गांधी की प्रासंगिकता: तस्वीरों से आचरण तक

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सत्य, अहिंसा, ग्राम स्वराज और स्वदेशी को सार्वजनिक जीवन में स्थान देना ही बापू के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि

डॉ. विनोद बब्बर

महात्मा गांधी विश्व के उन व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जिनके विचारों का प्रभाव देश और काल की सीमाओं से परे दिखाई देता है। अनेक देशों में उनकी प्रतिमाएँ, उनके नाम पर संस्थान और मार्ग उनकी वैश्विक स्वीकार्यता के प्रमाण हैं। जिस ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध उन्होंने लंबा संघर्ष किया, उसी ब्रिटेन की संसद के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित होना उनके नैतिक प्रभाव को दर्शाता है। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के साथ गांधी का नाम इस तरह जुड़ा है कि इन मूल्यों की चर्चा उनके बिना अधूरी लगती है।

लेकिन गांधी की व्यापक स्वीकार्यता के बीच एक प्रश्न बार-बार उठता है—हम उनके विचारों को अपने जीवन में कितना स्थान देते हैं? क्या दो अक्टूबर और तीस जनवरी को उनका स्मरण करना, प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना और राजघाट पर पुष्प अर्पित करना पर्याप्त है? अथवा गांधी के प्रति सच्ची श्रद्धा की कसौटी हमारे निर्णय, नीतियाँ और व्यवहार होने चाहिए?

स्मरण और व्यवहार का अंतर

गांधी को अलग-अलग विचारधाराओं के लोग याद करते हैं। उनके समर्थक ही नहीं, उनसे असहमति रखने वाले भी अनेक अवसरों पर उनके विचारों का सहारा लेते हैं। लोकतंत्र में ऐसी असहमति स्वाभाविक है। समस्या तब पैदा होती है, जब गांधी का नाम सार्वजनिक सम्मान पाने का साधन बन जाए और उनके विचार व्यवहार से अनुपस्थित रहें।

मुद्रा पर गांधी का चित्र होना अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन आर्थिक नीतियों में कमजोर व्यक्ति की चिंता कितनी है? सार्वजनिक मंचों से सत्य और अहिंसा की बात होती है, लेकिन राजनीतिक संवाद में संयम कितना बचा है? स्वच्छता का संदेश दिया जाता है, लेकिन अपने आसपास सफाई रखने और सफाईकर्मियों के सम्मान की जिम्मेदारी कितने लोग निभाते हैं?

गांधी की प्रासंगिकता इन्हीं प्रश्नों में छिपी है। उनका स्मरण हमें आत्मपरीक्षण की ओर ले जाना चाहिए।

लेखक और संपादक गांधी

गांधी केवल स्वतंत्रता आंदोलन के नेता नहीं थे। वे लेखक, संपादक और निरंतर संवाद करने वाले विचारक भी थे। उन्होंने लेखों, पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से अपने समय के राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक प्रश्नों पर विचार रखा। उनके लिए पत्रकारिता जनमत निर्माण के साथ सार्वजनिक जिम्मेदारी का माध्यम थी।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति पर उन्होंने 1896 में राजकोट में ‘ग्रीन पैम्फ्लेट’ तैयार किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘हिंद स्वराज’ आधुनिक सभ्यता, स्वराज और विकास की दिशा पर प्रश्न उठाती है। उनके लेखन की विशेषता यह थी कि वे स्वतंत्रता को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रखते थे। वे व्यक्ति और समाज के भीतर भी परिवर्तन चाहते थे।

आज सूचना की अधिकता और संवाद में बढ़ती कटुता के बीच गांधी का यह पक्ष विशेष महत्व रखता है। सार्वजनिक जीवन में तथ्य, नैतिक साहस और अपनी भूल स्वीकार करने की क्षमता की आवश्यकता पहले से कम नहीं हुई है।

गांवों के बिना कैसा विकास?

गांधी के चिंतन में गांव केंद्रीय स्थान रखते थे। ग्राम स्वराज का उनका विचार स्थानीय आत्मनिर्भरता, श्रम के सम्मान और निर्णयों में लोगों की भागीदारी से जुड़ा था। वे चाहते थे कि गांव अपनी आवश्यकताओं की अधिकाधिक वस्तुएँ स्वयं तैयार करें और स्थानीय संसाधनों से सम्मानजनक आजीविका विकसित हो।

तेल, गुड़, शहद, हस्तनिर्मित कागज, चटाइयाँ और अन्य ग्रामोद्योग उनके लिए आर्थिक गतिविधियों के साथ आत्मनिर्भर जीवन के आधार थे। उनका आग्रह था कि ग्रामीण समाज को ऐसी व्यवस्था मिले, जिसमें वह अपनी क्षमताओं के बल पर आगे बढ़ सके।

स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक विकास और ग्रामीण उन्नति के अनेक प्रयास हुए। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि गांवों में टिकाऊ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय उद्यम की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं बन सकी? रोजगार की तलाश में होने वाला विवश पलायन गांव और शहर, दोनों के सामने चुनौतियाँ खड़ी करता है।

आज गांधी के ग्राम स्वराज को आधुनिक परिस्थितियों में समझने की जरूरत है। कृषि प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, स्थानीय उद्यम, डिजिटल सुविधाएँ और बाजार तक सीधी पहुँच ग्रामीण आत्मनिर्भरता को नया आधार दे सकती हैं। विकास की सफलता का आकलन इस बात से भी होना चाहिए कि गांव में रहने वाला व्यक्ति कितनी गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन बिता सकता है।

