उर्वरक आयात पर निर्भरता खतरनाक, 70 फीसदी तक कर रहे आयात,

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पुनीत उपाध्याय

मानसून आने वाला है। किसान भी फसल की तैयारी में जुटने लगे हैं लेकिन सबकुछ इतना सहज प्रतीत नहीं हो रहा। बदलते वैश्विक हालात के बीच भारत में खेती भी प्रभावित होनी तय है। दरअसल चाहे हमने खाद्यान उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली हो लेकिन फसल के लिए जरुरी उर्वरक के मामले में हम आज भी दूसरे देशों पर ही निर्भर है। हमारी जरुरत का 70 फीसदी उर्वरक हम आज भी आयात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक आयातक है।

हाल ही में यह बात सामने आई है कि उर्वरकों की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करने में भारत अभी भी कमजोर है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार 2024.25 में भारत में उर्वरकों की कुल मांग 6.49 करोड़ टन थी। इसके मुकाबले देश में 4.65 करोड़ टन का उत्पादन ही हो सका। सबसे ज्यादा मांग यूरिया की है। इसके बाद एनपीके, डीएपीए और पोटाश का नंबर आता है। घरेलू उत्पादन और मांग के बीच की इस खाई को आयात के जरिए पाटा जाता है जो साल 2024.25 में 1.6 करोड़ टन रहा। इस आयात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से से आता है। यूरिया के कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ओमान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात से आता है। डीएपी के मामले में अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ज्यादा है। इस व्यापार का बड़ा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है जो फिलहाल बंद है। भारत की नाइट्रोजन आपूर्ति का लगभग 30.40 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता सिर्फ तैयार उर्वरकों तक सीमित नहीं है। घरेलू उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है। यूरिया के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस का 85 प्रतिशत हिस्सा आयात से आता है। इसके अलावा रॉक फॉस्फेट का 90.95 प्रतिशत और फॉस्फोरिक एसिड का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से आता है।

अन्य विकल्पों को अपनाने की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में धीरे.धीरे और सावधानी से कमी लानी चाहिए। इसके लिए जैव उर्वरकों, जैविक खाद, कंपोस्ट, नैनो उत्पादों जैसे आधुनिक विकल्पों और भविष्य में ग्रीन अमोनिया का सहारा लेना होगा। जैविक खेती भी एक अच्छा विकल्प है। उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में सुधार करना भी उतना ही जरूरी है। साल 2024द-25 में सरकार ने इस सब्सिडी पर 1,77,157 करोड़ रुपये खर्च किए जिसमें से 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ यूरिया पर गया। इतनी भारी सब्सिडी की वजह से लंबे समय से इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होता रहा है। कई बार किसान जरूरत से ज्यादा मात्रा में इसका उपयोग करते हैं जिससे पोषक तत्व बहकर बर्बाद हो जाते हैं और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट और अमोनियम सल्फेट जैसे कम पोषक तत्व वाले उर्वरकों की ओर रुख किया जाना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों की खपत घटाने, मिट्टी की सेहत सुधारने और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए साल 2023 में पीएम.प्रणाम योजना शुरू की गई थी जिसमें खाद का इस्तेमाल कम करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान था। लेकिन अपने आखिरी साल (2025 -26) में पहुंचने के बाद भी यह योजना खास आगे नहीं बढ़ पाई।

हालात को देख कर रहे तैयारी

14 मार्च को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत आने वाले खरीफ सीजन की तैयारी के तहत फरवरी के मध्य से ही उर्वरकों का स्टॉक जुटा रहा है और पहले से ऑर्डर दे रहा है। 13 मार्च तक के आंकड़ों के अनुसारए यूरिया, डाई.अमोनियम फॉस्फेट और नाइट्रोजन.फॉस्फोरस.पोटैशियम का स्टॉक पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले काफी ज्यादा था। हालांकि अगर लड़ाई लंबी चली तो यह स्टॉक पर्याप्त नहीं होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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