अमेरिका-ईरान तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और भारतीय शेयर बाजार: वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की परीक्षा

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“अमेरिका-ईरान तनाव, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और एआई निवेश रुझानों के बीच विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली, घरेलू निवेशकों ने संभाला भारतीय बाजार”

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया। वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में वित्तीय बाजार केवल आर्थिक संकेतकों से संचालित नहीं हो रहे हैं, बल्कि भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी उनकी दिशा तय कर रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव तथा संभावित समझौते को लेकर सामने आ रहे परस्पर विरोधी दावों ने वैश्विक निवेशकों को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। एक ओर अमेरिका लगातार यह संकेत दे रहा है कि दोनों देशों के बीच समझौते की दिशा में सकारात्मक प्रगति हो रही है, वहीं दूसरी ओर ईरान इसे प्रारंभिक वार्ता बताते हुए अपनी शर्तों पर अडिग दिखाई दे रहा है। ईरान के भीतर भी संभावित समझौते के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। इस अनिश्चितता का सीधा प्रभाव वैश्विक पूंजी प्रवाह, निवेशकों के विश्वास और शेयर बाजारों पर पड़ रहा है।

भारत भी इस वैश्विक उथल-पुथल से अछूता नहीं है। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के अनुसार जून 2026 के पहले पखवाड़े में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने भारतीय शेयर बाजारों से लगभग 62,853 करोड़ रुपये की निकासी की है। यह केवल भारतीय बाजार की घटना नहीं, बल्कि वैश्विक पूंजी के बदलते रुझानों, बढ़ते जोखिम और निवेशकों की सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर वापसी का संकेत है।

मेरे विचार से विदेशी निवेशकों की यह बिकवाली किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि अनेक वैश्विक और घरेलू कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। सबसे प्रमुख कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था की अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि और ब्याज दरों के ऊंचे स्तर पर बने रहने से वैश्विक निवेशकों को सुरक्षित एवं सुनिश्चित प्रतिफल के अवसर मिल रहे हैं। जब अमेरिका में जोखिम-मुक्त प्रतिफल बढ़ता है, तब भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश का आकर्षण स्वाभाविक रूप से कुछ कम हो जाता है।

विदेशी फंड प्रबंधक जोखिम उठाकर उभरते बाजारों में निवेश करने की अपेक्षा अमेरिकी सरकारी बॉन्ड तथा डॉलर आधारित परिसंपत्तियों में निवेश को अधिक सुरक्षित मानते हैं। परिणामस्वरूप भारत सहित अनेक उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी निकासी तेज हो जाती है।

विदेशी निवेशकों की सतर्कता का दूसरा बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता है। अमेरिका-ईरान तनाव, तेल आपूर्ति मार्गों को लेकर चिंताएं, ऊर्जा कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव और वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। इतिहास बताता है कि जब भी युद्ध अथवा संघर्ष की आशंका बढ़ती है, निवेशक तथाकथित “सेफ हेवन” परिसंपत्तियों—जैसे अमेरिकी डॉलर, सोना और विकसित देशों के सरकारी बॉन्ड—की ओर रुख करते हैं। इसके विपरीत उभरते बाजार अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण माने जाते हैं। जून के पहले पखवाड़े में भारतीय बाजार से हुई भारी विदेशी निकासी इसी प्रवृत्ति का परिणाम मानी जा सकती है।

भारतीय शेयर बाजार के ऊंचे मूल्यांकन और मुनाफावसूली को भी इस बिकवाली का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती, कॉर्पोरेट आय में सुधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार तथा घरेलू निवेशकों की सक्रिय भागीदारी के कारण भारतीय शेयर बाजारों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। प्रमुख सूचकांक रिकॉर्ड ऊंचाइयों तक पहुंचे। ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशकों ने अपने निवेश पर लाभ सुरक्षित करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी।

इसके अतिरिक्त भारतीय रुपये की कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। यदि कोई विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में लाभ अर्जित करता है, लेकिन उसी अवधि में रुपये का मूल्य डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाता है, तो उसका वास्तविक डॉलर-आधारित प्रतिफल घट जाता है। इसलिए मुद्रा जोखिम भी निवेश संबंधी निर्णयों को प्रभावित करता है।

