ओंकारेश्वर पांडेय

हमारे वेदों और पुराणों में सत्य और न्याय की अडिगता को लेकर एक अत्यंत मर्मस्पर्शी आख्यान आता है। महाराज हरिश्चंद्र का प्रसंग हो या महाभारत का ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ का उद्घोष—सनातन चेतना हमेशा इस बात की गवाही देती है कि जब राजा या व्यवस्था का अंपायर (तटस्थ मार्गदर्शक) खुद अपनी मर्यादा से विमुख होने लगे तो संपूर्ण साम्राज्य का नैतिक पतन सुनिश्चित हो जाता है। कठोपनिषद में एक ऋचा है: “ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके”—अर्थात, इस संसार में न्याय और सत्य का रस वही चख सकते हैं जो कर्मों की शुचिता बनाए रखते हैं। परंतु समकालीन भारतीय लोकतांत्रिक रंगमंच पर यह पवित्र और ऐतिहासिक प्रतिज्ञा पूरी तरह खंडित नजर आती है।
दशकों से इस देश के नागरिकों को यह वैधानिक दिलासा दिया जा रहा है कि “न्याय में देरी, न्याय की अवहेलना है,” लेकिन वर्तमान में एक गहरा संस्थागत संकट पूरी व्यवस्था को अपनी जद में ले चुका है। यह संकट है—इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की विसंगतियों को दिया गया प्रशासनिक संरक्षण, मतपत्रों की गिनती में सरेआम हेरफेर और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की वह चश्माधारी निष्पक्षता, जो सत्ता के गलियारों के प्रति संदेहास्पद रूप से लचीली नजर आती है।
3 जून, 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय का वह ऐतिहासिक और विस्फोटक फैसला, जिसने द्रमुक (DMK) नेता एम. अप्पावु को राधापुरम विधानसभा क्षेत्र का वास्तविक विजेता घोषित किया, हमारी चुनावी और न्यायिक व्यवस्था की कछुआ चाल पर एक करारा तमाचा है। यह फैसला वर्ष 2016 के चुनावों के पूरे दस साल बाद आया है—एक ऐसा कालखंड जिसमें उस विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हुए भी पांच साल बीत चुके हैं। यहाँ यह विदारक संवाद स्वतः कौंधता है कि अप्पावु इस संस्थागत मत-चोरी के खिलाफ केवल इसलिए टिक सके क्योंकि उनके पास एक दशक लंबी खर्चीली कानूनी लड़ाई लड़ने का राजनीतिक और आर्थिक रसूख था, जिसके बूते वह 2021 में विधानसभा अध्यक्ष भी बने। लेकिन उन अनगिनत निर्दलीय और साधनहीन उम्मीदवारों का क्या, जिनके पास ऐसा रसूख नहीं है? उनके लिए न्याय की यह कछुआ चाल चुराए गए जनादेशों को स्थायी बनाने का एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाती है।
धांधली का प्रशासनिक पैटर्न: राधापुरम से लेकर चंडीगढ़ और हरियाणा तक
राधापुरम का मामला उस गहरी प्रशासनिक सड़न को उजागर करता है जहाँ चुनावी अधिकारियों की तथाकथित “लिपिकीय गलतियाँ” करीबी मुकाबलों के नतीजों को पूरी तरह पलट देती हैं। वर्ष 2016 में, अप्पावु को उनके अन्नाद्रमुक (AIADMK) प्रतिद्वंद्वी से महज 49 वोटों से हारा हुआ घोषित कर दिया गया था। जब उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर मतपत्रों की दोबारा गिनती का आदेश दिया, तो जो सच सामने आया वह लोकतांत्रिक शुचिता को शर्मसार करने वाला था। रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा दुर्भावनापूर्ण और मनमाने तरीके से खारिज किए गए 203 पोस्टल (डाक) वोटों में से 153 वोट वैध रूप से अप्पावु के पक्ष में थे। वास्तविक और पारदर्शी गिनती ने साबित किया कि अप्पावु 103 वोटों से चुनाव जीत चुके थे। इस फैसले ने स्थापित किया कि जनमत कुछ और था और सरकारी तंत्र द्वारा घोषित परिणाम कुछ और।
