वैज्ञानिक सोच के अभाव और पाखंड के बढ़ते जाल से समाज को बचाने के लिए जन-जागरूकता और सख्त कार्रवाई समय की मांग
— सुरेश गोयल धूपवाला
पूर्व जिला महामंत्री, भाजपा, जिला हिसार

हाल ही में प्रकाशित एक समाचार ने पूरे समाज को झकझोर दिया। टोना-टोटका करवाने की रंजिश में ईंट और लोहे की रॉड से हमला कर एक वृद्धा की निर्मम हत्या कर दी गई। यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि हमारे समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुके अंधविश्वास की भयावह तस्वीर भी है। विज्ञान और तकनीक के इस दौर में भी टोना-टोटका, झाड़-फूँक और तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों को भ्रमित करने, ठगने और मानसिक रूप से शोषित करने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।
आज भी अनेक तथाकथित तांत्रिक, ओझा और स्वयंभू सिद्ध पुरुष बीमारी दूर करने, भूत-प्रेत भगाने, मुकदमे में विजय दिलाने, मनचाहा प्रेम या विवाह कराने, संतान प्राप्ति, व्यापार में उन्नति और धन लाभ जैसे अवैज्ञानिक तथा असंभव दावे करते हैं। विडंबना यह है कि उनके जाल में केवल अशिक्षित ही नहीं, बल्कि शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न लोग भी फँस जाते हैं। भय, असुरक्षा, लालच और समस्याओं के त्वरित समाधान की चाह लोगों को ऐसे पाखंडियों का आसान शिकार बना देती है।
समाचार-पत्रों, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर आज भी “हर समस्या का समाधान”, “100 प्रतिशत गारंटी”, “एक ही रात में मनोकामना पूर्ण” और “काला जादू विशेषज्ञ” जैसे भ्रामक विज्ञापन खुलेआम दिखाई देते हैं। कुछ लोग कैंसर, लकवा, मानसिक रोग और अन्य गंभीर बीमारियों को बिना चिकित्सकीय उपचार के ठीक करने तक का दावा करते हैं। ऐसे झूठे दावे न केवल लोगों की मेहनत की कमाई लूटते हैं, बल्कि कई बार मरीज का समय पर उपचार भी रुक जाता है, जिससे उसकी जान तक खतरे में पड़ जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरों में भी साँप या बिच्छू के काटने, दाँत दर्द, बुखार, बच्चों के रोग अथवा अन्य बीमारियों के उपचार के लिए झाड़-फूँक का सहारा लेने की प्रवृत्ति आज भी देखने को मिलती है। परिणामस्वरूप कई मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुँच पाते और उनकी स्थिति गंभीर हो जाती है। यह केवल अज्ञानता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच के अभाव का दुष्परिणाम है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि तंत्र-मंत्र के नाम पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म, यौन शोषण, ब्लैकमेल और आर्थिक ठगी जैसी घटनाएँ भी सामने आती रहती हैं। अनेक लोग अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में ऐसे ढोंगियों पर भरोसा कर बैठते हैं और अंततः धन, सम्मान तथा कभी-कभी जीवन तक से हाथ धो बैठते हैं। कई परिवार अंधविश्वास की भेंट चढ़ जाते हैं, जबकि निर्दोष लोगों पर “डायन” या “टोना करने” का आरोप लगाकर उनके साथ हिंसा तक की जाती है।
समय-समय पर विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशनों में अनेक स्वयंभू तांत्रिकों के कथित चमत्कारों की सच्चाई उजागर हो चुकी है। इसके बावजूद ऐसे लोगों का प्रभाव कम नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी, प्रभावी जन-जागरूकता का अभाव और कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क)(ह) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य माना गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा सुधार की भावना का विकास करे। इसलिए आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि समाज में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने की भी है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक नेताओं, मीडिया और प्रशासन को मिलकर अंधविश्वास के विरुद्ध व्यापक जन-जागरण अभियान चलाना होगा। साथ ही, भ्रामक विज्ञापनों पर प्रभावी रोक तथा चमत्कार और तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों से ठगी करने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
आस्था और अध्यात्म भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं, किंतु आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। धर्म मनुष्य को विवेक, करुणा और सत्य का मार्ग दिखाता है, जबकि अंधविश्वास उसे भय, भ्रम और शोषण की ओर ले जाता है। समय की मांग है कि समाज तर्क, विज्ञान और विवेक को अपनाए तथा टोना-टोटका, झाड़-फूँक और तंत्र-मंत्र के नाम पर फैलाए जा रहे पाखंड को सिरे से नकार दे। यही एक जागरूक, सुरक्षित और प्रगतिशील समाज की पहचान होगी।









