विभाजन विभीषिका यातनाओं की दास्तां, कोई शिलान्यास कार्यक्रम नहीं कि निमंत्रण न मिलने पर रुष्ट हों सांसद : माईकल सैनी

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

पंजाबी समाज के घावों पर मरहम लगाने के बजाय आयोजकों पर नाराजगी जताकर सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने पीड़ा और बढ़ाई

कद्दावर जनप्रतिनिधि को कार्यक्रम की संवेदनशीलता, माहौल और विषय की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए था

गुरुग्राम, 17 अगस्त। सामाजिक कार्यकर्ता माईकल सैनी ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के कार्यक्रम में केंद्रीय राज्यमंत्री एवं गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह द्वारा आयोजकों के प्रति नाराजगी जताए जाने की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि विभाजन विभीषिका यातनाओं, विस्थापन और अपनों को खोने की दर्दनाक दास्तां है, कोई शिलान्यास या उद्घाटन कार्यक्रम नहीं कि औपचारिक निमंत्रण न मिलने पर जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से रुष्ट हो जाए।

माईकल सैनी ने कहा कि विभाजन की त्रासदी को झेलने वाले पंजाबी समुदाय के लिए यह केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की पीड़ा, बलिदान और विस्थापन की स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर था। इसे विभाजन विभीषिका, इतिहास का काला अध्याय अथवा काला दिवस कहा जाए, मूल विषय उस समुदाय के दर्द को सरकार और सर्वसमाज के सामने रखने का है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार विभिन्न समुदाय अपने इतिहास के पीड़ादायक कालखंडों और पलायन की यातनाओं को स्मरण करते हैं, उसी प्रकार पंजाबी समाज भी विभाजन के दौरान झेले गए दंश को याद कर अपनी आने वाली पीढ़ियों को उस त्रासदी से अवगत कराना चाहता है।

दुःख बांटने के बजाय शिकायत करना अनुचित

माईकल सैनी ने कहा कि गुरुग्राम में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पंजाबी समाज के लोग एकत्रित हुए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल ने भी उपस्थित होकर विभाजन पीड़ित परिवारों का दुःख साझा किया तथा उन्हें ढांढस बंधाया।

उन्होंने कहा कि यदि आयोजकों बोधराज सीकरी, स्वामी धर्मदेव और गार्गी कक्कड़ से स्थानीय सांसद को व्यक्तिगत रूप से सूचित करने में कोई चूक हुई भी थी, तो इतने संवेदनशील और शोकपूर्ण अवसर पर इसे सार्वजनिक शिकायत का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए था।

कार्यक्रम की गरिमा के अनुरूप होना चाहिए था आचरण

माईकल सैनी ने कहा कि राव इंद्रजीत सिंह जैसे अनुभवी एवं कद्दावर नेता से अपेक्षा थी कि वे पंजाबी समाज के दुःख में सहभागी बनते। यदि उन्हें निमंत्रण अथवा सूचना को लेकर कोई शिकायत थी, तो उसे बाद में आयोजकों के समक्ष रखा जा सकता था।

उन्होंने कहा, “पंजाबी समुदाय को विभाजन की त्रासदी से मिले घावों पर मरहम लगाने का यह अवसर था, लेकिन सांसद ने सार्वजनिक नाराजगी जताकर उन घावों पर पांव रखने जैसा काम किया।”

सैनी ने कहा कि संवेदनशील अवसरों पर जनप्रतिनिधियों को निजी गिले-शिकवों से ऊपर उठकर स्थान, वातावरण और विषय की गरिमा के अनुरूप आचरण करना चाहिए। विभाजन पीड़ित परिवारों की वेदना को राजनीतिक अथवा व्यक्तिगत शिकायतों की भेंट चढ़ाना उचित नहीं है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!