष थी। हालांकि, टीईटी उत्तीर्ण किए बिना वे पदोन्नति के पात्र नहीं होंगे।
सरकार बनाए स्पष्ट और मानवीय नीति
उन्होंने कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना और शिक्षकों की वास्तविक परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाते हुए समाधान निकालना चाहिए। लंबे समय से सेवा दे रहे अध्यापकों के हितों की रक्षा के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाए जाएं और इस विषय में स्पष्ट नीति बनाई जाए।
राव नरेंद्र सिंह ने कहा, “हरियाणा के शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। दशकों तक सेवा देने वाले शिक्षकों को अनिश्चितता में डालने के बजाय सरकार को उनके अनुभव और सेवाकाल का सम्मान करना चाहिए।”








