बाबूलाल नागा

जब कोई सफाईकर्मी जहरीली गैस से भरे सीवर में दम तोड़ता है, तब केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, बल्कि भारतीय संविधान में निहित समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार पर भी एक गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है। आजादी के 79 वर्ष बाद और तकनीकी विकास के इस दौर में यदि किसी नागरिक को जीविका के लिए सीवर में उतरकर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हाथ से मैला ढोने और सीवर की सफाई के दौरान लगातार हो रही मौतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए पांच राज्यों के मुख्य सचिवों को अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि उसके स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसी मौतें क्यों नहीं रुक रही हैं और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट कहा कि यदि न्यायालय के आदेशों के बाद भी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान लोगों की जान जा रही है, तो अब केवल निर्देश नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का समय आ गया है।
यह मामला उस जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें हाथ से मैला ढोने और सीवर की मैनुअल सफाई को पूरी तरह समाप्त करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के साथ सीवर में होने वाली मौतों पर पीड़ित परिवारों को 30 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया था। जनवरी 2025 में अदालत ने छह प्रमुख शहरों में सीवर और सेप्टिक टैंक की मैनुअल सफाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश भी दिया। इसके बावजूद संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में 54 और 2025 में 46 लोगों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई। राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लगातार हो रही ये मौतें बताती हैं कि कानून और जमीनी हकीकत के बीच आज भी गहरी खाई मौजूद है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हाथ से मैला ढोना और सीवर में उतरकर सफाई करना कानूनन प्रतिबंधित है, तो यह काम अब भी क्यों जारी है? क्या नगर निकायों और ठेकेदारों के लिए मानव जीवन से अधिक महत्वपूर्ण लागत बचाना है? क्या मशीनों की उपलब्धता के बावजूद किसी गरीब को जहरीली गैसों से भरे गड्ढे में उतारना आधुनिक भारत की पहचान हो सकती है? और यदि हर बार मौत के बाद मुआवजा ही समाधान है, तो फिर कानून और न्याय का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त घोषित करता है और अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इन प्रावधानों का उद्देश्य केवल कानूनी सुरक्षा देना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहां किसी व्यक्ति की पहचान, जाति या आर्थिक स्थिति उसके जीवन के मूल्य को तय न करे। लेकिन जब सफाईकर्मी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरते हैं और उनकी मौत हो जाती है, तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि संविधान के ये अधिकार कागजों से आगे पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाए हैं।
विडंबना यह भी है कि ‘हाथ से मैला ढोने वालों के नियोजन का प्रतिषेध एवं उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ एक दशक से अधिक समय से लागू है। कानून स्पष्ट है, न्यायालय के निर्देश भी स्पष्ट हैं, तकनीक भी उपलब्ध है, फिर भी यदि मौतें जारी हैं तो यह स्वीकार करना होगा कि समस्या कानून की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और राजनीतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है।
यह भी संयोग नहीं है कि इन मौतों का शिकार प्रायः समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के लोग ही बनते हैं। सदियों पुरानी जातिगत असमानता का बोझ आज भी अनेक परिवार ढो रहे हैं। पुनर्वास योजनाओं, वैकल्पिक रोजगार और कौशल विकास की बातें वर्षों से होती रही हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर सीमित दिखाई देता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सामाजिक न्याय केवल सरकारी दस्तावेजों और भाषणों तक सीमित रह गया है?
हर दुर्घटना के बाद प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। जांच बैठती है, मुआवजे की घोषणा होती है और कुछ दिनों बाद मामला भुला दिया जाता है। लेकिन शायद ही कभी यह तय होता है कि बिना सुरक्षा मानकों के काम कराने वाला अधिकारी कौन था, जिम्मेदार ठेकेदार पर क्या कार्रवाई हुई, और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। जब तक व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी मौतों का सिलसिला रुकना मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन स्थायी समाधान न्यायालय के आदेशों से आगे बढ़कर सरकारों, नगर निकायों और प्रशासन की ठोस कार्रवाई में निहित है। देशभर में सीवर सफाई का पूर्ण मशीनीकरण, आधुनिक उपकरणों का अनिवार्य उपयोग, सफाई कर्मचारियों का प्रभावी पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार, नियमित प्रशिक्षण तथा सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
यह केवल सफाई कर्मचारियों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता की कसौटी है। संविधान की असली ताकत तभी सिद्ध होगी, जब उसके द्वारा प्रदत्त समानता, गरिमा और जीवन का अधिकार समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। हर सीवर मौत हमें यह याद दिलाती है कि संविधान का सपना अभी अधूरा है। यदि भारत वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित लोकतंत्र बनना चाहता है, तो हाथ से मैला ढोने और सीवर में होने वाली मौतों का अंत केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता और सामूहिक संकल्प बनना होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की पहचान उसके सबसे शक्तिशाली नागरिक से नहीं, बल्कि सबसे कमजोर नागरिक की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा से होती है।