वोटों की यह हेराफेरी कोई इकलौती या अपवादात्मक घटना नहीं है। यह उस प्रशासनिक हेरफेर का एक स्थापित पैटर्न है जो अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। ऐसा ही एक गंभीर और साक्ष्य-आधारित उदाहरण अगस्त 2025 में हरियाणा के बुआना लाखू सरपंच चुनाव विवाद में सामने आया। वहाँ स्थानीय चुनावी अधिकारियों ने स्थापित नियमों को ताक पर रखकर उम्मीदवार मोहित कुमार को “पराजित” घोषित कर दिया था। मोहित कुमार ने इस प्रशासनिक कदाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में असाधारण कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि उस चुनाव की सभी EVM को भौतिक रूप से (Physically) दिल्ली लाया जाए। सर्वोच्च अदालत के परिसर के भीतर, सख्त वीडियो निगरानी और न्यायिक अधिकारियों की मौजूदगी में जब दोबारा गिनती हुई, तो परिणाम पूरी तरह उलट गया और मोहित कुमार एक बड़े अंतर से विजेता घोषित किए गए।
इससे भी ज्यादा प्रत्यक्ष और कैमरे पर कैद हुआ शर्मनाक उदाहरण 2024 का चंडीगढ़ मेयर चुनाव संकट था। वहाँ पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह सीसीटीवी कैमरे के सामने एक “संदेहास्पद” की तरह ऊपर देखते हुए, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार कुलदीप कुमार के पक्ष में पड़े आठ वैध मतपत्रों पर खुद पेन चलाकर उन्हें खराब (Deface) करते हुए रंगे हाथों पकड़े गए, ताकि सत्ताधारी दल के उम्मीदवार को अवैध रूप से विजयी बनाया जा सके। यह भारतीय चुनावी इतिहास का वह काला अध्याय था जहाँ सुप्रीम कोर्ट को अपने विशेषाधिकार (अनुच्छेद 142) का उपयोग करते हुए दखल देना पड़ा। अदालत ने इसे “लोकतंत्र की हत्या” करार दिया, मसीह की दूषित गिनती को खारिज किया और कुलदीप कुमार को वास्तविक मेयर घोषित किया।
राधापुरम, हरियाणा और चंडीगढ़ के ये तीनों मामले मिलकर एक खौफनाक और अकाट्य हकीकत बयां करते हैं: चुनावी अधिकारियों द्वारा घोषित शुरुआती नतीजे मशीनों या बक्शों में बंद असली जनमत से पूरी तरह भिन्न हो सकते हैं, और इस ‘ब्लैक बॉक्स’ को खोलने में हमारी न्याय व्यवस्था को महीनों से लेकर पूरे दस साल तक का समय लग जाता है।
“वोट चोरी” और छिपाया गया डेटा: ADR के चौंकाने वाले साक्ष्य
इन न्यायिक खुलासों और प्रशासनिक विसंगतियों ने जन-आक्रोश और राजनीतिक असंतोष की आग में घी डालने का काम किया है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपनी बेंगलुरु कॉन्फ्रेंस और “हरियाणा फाइल्स” के जरिए “वोट चोरी” और चुनावी अपारदर्शिता के खिलाफ एक आक्रामक अभियान छेड़ रखा है। गांधी ने बिहार के ग्रामीण और सुदूर इलाकों में एक महीने लंबी जन-जागृति यात्रा करते हुए चुनाव प्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता और ‘रॉ लॉग डेटा’ को सार्वजनिक करने की मांग की।
यहाँ सबसे बड़ा तार्किक सवाल यह उठता है कि जब भी स्वतंत्र उम्मीदवारों, शोधकर्ताओं या नागरिक संगठनों ने काउंटिंग हॉल की डिजिटल फुटेज और EVM के रॉ लॉगिंग डेटा (Raw Logging Data) की मांग की, तो चुनाव आयोग ने तकनीकी और सुरक्षात्मक बहानों के पीछे छिपकर डेटा साझा करने से साफ इनकार क्यों कर दिया? अल्प समय में डेटा को डिलीट कर देना, महत्वपूर्ण वीडियो फुटेज को सुरक्षित न रखना और शिकायतों की स्थापित प्रक्रिया पर ही सवाल उठाना—ऐसे कदम हैं जो निर्वाचन आयोग की साख को गंभीर रूप से चोट पहुँचाते हैं।
