शिवभक्ति, प्रकृति और भारतीय संस्कृति का शुभ  उत्सव है सावन

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दुर्गेश्वर राय

भारतीय पंचांग और जनमानस में सावन का महीना आस्था, उल्लास और प्रकृति के पुनर्जन्म का एक जीवंत कालखंड है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सावन या श्रावण मास की शुरुआत तब होती है जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते हैं और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 22 वें नक्षत्र श्रवण में विराजमान होते हैं। इसी पवित्र नक्षत्र के नाम पर इस महीने का नाम श्रावण पड़ा है। इस दौरान ग्रहों की स्थिति में जल तत्त्व की प्रधानता अत्यधिक हो जाती है। सूर्य और चंद्रमा के विशेष गोचर के कारण पृथ्वी का वायुमंडल नमी और शीतलता से भर जाता है, जिसे ज्योतिष और योग विज्ञान में आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने, ध्यान-साधना और मानसिक शांति के लिए अनुकूल माना गया है।

सनातन परंपरा में सावन की धार्मिक मान्यता और महत्व सीधे तौर पर भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। पौराणिक इतिहास और कथाओं के अनुसार, इसी पवित्र महीने में देवों और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ था। उस मंथन से निकले हलाहल विष को पीकर महादेव ने पूरी सृष्टि की रक्षा की थी। विष के उस तीव्र ताप को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर पवित्र गंगाजल और शीतल जल अर्पित किया था, जिससे जलाभिषेक की शाश्वत परंपरा का जन्म हुआ। यही कारण है कि सावन में शिव उपासना और सोमवार के व्रतों का विशेष महत्व है, जो मनुष्य के भीतर छिपे विकारों को नष्ट कर आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

सावन में प्रकृति और पर्यावरण भी एक सक्रिय साधक की तरह प्रतिभाग करते हैं। ग्रीष्म ऋतु की झुलसाने वाली गर्मी के बाद जब मानसून की पहली फुहारें धरती पर गिरती हैं, तो पूरी प्रकृति हरे रंग की चुनर ओढ़ लेती है। सूखे पेड़-पौधे, नदियाँ और ताल-तलैया नवजीवन से लबालब भर उठते हैं। पर्यावरण का यह उल्लास सीधे तौर पर हमारे सामाजिक सरोकारों से जुड़ जाता है। खेतों में लहलहाती फसलें किसानों के चेहरों पर जहाँ नई उम्मीद और मुस्कान लाती हैं, वहीं गाँवों और कस्बों में पेड़ों पर पड़ने वाले झूले, कजरी और मल्हार के गीत आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का सुंदर ताना-बाना बुनते हैं। यह महीना ऊँच-नीच के भेदों को मिटाकर समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में पिरोने का काम करता है।

भारत की समृद्ध संस्कृति और प्राचीन साहित्य में सावन की चर्चा हर कालखंड में बहुत गहराई से मिलती है। महाकवि कालिदास के मेघदूतम् से लेकर सूरदास, तुलसीदास के पदों और विभिन्न अंचलों के लोकगीतों तक, सावन के बादलों को प्रेम, विरह, शृंगार और ईश्वर से मिलन के जीवंत प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। भारत के विभिन्न हिस्सों में इस महीने को मनाने के तरीके हमारी विविधता में एकता का दर्शन कराते हैं। उत्तर भारत में जहाँ विशाल कांवड़ यात्राएं निकलती हैं, हरियाली तीज और रक्षाबंधन की धूम होती है, वहीं गुजरात और महाराष्ट्र जैसे पश्चिमी राज्यों में श्रावण पूर्णिमा को नारली पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ मछुआरे और आम जन समुद्र देव की पूजा करते हैं। दक्षिण भारत में यद्यपि पंचांग की गणना अमावस्यांत कैलेंडर के कारण तिथियां थोड़ी भिन्न होती हैं, लेकिन वहाँ भी मानसून के आगमन और शिव मंदिरों में विशेष अनुष्ठानों का उत्साह और उमंग बिल्कुल समान होता है।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सावन चातुर्मास का वह अहम समय होता था जब प्राचीन काल में व्यापारिक और सैन्य यात्राएँ रोक दी जाती थीं। संत-महात्मा, विद्वान और यहाँ तक कि राजा-महाराजा भी एक ही स्थान पर रुककर अपना समय धर्म, साहित्य, कला और जनकल्याण के चिंतन में व्यतीत करते थे।

वर्तमान में सावन का यह उत्सव अपने पारंपरिक स्वरूप के साथ-साथ आधुनिकता के रंग में भी पूरी तरह ढल चुका है। आज के समय में लोग मंदिरों में जाकर रुद्राभिषेक तो करते ही हैं, साथ ही शहरी जीवन में तीज मिलन समारोह, डिजाइनर परिधानों के साथ सांस्कृतिक संध्याएं और सोशल मीडिया के माध्यम से भक्ति गीतों का आनंद भी लेते हैं। युवा वर्ग पूरे जोश और ऊर्जा के साथ कांवड़ यात्रा में शामिल होता है, जिसमें अब आधुनिक सुविधाएं, डीजे की धुनें और समाजसेवियों द्वारा लगाए गए विशाल सेवा शिविर भी देखने को मिलते हैं, जो इस प्राचीन पर्व को एक नया सामाजिक विस्तार देते हैं।

इस वर्ष सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से आरंभ होकर 28 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा के साथ संपन्न होगा। इस पावन मास में शिवभक्तों के लिए सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है, जो क्रमशः 3 अगस्त, 10 अगस्त, 17 अगस्त और 24 अगस्त को रखे जाएंगे। व्रतों और त्योहारों की इस सतत श्रृंखला में 9 अगस्त को कामिका एकादशी का व्रत एवं सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को मनेगा जिसमें जलाभिषेक सर्वाधिक पुण्य माना जाता है। इसके पश्चात 15 अगस्त को सुहागिन स्त्रियों का प्रिय पर्व हरियाली तीज मनाया जाएगा, जिसमें वे माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना कर अखंड सौभाग्य की कामना करेंगी। प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान दर्शाने वाला नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त को मनाया जाएगा और 23 अगस्त को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

अंततः 28 अगस्त को भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक रक्षाबंधन के पावन पर्व और श्रावण पूर्णिमा के साथ ही भक्ति, उल्लास और सामाजिक समरसता से भरा यह सावन मास अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा। सावन का यह पूरा कालखंड मनुष्य को यह सिखाता है कि जिस तरह बारिश की बूंदें धरती की तपन बुझाती हैं, उसी तरह ईश्वर की भक्ति और प्रकृति का सान्निध्य मनुष्य के मन की हर पीड़ा को हर कर उसे नवजीवन से भर देता है।

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Author: Bharat Sarathi

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