यदि एनएसडीएल के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2026 में फरवरी को छोड़कर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगभग प्रत्येक माह भारतीय शेयरों के शुद्ध विक्रेता रहे हैं। जनवरी में लगभग 35,962 करोड़ रुपये की निकासी हुई, जबकि फरवरी में लगभग 22,615 करोड़ रुपये का निवेश आया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे बड़ा मासिक प्रवाह था। इसके बाद मार्च में रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये, अप्रैल में 60,847 करोड़ रुपये तथा मई में 32,963 करोड़ रुपये की बिकवाली दर्ज की गई। जून के पहले पंद्रह दिनों में ही 62,853 करोड़ रुपये की निकासी हो चुकी है। इस प्रकार वर्ष 2026 में कुल विदेशी निकासी लगभग 2.87 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जो वर्ष 2025 की कुल निकासी से भी काफी अधिक है।

ये आंकड़े संकेत देते हैं कि विदेशी निवेशकों का रुख केवल अल्पकालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वैश्विक निवेश रणनीति के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा है। हाल के महीनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित कंपनियों तथा अमेरिकी प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने वैश्विक पूंजी को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया है। अनेक अंतरराष्ट्रीय फंड उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर एआई और उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं। इससे भारत सहित कई देशों के शेयर बाजारों पर दबाव बना है।

हालांकि विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार पूरी तरह से प्रभावित नहीं हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) तथा खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी है। पिछले कुछ वर्षों में म्यूचुअल फंड, एसआईपी, बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों में निवेश उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। घरेलू निवेशकों ने विदेशी निवेशकों द्वारा बेचे गए शेयरों की बड़े पैमाने पर खरीदारी की है। यही वजह है कि बाजार में अस्थिरता बढ़ने के बावजूद व्यापक गिरावट देखने को नहीं मिली।

यह स्थिति भारतीय पूंजी बाजार की संरचनात्मक मजबूती को भी दर्शाती है। पहले विदेशी निवेशकों की बिकवाली का बाजार पर गंभीर प्रभाव पड़ता था, लेकिन अब घरेलू बचत का बड़ा हिस्सा वित्तीय परिसंपत्तियों की ओर प्रवाहित हो रहा है। इससे भारतीय बाजारों की विदेशी पूंजी पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होती दिखाई दे रही है।

फिर भी विदेशी पूंजी का निरंतर बहिर्वाह चालू खाते के घाटे, रुपये की विनिमय दर और बाजार की तरलता पर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक और नीति निर्माता विदेशी निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए विभिन्न उपायों पर कार्य कर रहे हैं। विदेशी निवेश नियमों को सरल बनाना, बॉन्ड बाजार तक पहुंच बढ़ाना तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन को सुदृढ़ करना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।

आने वाले सप्ताह वैश्विक निवेशकों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता की दिशा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, जापान के केंद्रीय बैंक के निर्णय तथा वैश्विक आर्थिक वृद्धि से जुड़े संकेतक पूंजी प्रवाह की दिशा तय करेंगे। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल कीमतों में स्थिरता आती है तो भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह सकारात्मक होगा। वहीं यदि तनाव बढ़ता है तो ऊर्जा लागत, मुद्रास्फीति और विदेशी निवेश प्रवाह पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

निष्कर्षतः, जून 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा की गई 62,853 करोड़ रुपये की भारी बिकवाली केवल भारतीय शेयर बाजार की घटना नहीं है, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में चल रहे व्यापक परिवर्तनों का प्रतिबिंब है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती, ऊंची बॉन्ड यील्ड, पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव, रुपये की कमजोरी, एआई आधारित निवेश अवसरों की ओर वैश्विक पूंजी का झुकाव तथा भारतीय बाजारों में मुनाफावसूली—इन सभी कारकों ने मिलकर विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार से धन निकालने के लिए प्रेरित किया है।

इसके बावजूद घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विकास क्षमता यह संकेत देती है कि यह चुनौती स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य हो सकती है। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और निवेशकों का जोखिम लेने का विश्वास लौटता है, तो भारत एक बार फिर विदेशी पूंजी के प्रमुख आकर्षण केंद्र के रूप में उभर सकता है। फिलहाल यह दौर भारतीय वित्तीय प्रणाली की मजबूती, घरेलू निवेशकों के विश्वास और देश की आर्थिक लचीलेपन की महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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