आधुनिकता की आड़ में रिश्तों की मर्यादा

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प्री-हनीमून संस्कृति के बढ़ते चलन से रिश्तों में अविश्वास और सामाजिक असंतुलन का खतरा

— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं, पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की पवित्रता के लिए विश्वभर में जाना जाता रहा है। यहां विवाह को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का पवित्र बंधन माना जाता है। किंतु बदलते समय, पश्चिमी प्रभाव, सोशल मीडिया और आधुनिकता के अंधानुकरण ने समाज के अनेक पारंपरिक मूल्यों को चुनौती दी है। इन्हीं परिवर्तनों के बीच एक नया चलन तेजी से उभर रहा है—शादी से पहले भावी वर-वधू के बीच तथाकथित “प्री-हनीमून” या प्री-मैरिटल रिलेशनशिप का।

आजकल कई युवा विवाह से पहले एक-दूसरे को समझने के नाम पर अकेले घूमने, साथ समय बिताने और निजी संबंधों की सीमाओं तक पहुंचने को आधुनिकता और खुलेपन का प्रतीक मानने लगे हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से महानगरों तथा छोटे-बड़े शहरों में सोशल मीडिया से प्रभावित वर्ग के बीच तेजी से फैलती दिखाई दे रही है। फिल्मों, वेब सीरीज़ और डिजिटल प्लेटफार्मों ने भी इस प्रवृत्ति को कहीं-न-कहीं सामान्य और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है। परिणामस्वरूप अनेक युवा इसे आधुनिक जीवनशैली का स्वाभाविक हिस्सा मानने लगे हैं।

हाल ही में एक समाचार पत्र में प्रकाशित घटना इस प्रवृत्ति के संभावित दुष्परिणामों की ओर संकेत करती है। खबर के अनुसार एक भावी दंपति शादी से पहले प्री-हनीमून के लिए बाहर गए। वहां शराब के नशे में ऐसी बातें सामने आ गईं, जो सामान्य परिस्थितियों में शायद कभी न खुलतीं। युवक ने चालाकी से अपनी भावी वधू से उसके अतीत से जुड़े कुछ निजी रहस्य उगलवा लिए, जो उसके कॉलेज जीवन से संबंधित थे। भावनाओं और विश्वास में बहकर युवती ने वे बातें बता दीं, जिन्हें शायद वह जीवनभर छिपाए रखना चाहती थी। परिणामस्वरूप दोनों के बीच विश्वास का संकट पैदा हो गया और अंततः रिश्ता टूट गया।

यदि मान लिया जाए कि यह रिश्ता न भी टूटता, तो भी यह घटना उनके वैवाहिक जीवन में संदेह और अविश्वास का बीज बो चुकी थी। विवाह का आधार प्रेम, सम्मान और विश्वास होता है। यदि इन मूल स्तंभों में दरार आ जाए, तो सुखी गृहस्थ जीवन की कल्पना करना कठिन हो जाता है। पति-पत्नी के बीच बार-बार अतीत की बातें उठना, संदेह पैदा होना और मानसिक तनाव बढ़ना अंततः पूरे परिवार की शांति को प्रभावित कर सकता है।

वास्तव में भारतीय संस्कृति में कुछ मर्यादाएं इसलिए बनाई गई थीं ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे और रिश्तों की गरिमा सुरक्षित रह सके। आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को पूरी तरह त्याग दें। आधुनिक होना अच्छी बात है, लेकिन विवेकहीन अनुकरण समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा वर्ग आधुनिक शिक्षा और स्वतंत्रता के साथ-साथ अपने सांस्कृतिक मूल्यों की भी समझ विकसित करे। विवाह से पूर्व एक-दूसरे को समझना गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए ऐसी सीमाएं पार करना आवश्यक नहीं, जो आगे चलकर पश्चाताप और विवाद का कारण बन जाएं। संयम और मर्यादा ही किसी भी रिश्ते की स्थिरता की आधारशिला होते हैं।

समाजसेवी संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों और परिवारों को भी इस विषय पर जागरूकता फैलानी होगी। युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि क्षणिक आकर्षण और आधुनिकता के नाम पर उठाए गए कदम उनके भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। सोशल मीडिया और मनोरंजन जगत को भी ऐसी जीवनशैली का अनावश्यक महिमामंडन करने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए।

अंततः यह समझना होगा कि समाज तभी मजबूत रहता है जब उसकी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत हों। इसलिए आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

प्री-हनीमून संस्कृति : क्यों बढ़ रही है प्रवृत्ति?
• सोशल मीडिया और वेब सीरीज़ का प्रभाव
• पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण
• व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती धारणा
• परिवारों के बीच संवाद में कमी

संभावित दुष्परिणाम
• रिश्तों में संदेह और अविश्वास
• वैवाहिक जीवन में मानसिक तनाव
• परिवारों के बीच टकराव
• सामाजिक मूल्यों में गिरावट

क्या होना चाहिए संतुलन?
• विवाह पूर्व समझ-बूझ, लेकिन मर्यादा के साथ
• परिवार और संस्कारों की भूमिका मजबूत
• युवाओं में सांस्कृतिक मूल्यों की जागरूकता
• मनोरंजन माध्यमों में जिम्मेदार प्रस्तुति

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Author: Bharat Sarathi

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