नशामुक्ति और राजस्व का प्रश्न

गांधी नशामुक्त समाज के पक्षधर थे। वे शराब को व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन के लिए भी हानिकारक मानते थे। आज भी नशे से प्रभावित परिवारों की पीड़ा इस विषय को गंभीर बनाती है।

सरकारों के सामने प्रश्न है कि नशामुक्ति के संदेश और शराब से मिलने वाले राजस्व के बीच उनकी प्राथमिकता क्या है? केवल प्रचार अभियान पर्याप्त नहीं हैं। नशे की रोकथाम, उपचार, पुनर्वास और परिवारों को सहायता देने की व्यवस्था भी चाहिए।

गांधी की दृष्टि से नीति का मूल्यांकन उसके मानवीय परिणामों के आधार पर होना चाहिए। सरकारी आय का हिसाब लगाते समय परिवारों पर पड़ने वाली सामाजिक और आर्थिक कीमत को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मातृभाषा और शिक्षा की गरिमा

गांधी मातृभाषा में शिक्षा के समर्थक थे। उनका मानना था कि अपनी भाषा में सीखने से बच्चे का बौद्धिक विकास और समाज से उसका संबंध मजबूत होता है। आज भी शिक्षा में भाषा और अवसर की समानता का प्रश्न महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में जहाँ संभव हो, कम से कम पाँचवीं कक्षा तक और प्राथमिकता के आधार पर आठवीं तथा उससे आगे भी घर की भाषा, मातृभाषा, स्थानीय अथवा क्षेत्रीय भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाने की अनुशंसा है। इसे प्रत्येक विद्यालय पर लागू पूर्ण अनिवार्यता बताना उचित नहीं होगा।

अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भाषा का ज्ञान उपयोगी है। चिंता तब होती है, जब किसी भाषा को बुद्धिमत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा का एकमात्र पैमाना बना दिया जाए। अपनी भाषा में पढ़ने वाला बच्चा अवसरों से वंचित न हो और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल अधिक शुल्क देने वाले परिवारों तक सीमित न रहे—यह हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

मातृभाषा को सम्मान देने के लिए अच्छे शिक्षक, उत्कृष्ट पाठ्यपुस्तकें, वैज्ञानिक साहित्य और उच्च शिक्षा तक उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना आवश्यक है। भाषा के प्रति सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ ज्ञान और अवसर भी जुड़ें।

धर्म के साथ सद्भाव की जिम्मेदारी

गांधी की धार्मिक आस्था गहरी थी। रामनाम उनके जीवन का हिस्सा था। साथ ही वे विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच सद्भाव और परस्पर सम्मान के समर्थक थे। उनकी धार्मिकता का संबंध सत्य, आत्मसंयम, सेवा और नैतिक जिम्मेदारी से था।

धर्मांतरण के लिए सेवा, शिक्षा अथवा सहायता को साधन बनाए जाने पर गांधी ने आलोचनात्मक विचार रखे थे। इन विचारों को उनके व्यापक धार्मिक चिंतन और प्रसंग के साथ समझना चाहिए। किसी पूरे समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा करना गांधी के सद्भाव के संदेश को कमजोर करता है।

आज धर्म के नाम पर बढ़ती कटुता के बीच गांधी का आग्रह हमें संवाद और आत्मसंयम की याद दिलाता है। अपनी आस्था का सम्मान करते हुए दूसरों की आस्था और गरिमा का सम्मान करना सामाजिक शांति की आवश्यक शर्त है।

खादी और स्वदेशी का व्यापक अर्थ

गांधी के लिए खादी स्वदेशी, श्रम और आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक थी। उसका संबंध उन हाथों से था, जिन्हें काम और सम्मान की जरूरत थी। इसलिए खादी की चर्चा करते समय उसके पीछे खड़े कारीगर, बुनकर और ग्रामीण परिवार को भी देखना होगा।

आज स्वदेशी का अर्थ स्थानीय कौशल को बेहतर गुणवत्ता, तकनीक, उचित मूल्य और बाजार उपलब्ध कराने में तलाशना चाहिए। छोटे उत्पादकों की स्थिति सुधरे, श्रमिक को न्यायपूर्ण मेहनताना मिले और उपभोक्ता अपने चुनाव के सामाजिक प्रभाव को समझे—तभी स्वदेशी का विचार जीवन से जुड़ेगा।

इसी तरह गांधी की सादगी आज संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की प्रेरणा देती है। बढ़ते उपभोग और पर्यावरणीय दबाव के दौर में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि हमारी जरूरत और अनावश्यक संग्रह के बीच सीमा कहाँ है।

पुरस्कार से बड़ी विरासत

गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, जबकि 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 में उनका नामांकन हुआ था। इस अनुपस्थिति पर बाद के वर्षों में सार्वजनिक खेद भी व्यक्त किया गया। लेकिन गांधी की ऐतिहासिक भूमिका किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं है। उनका महत्व उस नैतिक शक्ति में है, जिसने अन्याय का प्रतिरोध करने के लिए सत्य और अहिंसा का मार्ग प्रस्तुत किया।

आज गांधी की प्रासंगिकता पर विचार करते समय सबसे कठिन प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा। क्या हम असहमति सुन सकते हैं? क्या सार्वजनिक जीवन में सत्य के लिए असुविधा सह सकते हैं? क्या गांव, श्रमिक, किसान और कमजोर व्यक्ति की गरिमा को अपने निर्णयों में स्थान देते हैं?

गांधी को श्रद्धांजलि तभी अर्थपूर्ण होगी, जब उनके विचार नीतियों और आचरण में दिखाई देंगे। प्रतिमाओं और चित्रों के साथ हमें अपने भीतर भी उनके लिए स्थान बनाना होगा।
Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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