हिरासत में मौतें: बढ़ते आंकड़े, घटती जवाबदेही

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बाबूलाल नागा

महज 74 दिनों में 170 मौतें — यह आंकड़ा नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता का संकेत है। हिरासत, जहां कानून के संरक्षण की उम्मीद होती है, वहीं अगर मौतें होने लगें तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा सवाल है। इतनी बड़ी संख्या का सामने आना इस बात का संकेत है कि समस्या केवल बनी हुई नहीं है बल्कि तेजी से गंभीर होती जा रही है।

हाल में एक ताजा जानकारी ने देश की कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक और द वायर में छपी रिपोर्ट अनुसार केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष 15 मार्च तक देशभर में हिरासत में मौत के 170 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा पिछले पूरे वर्ष 2024-25 के कुल 140 मामलों से भी अधिक है। राज्यवार आंकड़े इस संकट की गहराई को और स्पष्ट करते हैं। बिहार में इस वर्ष अब तक 19 मामले सामने आए हैं जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 10 थी। राजस्थान में 2024-25 के 9 मामलों के मुकाबले इस वर्ष 18 और उत्तर प्रदेश में 11 के मुकाबले 15 मौतें दर्ज की गई हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब में भी 14-14 मामले सामने आए हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं बल्कि देशव्यापी प्रवृत्ति का रूप ले चुकी है।

यदि पिछले वर्षों के रुझान पर नजर डालें तो 2021-22 में 176, 2022-23 में 163, 2023-24 में 157 और 2024-25 में 140 मामले दर्ज हुए थे। यह क्रम एक धीमी गिरावट का संकेत देता था जिससे उम्मीद बंधती थी कि सुधार की दिशा में कुछ प्रगति हो रही है लेकिन इस वर्ष अचानक आई वृद्धि ने उन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पुलिस सुधारों की प्रक्रिया ठहर गई है, या फिर जवाबदेही और निगरानी के तंत्र में गंभीर खामियां बनी हुई हैं।

हिरासत में मौतें केवल आंकड़ा नहीं होतीं, वे कानून के उस मूल सिद्धांत को चुनौती देती हैं जिसमें हर नागरिक को न्यायिक प्रक्रिया के तहत अपने अधिकारों की रक्षा का भरोसा दिया जाता है। जब किसी व्यक्ति को राज्य की निगरानी में रखा जाता है तो उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी भी राज्य की होती है। ऐसे में हिरासत में होने वाली हर मौत सीधे-सीधे उस जिम्मेदारी के निर्वहन पर सवाल खड़े करती है। यह स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है जब इन मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की कमी दिखाई देती है।

अक्सर देखा गया है कि हिरासत में मौत के मामलों में जांच की प्रक्रिया लंबी और अस्पष्ट रहती है। कई बार दोषियों के खिलाफ कार्रवाई या तो देर से होती है या फिर औपचारिकता बनकर रह जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने में देरी होती है और व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास कमजोर पड़ता है। जब जवाबदेही तय नहीं होती तो ऐसी घटनाओं के दोहराए जाने का खतरा बढ़ जाता है।

यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि हिरासत में मौतों के शिकार अक्सर समाज के कमजोर और वंचित तबकों से आते हैं। यह स्थिति सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के विपरीत है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि कानून सभी के लिए समान रूप से काम करे लेकिन जब कमजोर वर्ग ही अधिक प्रभावित दिखाई देते हैं तो यह असंतुलन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है।

इस गंभीर समस्या का समाधान केवल आंकड़े प्रस्तुत करने या चिंता व्यक्त करने भर से नहीं होगा। इसके लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, हिरासत में मौत के हर मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए। पुलिस थानों और हिरासत केंद्रों में सीसीटीवी निगरानी को अनिवार्य और प्रभावी बनाया जाए ताकि घटनाओं की वास्तविकता सामने आ सके। साथ ही, मानवाधिकार आयोगों और निगरानी संस्थाओं को अधिक अधिकार और संसाधन दिए जाने चाहिए ताकि वे प्रभावी ढंग से अपनी भूमिका निभा सकें।

पुलिस बल के प्रशिक्षण में भी संवेदनशीलता और मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कानून लागू करने वाले अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनकी भूमिका केवल अपराध नियंत्रण तक सीमित नहीं है बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, दोषियों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई का स्पष्ट संदेश जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

अंततः, हिरासत में बढ़ती मौतें केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि लोकतंत्र के मूल मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। कानून का राज तभी सार्थक है, जब वह नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित कर सके—अन्यथा आंकड़ों में दर्ज ये मौतें व्यवस्था की असफलता का स्थायी प्रतीक बनती जाएंगी।

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Author: Bharat Sarathi

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