आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’……. श्री गुरु शंकराचार्य पदाश्रित. (पानीपत)

जब प्रलय आती है तो अपने पीछे विध्वंस, पीड़ा और कभी न भरने वाली स्मृतियां छोड़ जाती है। वर्ष 1947 का विभाजन भी भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की ऐसी ही त्रासदी था। लाखों परिवार उजड़े, असंख्य लोगों ने अपनों को खोया और अपनी जन्मभूमि छोड़कर अनजान स्थानों पर नए सिरे से जीवन आरंभ करना पड़ा। हमारे पूर्वजों पर जो बीती, उसका स्मरण मन को आज भी व्यथित कर देता है।
भारत अपनी स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूरे कर 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इतिहास का एक भी क्षण लौटाया नहीं जा सकता। अतीत से हम केवल यह शिक्षा ले सकते हैं कि वैसा दुखद घटनाक्रम दोबारा न हो। प्रश्न यह है कि हम स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी बनाएंगे या उन्हें वर्तमान समाज में वैमनस्य पैदा करने का माध्यम बनने देंगे?
छह पीढ़ियों में बदल गया बहुत कुछ
विभाजन के समय जन्मे अनेक लोगों ने अपने जीवन में पांचवीं-छठी पीढ़ी तक को देख लिया है। विस्थापन का दर्द झेलने वाले अधिकांश परिवार आज नए शहरों और गांवों में अपनी गहरी जड़ें जमा चुके हैं। उन्होंने कठिन परिश्रम से घर बनाए, बच्चों को शिक्षित किया, व्यवसाय खड़े किए और देश की प्रगति में उल्लेखनीय योगदान दिया।
विभाजन की पीड़ा अपने भीतर संजोए बुजुर्गों में आज भी अपनी जन्मभूमि देखने की स्वाभाविक इच्छा हो सकती है। वे उन गलियों, खेतों, घरों और चौपालों को एक बार फिर देखना चाहते हैं, जिनसे बचपन की स्मृतियां जुड़ी हैं। परंतु उनका वर्तमान जीवन, परिवार और भविष्य अब भारत की उसी धरती से जुड़ा है, जहां उन्होंने संघर्ष के बाद स्वयं को पुनः स्थापित किया।
उजड़ने से पुनर्निर्माण तक
| विभाजन के समय | आज की स्थिति |
|---|---|
| घर-बार और संपत्ति छूटी | नई पीढ़ियों ने घर तथा कारोबार स्थापित किए |
| शिक्षा और रोजगार का संकट | शिक्षा, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति |
| शरणार्थी शिविरों में जीवन | व्यवस्थित बस्तियां, प्रतिष्ठित संस्थान और समृद्ध समाज |
| असुरक्षा और अनिश्चितता | लोकतांत्रिक अधिकार तथा सुरक्षित नागरिक जीवन |
| अपनों से बिछड़ने की पीड़ा | नई पीढ़ियों का सामाजिक और राष्ट्रीय एकीकरण |
विस्थापित परिवारों ने अपने पुरुषार्थ से यह प्रमाणित कर दिया कि मनुष्य की संकल्पशक्ति किसी भी विपत्ति से बड़ी होती है। उन्होंने केवल अपना जीवन ही नहीं संवारा, बल्कि जिन क्षेत्रों में बसे, उनके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शोक कब तक—और शिक्षा कब तक?
सनातन परंपरा हमें पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना सिखाती है। हम श्राद्ध, तर्पण और स्मरण के माध्यम से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। किंतु हमारी परंपरा यह भी सिखाती है कि शोक में हमेशा डूबे रहना जीवन का उद्देश्य नहीं है। पूर्वजों का सच्चा सम्मान यही है कि उनकी संततियां सुरक्षित, शिक्षित, समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन जिएं।
नीति-वचन है—
गतशोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥
अर्थात बीते हुए दुःख में निरंतर डूबे रहना और भविष्य की अनावश्यक चिंता करना उचित नहीं। विवेकशील मनुष्य वर्तमान को समझते हुए अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।
स्मरण हो, लेकिन राजनीतिक इस्तेमाल नहीं
विभाजन में दिवंगत हुए लोगों का सम्मानपूर्वक स्मरण अवश्य होना चाहिए। नई पीढ़ी को यह भी बताया जाना चाहिए कि धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक स्वार्थ और सामाजिक अविश्वास किस प्रकार पूरे समाज को विनाश की ओर ले जा सकते हैं।
लेकिन किसी त्रासदी की स्मृति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। यदि अतीत की पीड़ा को बार-बार राजनीतिक लाभ के लिए उभारा जाएगा, तो नई पीढ़ी इतिहास से शिक्षा लेने के स्थान पर विरासत में घृणा प्राप्त करेगी।
आज के बच्चों को कई बार अपने परदादा का नाम तक ज्ञात नहीं होता। ऐसे में लगभग आठ दशक पुराने घावों को राजनीतिक भाषा में जीवित रखने के बजाय उन्हें इतिहास की सच्चाई, मानवीय संवेदना और सामाजिक सद्भाव के साथ समझाना अधिक उचित होगा।
विभाजन समाधान नहीं, विवशता था
विभाजन कभी उत्सव का विषय नहीं हो सकता। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमारी संस्कृति की आत्मा है। संसार को एक परिवार मानने वाला भारतीय चिंतन मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी करने का समर्थन नहीं करता। फिर भी इतिहास में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, जब समाज को अनचाहे और अत्यंत पीड़ादायक निर्णय स्वीकार करने पड़ते हैं।
आज आवश्यकता विभाजन को उचित या अनुचित सिद्ध करने की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझने की है, जिन्होंने लाखों लोगों को अपना घर छोड़ने पर विवश किया। इतिहास से सबसे बड़ी सीख यही है कि धार्मिक उन्माद, कट्टरता और सत्ता की स्वार्थपूर्ण राजनीति को कभी इतना प्रबल न होने दिया जाए कि मानवता फिर किसी विभाजन की कीमत चुकाए।
अतीत को न भूलें, लेकिन भविष्य को बंधक भी न बनाएं
समय ने बहुत से घाव भर दिए हैं। विस्थापित परिवारों की नई पीढ़ियां आज आत्मविश्वास के साथ देश के विकास में भागीदारी कर रही हैं। उन्हें विरासत में केवल पीड़ा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का साहस, परिश्रम और पुनर्निर्माण का संकल्प भी मिला है।
आइए, विभाजन में दिवंगत हुए सभी निर्दोष लोगों को श्रद्धापूर्वक नमन करें। उनकी स्मृति को प्रतिशोध का आधार नहीं, बल्कि शांति और सद्भाव का संकल्प बनाएं।
अतीत को स्मरण कर उससे सीखें, वर्तमान में शांति से जिएं और भविष्य को उज्ज्वल बनाएं—यही विभाजन की त्रासदी झेलने वाले पूर्वजों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।








