ईरान में महिलाओं के अधिकार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक बंदियों और दमनात्मक कानूनों को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है।
ईरान की स्थिति अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों,सामाजिक नियंत्रण,राजनीतिक असंतोष और युवा पीढ़ी की निराशा का सामूहिक विस्फोट है
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया वैश्विक स्तरपर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ईरान इस समय अपने आधुनिक इतिहास के सबसे संवेदनशील और निर्णायक दौर से गुजर रहा है। यह संकट केवल कानून-व्यवस्था या किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से जमा होते आ रहे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, आर्थिक दबावों, सामाजिक नियंत्रण, राजनीतिक असंतोष और युवा पीढ़ी की गहराती निराशा का सामूहिक विस्फोट है। हालिया महीनों में गोलीबारी, आगजनी और हिंसक झड़पों में अमेरिकी मानवाधिकार आयोग से जुड़े सूत्रों के अनुसार 544 से अधिक मौतों की खबरें इस बात का संकेत हैं कि ईरान अब असंतोष की अवस्था से आगे बढ़कर व्यापक अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा है। यह अस्थिरता घरेलू होते हुए भी क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव रखती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और आर्थिक ढांचे का क्षरण
ईरान में जनता का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ। यह वर्षों से भीतर ही भीतर उबलता रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को लगातार कमजोर किया है। तेल निर्यात सीमित हुआ, विदेशी निवेश लगभग ठप हो गया और बैंकिंग प्रणाली वैश्विक वित्तीय तंत्र से कटती चली गई। इसका सीधा असर रोजगार, मुद्रा मूल्य, महंगाई और आम नागरिक की क्रय-शक्ति पर पड़ा। आज स्थिति यह है कि आम ईरानी नागरिक के लिए जीवन केवल सम्मानजनक जीवन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अस्तित्व का संघर्ष बन चुका है।
मुद्रा, महंगाई और कर नीति: आर्थिक पतन का स्पष्ट संकेत

यदि हम आर्थिक पतन को मुद्रा और महंगाई के संदर्भ में देखें, तो वर्ष 2025 में ईरानी मुद्रा ‘रियल’ का अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर गिरकर लगभग 1.45 मिलियन रियल प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंचना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक विश्वसनीयता के पतन का प्रतीक है। एक वर्ष के भीतर मुद्रा का लगभग आधा मूल्य गिर जाना यह दर्शाता है कि बाजार को सरकार की नीतियों और भविष्य की स्थिरता पर भरोसा नहीं रहा।मुद्रा अवमूल्यन ने आयातित वस्तुओं को अत्यधिक महंगा कर दिया, जिससे महंगाई विकराल रूप ले चुकी है। आवश्यक खाद्य वस्तुएं लगभग 72 प्रतिशत तक महंगी हो चुकी हैं, जबकि दवाइयों की कीमतों में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और बीमार नागरिकों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गई है। ऐसे समय में 2026 के बजट में 62 प्रतिशत तक कर बढ़ाने की चर्चा ने जनता की नाराजगी को और भड़का दिया है, क्योंकि संकट का बोझ सीधे आम नागरिकों पर डालने की तैयारी स्पष्ट दिखती है।
युवा पीढ़ी और ज़ेड जेन: उम्मीदों का टूटना
ईरान की जनसंख्या संरचना में युवाओं की भूमिका निर्णायक है। विशेष रूप से ज़ेड जेन, जो वैश्विक इंटरनेट संस्कृति, सोशल मीडिया और तुलनात्मक स्वतंत्रताओं से परिचित है, वह पुराने धार्मिक-राजनीतिक ढांचे से खुद को असहज महसूस कर रही है। बेरोजगारी, सीमित सामाजिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति पर नियंत्रण और आर्थिक अनिश्चितता ने युवाओं को व्यवस्था से विमुख कर दिया है। यह पीढ़ी केवल रोटी, नौकरी और महंगाई की बात नहीं कर रही, बल्कि पहचान, गरिमा और विकल्पों की मांग कर रही है। इसी कारण विरोध प्रदर्शन अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सत्ता की वैधता और शासन मॉडल पर प्रश्नचिह्न बन चुके हैं।
सड़कों पर उबाल: दमन और राज्य की प्रतिक्रिया
हालिया प्रदर्शनों में गोलीबारी, आगजनी और कठोर सुरक्षा कार्रवाई यह दर्शाती है कि राज्य संवाद के बजाय नियंत्रण की नीति अपना रहा है। 544 से अधिक मौतें इस बात का प्रमाण हैं कि स्थिति सामान्य विरोध प्रदर्शन से बहुत आगे निकल चुकी है। इंटरनेट प्रतिबंध, कर्फ्यू, गिरफ्तारी और दमन ने कई क्षेत्रों में अस्थिरता को कम करने के बजाय और बढ़ाया है। इतिहास गवाह है कि जब आर्थिक संकट और राजनीतिक असंतोष एक साथ आते हैं, तो केवल दमन से स्थिति को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
क्राउन प्रिंस रज़ा पहलवी: इतिहास की परछाई या भविष्य का विकल्प?
