कुमार कृष्णन

लोकतंत्र की असली कसौटी: असहमति के प्रति सम्मान
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान केवल चुनाव नहीं है। चुनाव सत्ता परिवर्तन का माध्यम हैं, लेकिन लोकतंत्र का वास्तविक नैतिक आधार इस बात में निहित है कि वह असहमति को कितना सम्मान देता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता का आकलन इस बात से होता है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे असहमत और सबसे असुविधाजनक नागरिक की आवाज़ को कितनी गंभीरता से सुनती है।
जब सत्ता संवाद के बजाय मौन को चुनने लगे, तब संकट केवल किसी एक आंदोलन का नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का हो जाता है।
अनशन: शरीर को तर्क बना देने की परंपरा
इन्हीं दिनों लद्दाख के पर्यावरणविद, अभियंता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह केवल एक व्यक्ति का उपवास नहीं होता, बल्कि व्यवस्था के सामने रखा गया एक नैतिक प्रश्न होता है।
अनशन अपने शरीर को ही तर्क बना देने की वह परंपरा है जिसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं होता। महात्मा गांधी ने इसे सत्याग्रह की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना था। जब कोई नागरिक इस अंतिम लोकतांत्रिक उपाय का सहारा लेता है, तो वह यह मानकर चलता है कि सत्ता के भीतर अभी भी संवेदना का कोई कोना शेष है। प्रश्न यह है कि क्या आज भी ऐसा है?
स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और आज की विडंबना
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इस विश्वास पर खड़ा था कि नैतिक शक्ति अंततः राजनीतिक शक्ति को झुकाती है। नमक सत्याग्रह, व्यक्तिगत सत्याग्रह, उपवास और अहिंसक प्रतिरोध ने ब्रिटिश साम्राज्य जैसी ताकत को भी नैतिक संकट में डाल दिया था।
लेकिन स्वतंत्र भारत में विडंबना यह है कि कई बार अपनी ही लोकतांत्रिक सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों के प्रति ऐसी उदासीन दिखाई देती हैं, मानो विरोध कोई नागरिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासनिक असुविधा हो।
स्वामी निगमानंद और स्वामी सानंद की अधूरी पुकार
इस संदर्भ में दो नाम बार-बार स्मरण आते हैं—स्वामी निगमानंद और प्रो. जी. डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद)। दोनों ने गंगा की अविरलता, निर्मलता और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए। एक युवा संन्यासी थे, दूसरे विश्व-प्रसिद्ध अभियंता और पर्यावरण वैज्ञानिक।
दोनों ने अंततः अपने प्राण खो दिए, लेकिन व्यवस्था का हृदय नहीं पिघला। उनकी मृत्यु केवल दो व्यक्तियों की मृत्यु नहीं थी; वह इस प्रश्न की भी मृत्यु थी कि क्या लोकतंत्र अपने सबसे शांतिपूर्ण प्रतिरोध को सुनने की क्षमता बचाए हुए है।
सोनम वांगचुक और संवाद की आवश्यकता
आज सोनम वांगचुक का अनशन उसी परंपरा की याद दिलाता है। वे किसी राजनीतिक दल के पेशेवर नेता नहीं हैं। उन्होंने लद्दाख में शिक्षा, जल संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में जो काम किया है, उसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
उनकी ‘आइस स्तूप’ तकनीक केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जूझते हिमालयी समाज के लिए आशा का मॉडल है। ऐसे व्यक्ति की आवाज़ से असहमति हो सकती है, लेकिन उसे अनसुना कर देना लोकतांत्रिक विवेक के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
लोकतंत्र का अर्थ सहमति नहीं, संवाद है
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सरकार हर मांग स्वीकार कर ले। लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सरकार हर नागरिक को सुनने की जिम्मेदारी स्वीकार करे। संवाद, असहमति और आलोचना लोकतंत्र के शत्रु नहीं, बल्कि उसके प्राण हैं।
जब संवाद की जगह मौन ले लेता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाता है।
संविधान और संवाद की संस्कृति
जर्मन दार्शनिक हन्ना आरेंट ने लिखा था कि सत्ता की सबसे बड़ी विफलता तब होती है, जब वह नागरिकों को संवाद के योग्य नहीं समझती। भारतीय संविधान भी इसी विचार पर आधारित है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और विरोध का अधिकार इसलिए दिए गए कि राज्य निरंकुश न बन सके। यदि नागरिक का शांतिपूर्ण प्रतिरोध भी व्यवस्था तक न पहुँचे, तो संविधान की आत्मा आहत होती है।
“एकला चलो रे” और लोकतंत्र का आदर्श
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था—”यदि तुम्हारी पुकार सुनकर कोई न आए, तो अकेले चलो रे।” यह कविता साहस का गीत है, लेकिन किसी लोकतंत्र का आदर्श नहीं।
लोकतंत्र का आदर्श यह होना चाहिए कि किसी नागरिक को अपनी पुकार अकेले न लगानी पड़े; व्यवस्था उसके शब्दों को सुने, समझे और उत्तर दे।
चुनावी बहुमत और नैतिक वैधता
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है, जब सत्ता यह मान बैठती है कि चुनावी बहुमत ही नैतिक वैधता का अंतिम प्रमाण है। चुनाव सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन नागरिकों की असहमति को अनसुना करने का अधिकार नहीं देता।
संविधान ने सरकार को शक्ति दी है, लेकिन उसी संविधान ने नागरिकों को प्रश्न पूछने, विरोध करने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार भी दिया है।
गांधी का अनशन: ब्लैकमेल नहीं, नैतिक आग्रह
महात्मा गांधी ने अनशन को कभी राजनीतिक ब्लैकमेल का साधन नहीं माना। उनके लिए उपवास आत्मशुद्धि, नैतिक आग्रह और जनचेतना जगाने का माध्यम था।
गांधी जानते थे कि हिंसा सत्ता को कठोर बनाती है, जबकि अहिंसा उसके विवेक को संबोधित करती है। यदि अहिंसक प्रतिरोध भी सत्ता के भीतर कोई नैतिक हलचल पैदा न कर सके, तो यह केवल आंदोलन की विफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की संवेदनहीनता का संकेत है।
शोर के बीच खोती हुई नैतिक आवाज़ें
दुर्भाग्य से आज सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा शोर में बदल गया है। टेलीविजन बहसों में चीखें हैं, सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप हैं, लेकिन समाज के सबसे गंभीर नैतिक प्रश्न अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं।
एक ओर राजनीतिक बयान सुर्खियां बनते हैं, दूसरी ओर किसी शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे व्यक्ति की बिगड़ती सेहत राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बन पाती। यह केवल मीडिया की प्राथमिकताओं का प्रश्न नहीं है; यह हमारी सामूहिक संवेदना की भी परीक्षा है।
लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा का प्रश्न
इतिहास बताता है कि किसी भी समाज का नैतिक स्तर इस बात से नहीं मापा जाता कि वह अपने शक्तिशाली लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जिनके पास केवल नैतिक बल है।
सत्ता के पास प्रशासन, संसाधन और कानून की शक्ति होती है; नागरिक के पास केवल सत्य, तर्क और अंततः अपना शरीर। यदि शरीर को दांव पर लगाने के बाद भी उसकी आवाज़ अनसुनी रह जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति-विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक सिद्धांत की रक्षा करने की है जिसके अनुसार शांतिपूर्ण असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र का आवश्यक तत्व है।









