सूचना का अधिकार तभी सार्थक, जब सूचना माँगनी ही न पड़े

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सूचना का अधिकार कानून का वास्तविक उद्देश्य नागरिकों को आवेदन लिखने के लिए विवश करना नहीं, बल्कि शासन को इतना पारदर्शी बनाना है कि अधिकांश जानकारियाँ स्वतः सार्वजनिक उपलब्ध हों।

डॉ. शैलेश शुक्ला

भारतीय लोकतंत्र ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से नागरिकों को शासन में भागीदारी का एक ऐतिहासिक अधिकार प्रदान किया। इस कानून ने पहली बार स्पष्ट किया कि सरकारी सूचनाएँ सरकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की धरोहर हैं। किंतु इस कानून की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दो दशक बाद भी इसकी प्रक्रिया तो विकसित हुई, पर इसकी मूल भावना अब भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी।

सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य नागरिकों को हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए आवेदन लिखने, शुल्क जमा करने और अपीलों के चक्कर लगाने के लिए बाध्य करना कभी नहीं था। इसकी वास्तविक आत्मा यह थी कि सरकार स्वयं अधिकतम सूचनाएँ सार्वजनिक करे, ताकि सूचना माँगने की आवश्यकता न्यूनतम रह जाए। आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। सूचना माँगना सामान्य बात बन गई है, जबकि सूचना स्वतः उपलब्ध कराना अब भी अपवाद बना हुआ है।

देश में हर वर्ष लाखों आरटीआई आवेदन दायर होते हैं। इनमें से बड़ी संख्या उन सूचनाओं की होती है जो किसी भी उत्तरदायी और आधुनिक प्रशासन की वेबसाइट पर पहले से उपलब्ध होनी चाहिए। चयन सूची, विकास कार्यों का खर्च, निविदाएँ, भुगतान, परियोजनाओं की प्रगति, बजट, लाभार्थियों की सूची या किसी आवेदन की वर्तमान स्थिति—इन सबके लिए आरटीआई आवेदन क्यों आवश्यक हो? यदि प्रत्येक विभाग अपनी वेबसाइट नियमित रूप से अद्यतन रखे और जानकारी खोजने योग्य तथा डाउनलोड करने योग्य रूप में उपलब्ध कराए, तो नागरिकों का समय, धन और सरकारी संसाधन—तीनों बच सकते हैं।

आज हजारों जन सूचना अधिकारी अपना बहुमूल्य समय उन्हीं जानकारियों को खोजने और उपलब्ध कराने में व्यतीत करते हैं जिन्हें तकनीक की सहायता से एक बार सार्वजनिक कर देने के बाद लाखों नागरिक स्वतः देख सकते हैं। यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का अनावश्यक अपव्यय भी है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता का अर्थ केवल भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएँ पहले से ही सीमित हो जाएँ। स्वप्रेरित प्रकटीकरण इसी सोच का आधार है। जब प्रत्येक व्यय, निविदा, ठेका, भुगतान, नियुक्ति, खरीद और प्रशासनिक निर्णय जनता की निगाह में होगा, तब अनियमितताओं के लिए स्थान स्वतः कम हो जाएगा।

विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने ‘ओपन गवर्नमेंट’ और ‘ओपन डेटा’ की अवधारणा को इसी कारण अपनाया कि सूचना छिपाना शासन की शक्ति नहीं, बल्कि उसकी कमजोरी का संकेत है। जितनी अधिक जानकारी नागरिकों के पास होगी, उतनी ही मजबूत जवाबदेही और लोकतांत्रिक विश्वास विकसित होगा।

डिजिटल युग ने इस दिशा में अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं। आज किसी सूचना को सार्वजनिक करना न अत्यधिक महँगा है और न तकनीकी रूप से कठिन। प्रत्येक मंत्रालय, विभाग, विश्वविद्यालय, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक उपक्रम, विकास प्राधिकरण और पंचायत अपने अभिलेखों का डिजिटल प्रबंधन कर सकते हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि वेबसाइटें औपचारिकता का माध्यम न बनें, बल्कि वास्तविक सूचना मंच बनें। बजट, व्यय, ऑडिट रिपोर्ट, परियोजनाओं की प्रगति, अनुबंध, भर्ती प्रक्रिया, शिकायत निवारण, वार्षिक प्रतिवेदन और नागरिकों से जुड़ी हर महत्त्वपूर्ण जानकारी समयबद्ध रूप से सार्वजनिक हो। साथ ही यह जानकारी भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराई जाए, ताकि सूचना का अधिकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक का अधिकार बन सके।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और डिजिटल प्रशासन के दौर में सरकारी सूचनाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। यदि सार्वजनिक सूचनाएँ मशीन-पठनीय स्वरूप में उपलब्ध हों तो शोधकर्ता, पत्रकार, उद्योग, स्टार्टअप, विश्वविद्यालय और नीति निर्माता बेहतर विश्लेषण कर सकेंगे। इससे न केवल अधिक वैज्ञानिक नीतियाँ बनेंगी, बल्कि प्रशासनिक कमियों की पहचान भी समय रहते संभव होगी। ओपन डेटा केवल पारदर्शिता का साधन नहीं, बल्कि नवाचार, आर्थिक विकास और बेहतर सार्वजनिक सेवाओं की आधारशिला भी है।

हालाँकि केवल वेबसाइट बना देना पर्याप्त नहीं है। अनेक सरकारी पोर्टल वर्षों तक अद्यतन नहीं होते, अनेक लिंक निष्क्रिय रहते हैं और कई दस्तावेज़ अधूरे या जटिल भाषा में उपलब्ध होते हैं। ऐसी औपचारिकता पारदर्शिता नहीं कहलाती। सूचना तभी उपयोगी है जब वह समय पर, सटीक, पूर्ण, सरल, खोजने योग्य और सहज रूप से उपलब्ध हो।

अब समय आ गया है कि सूचना के अधिकार की सफलता का मूल्यांकन आरटीआई आवेदनों की संख्या से नहीं, बल्कि उन सूचनाओं की संख्या से किया जाए जिनके लिए नागरिकों को आवेदन करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिस दिन सरकारी वेबसाइटें इतनी विश्वसनीय और समृद्ध हो जाएँगी कि अधिकांश आवश्यक जानकारियाँ नागरिकों को कुछ ही क्लिक में उपलब्ध होने लगेंगी, उसी दिन सूचना का अधिकार अधिनियम अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगा।

लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं आँकी जाती कि उसके पास सूचना का अधिकार कानून है या नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि उसकी शासन-व्यवस्था सूचना छिपाने की संस्कृति पर आधारित है या सूचना साझा करने की संस्कृति पर। भारत को अब दूसरे मार्ग को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपनाना होगा। क्योंकि सुशासन का सर्वोच्च मानक वही है, जहाँ सरकार की पहली प्रवृत्ति सूचना रोकना नहीं, बल्कि उसे स्वेच्छा से सार्वजनिक करना हो। तभी सूचना का अधिकार वास्तव में जनता का अधिकार बनेगा और लोकतंत्र अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी तथा विश्वसनीय बन सकेगा।

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Author: Bharat Sarathi

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