इस अविश्वास के माहौल के बीच, 12 जून 2026 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक सरकारी इमारत में लगी आग ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस अग्निकांड में करीब 4,000 EVM जलकर खाक हो गईं। ये वे मशीनें थीं जिनका इस्तेमाल इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में 10 संवेदनशील सीटों पर किया गया था। इस घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने चुनाव आयोग से और कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी (AAP) ने सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस ने इस मामले की गहन जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। राज्य सरकार के मंत्री कौशिक चौधरी का यह आधिकारिक बयान कि “यह आग सामान्य नहीं है और इसके पीछे किसी गहरी साजिश की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता,” मामले की गंभीरता को रेखांकित करता है। जब चुनावी विसंगतियों पर कानूनी और तकनीकी सवाल उठ रहे हों, ऐसे समय में हजारों मशीनों का जल जाना साक्ष्यों को नष्ट करने की साजिश के संदेह को जन्म देता है।
डेटा छुपाने और पारदर्शिता से बचने की यह प्रशासनिक जिद तब और ज्यादा संदेहास्पद हो जाती है, जब हम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा संकलित आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। ADR की खोजी रिपोर्ट ने संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में डाले गए कुल वोटों (Votes Polled) और गिने गए वोटों (Votes Counted) के बीच के भारी और अतार्किक अंतर को उजागर किया है:
ADR रिपोर्ट: मतों की गणना में विसंगतियों का सांख्यिकीय विश्लेषण
| विसंगति का प्रकार | प्रभावित निर्वाचन क्षेत्र | कुल मतों की संख्या | प्रशासनिक प्रभाव |
| गायब हुए वोट (Deficit Votes) | 362 निर्वाचन क्षेत्र | 5,54,598 वोट | मतदान के दिन दर्ज मतों की तुलना में गिनती के समय मत कम पाए गए। |
| भूतिया वोट (Ghost Votes) | 176 निर्वाचन क्षेत्र | 35,093 वोट | मतदान के दिन दर्ज मतों की तुलना में गिनती के समय अतिरिक्त मत हवा से पैदा हो गए। |
निर्वाचन आयोग भले ही इन आंकड़ों को “मामूली लिपिकीय या मानवीय त्रुटि” (Clerical Error) कहकर खारिज करने का प्रयास करे, लेकिन गणितीय और राजनीतिक हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। भारत के चुनावी इतिहास में दर्जनों सीटें ऐसी होती हैं जहाँ हार-जीत का अंतर महज 200 वोटों से भी कम होता है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1999 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार संसद में महज एक वोट से विश्वास मत हार गई थी। ऐसी स्थिति में, जब एक-एक लोकसभा या विधानसभा सीट पर विसंगतियां हजारों वोटों की हों, तो ये तथाकथित “मामूली अंतर” किसी भी विपक्षी उम्मीदवार को हराने, विधायी सदन का बहुमत बदलने या किसी राजनीतिक दल को कृत्रिम बहुमत सौंपने के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं।
तकनीकी असमानता: निर्वाचन आयोग का चयनात्मक हंटर
व्यवस्था की यह विसंगति सिर्फ EVM और मतों की गिनती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे नामांकन के स्तर पर ही विपक्षी उम्मीदवारों के खिलाफ एक प्रशासनिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। इसका सबसे ताजा और प्रमाणिक उदाहरण 9 जून, 2026 को मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के नामांकन पत्रों की संवीक्षा (Scrutiny) के दौरान देखा गया।