इस उथल-पुथल के बीच क्राउन प्रिंस रज़ा पहलवी का नाम फिर से राजनीतिक विमर्श में उभर रहा है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहलवी राजवंश को इतिहास मान लिया गया था, लेकिन मौजूदा संकट ने उसे फिर से चर्चा में ला खड़ा किया है। रज़ा पहलवी स्वयं को लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और मानवाधिकार-आधारित ईरान के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि ईरान के भीतर उनकी स्वीकार्यता सीमित और विभाजित है, फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जब वर्तमान व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है, तो समाज इतिहास के बंद समझे गए अध्यायों की ओर भी देखने लगता है।
पश्चिम, अमेरिका और मानवाधिकार विमर्श

ईरान में महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक बंदियों और दमनात्मक कानूनों को लेकर पश्चिमी देशों की आलोचना लंबे समय से जारी है। हालिया हिंसा और मौतों ने इस आलोचना को और तेज किया है। वहीं दूसरी ओर, प्रतिबंधों को लेकर यह बहस भी गहराती जा रही है कि उनका वास्तविक बोझ सत्ता पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर पड़ता है। यह नैतिक और व्यावहारिक द्वंद्व वैश्विक मंच पर ईरान को लेकर दृष्टिकोण को और जटिल बनाता है।तेहरान का पक्ष: बाहरी साजिश बनाम आंतरिक संकट ईरानी सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि आंतरिक अस्थिरता के पीछे विदेशी ताकतों की भूमिका है। हालांकि यह तर्क आंशिक रूप से राजनीतिक रणनीति हो सकता है, लेकिन आर्थिक आंकड़े, महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष स्वयं अपनी कहानी कहते हैं। केवल बाहरी साजिश का नैरेटिव जनता की पीड़ा को लंबे समय तक ढक नहीं सकता।
भारत में ईरानी दूतावास का संदेश और खामेनेई का बयान
भारत में ईरान के दूतावास द्वारा सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई का वीडियो साझा किया जाना कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह संदेश देता है कि ईरान स्वयं को घिरा हुआ मानता है, लेकिन झुका हुआ नहीं। यह बयान न केवल घरेलू समर्थकों के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी संकेत है कि ईरान दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है।
भारत और वैश्विक संतुलन
भारत के लिए ईरान का संकट एक संवेदनशील कूटनीतिक चुनौती है। ऐतिहासिक, ऊर्जा और रणनीतिक संबंधों के बावजूद भारत संतुलित रुख अपनाता रहा है। यह रुख दर्शाता है कि भारत किसी एक पक्ष में खुलकर खड़ा होने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता और दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेष विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि ईरान आज इतिहास के एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां आर्थिक पतन, सामाजिक असंतोष, युवा पीढ़ी की बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय दबाव एक साथ टकरा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि ईरान दबाव में है या नहीं, बल्कि यह है कि वह इस दबाव से निकलने का रास्ता संवाद, सुधार और समावेशन से खोजेगा या नियंत्रण और टकराव से। इतिहास गवाह है कि कोई भी व्यवस्था केवल शक्ति के बल पर लंबे समय तक नहीं टिकती। ईरान का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह परिवर्तन को खतरे के रूप में देखता है या अवसर के रूप में।
✍️ संकलनकर्ता व लेखक*क़ानूनी विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र







