खुदरा दुकानदारों के साथ वित्तीय अन्याय

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अनिल धर्मदेश 

मेगामार्ट, ऑनलाइन और रिटेल के मध्य प्रमुख प्रतियोगिता उत्पादों के मूल्य की है। उपभोक्ता और खुदरा दुकानदार भी ये दावा करते हैं कि निर्माता कंपनियां मेगामार्ट और ऑनलाइन माध्यमों को खुदरा की अपेक्षा सस्ती कीमतों पर उत्पाद उपलब्ध कराती हैं। यह विमर्श का अलग विषय है परन्तु वित्त प्रबंधन के मामले में खुदरा दुकानदारों के साथ हो रहा भेदभाव एकदम स्पष्ट है। जहाँ सालों-साल लाभ का कारोबार करने वाले खुदरा व्यापारी के लिए पूँजी जुटाना अत्यंत कठिन है, वहीं एक नए मेगामार्ट को घाटे का कारोबार करने के लिए सरल पूँजी प्रदान की जा रही है। यही नहीं, मेगामार्ट की पूँजी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए मूलभूत अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की भी एबिटा जैसे कृत्रिम  उपायों से अनदेखी की जा रही है। 

मल्टीब्रांड रिटेल ग्रुप सिटीमॉल व्यापार मॉडल वर्तमान में भारतीय वित्त एवं ऋण व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह ग्रुप अपने विज्ञापन में ₹29/प्रति kilo की दर से चीनी और ₹99 में फॉर्चून रिफाइंड का पाउच बेचने का दावा करता है। जबकि एक किलो चीनी की औद्योगिक उत्पादन लागत 35-38 रुपए प्रति किलो होती है। इसी तरह सोया तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत लगभग ₹160/प्रति लीटर है। स्पष्ट है कि ग्राहकों को लुभाने के लिए यह ग्रुप घाटे पर माल बेच रहा है। खरीद से भी सस्ती कीमतों पर माल बेचने के कारण ही सिटीमॉल ने वित्तीय वर्ष 2022 से 2025 के बीच में 440 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा बुक किया है। इस घाटे में विभिन्न वित्तीय संसाधनों से जुटाए गए करीब ₹320 करोड़ की बाहरी पूजी का ब्याज और पूँजी सम्बन्धी अन्य व्यय भी शामिल है। 

स्मरण रहे कि भारत के खुदरा (रिटेल) बाजार में किराना और संगठित क्षेत्रों को मिलाकर लगभग 1.2 से 1.3 करोड़ तक छोटे-बड़े खुदरा आउटलेट या दुकानें मौजूद हैं। हालांकि, कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) जैसे व्यापारिक संगठनों का अनुमान है कि देश भर में लगभग 7 से 9 करोड़ छोटे-बड़े व्यवसायी इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में खुदरा (रिटेल) क्षेत्र एक प्रमुख स्तंभ है। यह देश की कुल जीडीपी में लगभग 10% और रोजगार में आठ प्रतिशत का योगदान देता है। कृषि के बाद यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है।

स्पष्ट है कि आज भारत की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से खुदरा कारोबार पर ही निर्भर है। ऐसे में मल्टी ब्रांड रिटेल आउटलेट चेन के नाम पर बड़े समूहों को इस कारोबार में स्थापित करने के लिए अपारदर्शी और गैर प्रतियोगी लाभ पहुंचाया जा रहा है, वह भी तब जबकि देश बिग बाजार और ईजीडे जैसे आउटलेट के हजारों करोड़ का घाटा और उनकी बिकवाली देख चुका है। बैंक से मामूली सीसी लिमिट बनवाने के लिए छोटे व्यापारियों को अनगिनत पापड़ बेलने पड़ते हैं जबकि वह घाटे का लुभावना व्यापार भी नहीं करते परन्तु, वही वित्तीय संस्थान कारपोरेट के मामले में सारे मानक बदल देते हैं। व्यापारिक ऋण देते समय बैंक व्यापारी की वित्तीय स्थिति, ऋण चुकाने की क्षमता और जोखिम का आकलन करते हैं। वित्तीय शुचिता के अंतर्गत लेनदार का क्रेडिट स्कोर, व्यावसायिक स्थिरता, वित्तीय विवरण, नकदी प्रवाह, ऋण-आय अनुपात और गारंटी या संप्राश्य के साथ ही प्रोजेक्ट की प्रकृति एवं भावी लाभ-हानि की सम्भावनाओं की जाँच के बाद कोई ऋण स्वीकृत होना चाहिए मगर कारपोरेट की सकल लाभ-हानि को जाँच से बाहर रखने के लिए EBITDA एबिटा का(Earnings Before Interest, Taxes, Depreciation, and Amortization) प्रयोग होने लगा होता है। यह किसी भी कंपनी के वास्तविक परिचालन मुनाफे को मापने का एक वित्तीय पैमाना है। यह बताता है कि कंपनी अपने मुख्य बिजनेस से कितना पैसा कमा रही है, जिसमें लोन के ब्याज, सरकारी टैक्स और संपत्ति की टूट-फूट जैसे गैर-नकद खर्च शामिल नहीं होते हैं। एबिटा भारी ऋण, आवश्यक पूंजीगत व्यय, पूँजी की लागत और वास्तविक नकदी प्रवाह की छिपी हुई लागतों को नजरअंदाज करता है।

लगभग एक दशक के कारोबार के बाद भी भारत की बिग बाजार, ईजीडे और स्पेंसर्स आदि समस्त मल्टीब्रांड रिटेल कंपनियां संयुक्त रूप से अपना ब्रेक इवन  यानी सकल व्यय  यानी  की स्थिति तक भी नहीं पहुँच सकी हैं। बावजूद इसके, भारतीय बैकिंग और ऋण व्यवस्था ऐसे कारोबार को लगातार पूँजी उपलब्ध करा रही है। इसमें सबसे गंभीर है घाटे पर माल बेचने के लिए ऋण की उपलब्धता। तथ्य यह है कि निर्माता कंपनियां मेगामार्ट को उतना सस्ता उत्पाद नहीं देतीं, जितनी सस्ती कीमतों पर वे माल बेचते हैं। अर्थ यह हुआ कि वित्त प्रदाता संस्थान खुदरा दुकानदारों को परोक्ष रूप से अप्रतियोगी बनाने में मेगामार्ट की मदद कर रहे हैं। जिस सेक्टर में करोड़ों परिवार लाभ अर्जन से जीवन-यापन करने में सक्षम हों, उसी सेक्टर के एक सेगमेंट को हजारों करोड़ की हानि खड़ी करने के लिए संरक्षित क्यों किया जा रहा है जबकि मेगामार्ट की सफलता का अर्थ करोड़ों खुदरा कारोबारियों की आजीविका का संकट है।

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Author: Bharat Sarathi

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