वहाँ चुनाव आयोग के रिटर्निंग ऑफिसर ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र बेहद मामूली और कानूनी रूप से कमजोर तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। सत्ताधारी दल की शिकायत पर त्वरित और असाधारण सक्रियता दिखाते हुए चुनाव अधिकारियों ने दावा किया कि नटराजन ने अपने हलफनामे (Affidavit) में एक “लंबित आपराधिक मामले” को छुपाया है जबकि वास्तविक और दस्तावेजी हकीकत यह थी कि उनके खिलाफ देश के किसी भी थाने में न तो कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज थी, न कोई आपराधिक आरोप थे और न ही कोई मुकदमा लंबित था। जिसे आयोग ने “तथ्यों को छुपाना” (Omission) माना, वह दरअसल तेलंगाना की एक अदालत में चल रहा 10 करोड़ रुपये के मुआवजे का एक सामान्य दीवानी (Civil) नोटिस था जिसका जवाब नटराजन की कानूनी टीम बहुत पहले ही अदालत में दाखिल कर चुकी थी। यहाँ निर्वाचन आयोग ने अपने ही उन स्पष्ट दिशानिर्देशों को दरकिनार कर दिया जो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिए गए लंबित आपराधिक मामलों को छुपाने पर ही नामांकन रद्द हो सकता है, दीवानी (Civil) मामलों या नोटिसों पर नहीं। इस चयनात्मक तकनीकी हंटर को चलाकर आयोग ने राज्यसभा चुनाव के लोकतांत्रिक समीकरणों को प्रभावित किया और विपक्ष को मुकाबले से बाहर कर दिया।
इसके अतिरिक्त, चुनावों से ठीक पहले अनेक राज्यों में ‘सस्पेक्टेड वोटर वेरिफिकेशन’ (SIR) के नाम पर लाखों नागरिकों को बिना किसी उचित न्यायिक सुनवाई या अवसर दिए मतदान के अधिकार से वंचित करने के गंभीर आरोप भी आयोग पर लगे हैं। असम में जो काम एक बेहद जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रिया ‘एनआरसी’ (NRC) के माध्यम से हुआ, वैसा ही संवेदनशील काम अन्य राज्यों में प्रशासनिक आदेशों के जरिए आनन-फानन में कर दिया गया। यदि वे मतदाता वास्तव में अवैध नागरिक थे, तो उन्हें कानूनन डिपोर्ट (निर्वासित) क्यों नहीं किया गया? इस बुनियादी सवाल का जवाब देने के बजाय केवल टीवी कैमरों को कुछ फुटेज देकर औपचारिकता पूरी कर ली गई। निर्वासन (Deportation) का कोई भी वास्तविक और प्रामाणिक डेटा आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे यह पूरी कवायद चुनावी लाभ-हानि के राजनीतिक मकसद से प्रेरित नजर आने लगती है।
संस्थागत कब्जा: संवैधानिक अंपायर पर कार्यपालिका का नियंत्रण
चुनावी न्याय में जानबूझकर की जा रही देरी, गायब होते डेटा और विपक्षी उम्मीदवारों की चयनात्मक अयोग्यताओं के पीछे एक कड़वी और संरचनात्मक सच्चाई छिपी है—वह है चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका का पूर्ण और एकतरफा नियंत्रण।
नए विधायी प्रावधानों के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) शामिल होते हैं। इस समिति की संरचनात्मक बनावट ही ऐसी है कि विपक्ष का नेता हमेशा 2-1 के सरकारी बहुमत के सामने एक लाचार अल्पसंख्यक सदस्य बनकर रह जाता है। जब लोकतंत्र का ‘अंपायर’ ही पूरी तरह से सत्तापक्ष द्वारा चुना जाएगा, तो खेल की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। ऐसी स्थिति में, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86(7)—जो स्पष्ट रूप से आदेश देती है कि सभी चुनावी विवादों का निपटारा छह महीने के भीतर अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए—का सरेआम उल्लंघन होना कोई प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि इस व्यवस्था का एक सोचा-समझा हिस्सा नजर आता है।
यदि हम वैश्विक स्तर पर नजर डालें, तो दुनिया के मजबूत और परिपक्व लोकतंत्र चुनावी विवादों को आपातकालीन गति और संवेदनशीलता से निपटाते हैं:
· केन्या: वर्ष 2017 के अत्यधिक जटिल और विवादित राष्ट्रपति चुनाव के मामले को वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय ने महज 26 दिनों के भीतर पूरी तरह सुलझाकर नया चुनाव कराने का आदेश दे दिया था।
· अमेरिका: विधायी और राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े विवादों का निपटारा वहाँ की अदालतें एक से तीन महीनों के भीतर तार्किक रूप से कर देती हैं।
· यूनाइटेड किंगडम (UK): वहाँ विशेष “इलेक्शन कोर्ट” (Election Courts) लगातार बैठकर दैनिक आधार पर सुनवाई करते हैं, ताकि नई सरकार के शपथ लेने से पहले ही सारे चुनावी विवादों का अंतिम फैसला आ जाए।
तो क्या उपाय है- विश्वास की बहाली ही लोकतंत्र का एकमात्र मार्ग है
भारतीय लोकतंत्र में सच्चा न्यायिक और चुनावी सुधार सिर्फ नई तकनीकों को अपनाने, उन्नत कंप्यूटर खरीदने या भव्य डिजिटल रोडमैप बनाने से नहीं आएगा। इसके लिए एक कठोर, अपरिवर्तनीय और गैर-परिवर्तनीय कानूनी समय-सीमा (Statutory Timeline) की आवश्यकता है, जो निर्वाचन आयोग और अदालतों को हर EVM, तकनीकी विसंगति और नामांकन विवाद को अधिकतम छह महीने के भीतर हल करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करे। जब तक यह संस्थागत सख्ती नहीं लाई जाएगी, तब तक “संवैधानिक धर्म” और “चुनावी न्याय” के तमाम वादे खोखले रहेंगे; क्योंकि एक दशक बाद मिलने वाला न्याय वास्तव में न्याय नहीं बल्कि स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं की आड़ में जनता के वास्तविक मत का दफन है।
इसलिए, सत्ता पक्ष का बार-बार यह तर्क देना कि “विपक्ष चुनाव जीत क्यों नहीं जाता,” एक अत्यंत सतही और पक्षपाती बयान है। स्वस्थ लोकतंत्र की मांग है कि सत्ता पक्ष एक अपारदर्शी निर्वाचन आयोग के पीछे खड़े होने के बजाय, चुनावी व्यवस्था की शुचिता और जनता के विश्वास के पक्ष में खड़ा हो। देश को एक ऐसा ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ (समान अवसर) वापस मिलना चाहिए, जिसके तहत देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव जीते भी और पूरी गरिमा के साथ हारे भी। उस दौर में अंपायर को आजीवन संरक्षण या तकनीकी सुरक्षा कवच देने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
अंत में, एक अत्यंत बुनियादी और तार्किक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है: जब दुनिया का सबसे पुराना और आधुनिक तकनीक से संपन्न लोकतंत्र—संयुक्त राज्य अमेरिका—अपने नागरिकों का भरोसा बनाए रखने के लिए मतपत्रों (Paper Ballots) और उनकी भौतिक गिनती का विकल्प देता है, तो इक्कीसवीं सदी का यह संसाधन संपन्न, संप्रभु और लोकतांत्रिक भारत अपनी चुनावी प्रणाली में पूर्ण विश्वास और शुचिता बहाल करने के लिए इस विकल्प पर खुले मन से पुनर्विचार करने से कतरा क्यों रहा है?
हमारे मनीषियों के कालजयी ज्ञान का एक शाश्वत नीति-वाक्य है: “धर्मो रक्षति रक्षितः”—अर्थात, जो धर्म (न्याय और कर्तव्य) की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा करता है। परंतु समकालीन भारतीय लोकतांत्रिक रंगमंच पर यह पवित्र संवैधानिक प्रतिज्ञा पूरी तरह खंडित नजर आती है।







