डा.वेदप्रकाश……. असिस्टेंट प्रोफेसर
किरोड़ीमल कालेज,दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी लगातार भ्रष्टाचार मुक्त भारत हेतु योजनाएं बनाकर देश को भ्रष्टाचार की बीमारी से बाहर निकालना चाहते हैं लेकिन कुछ क्षेत्रों में कुछ लोग भ्रष्टाचार करने की मानसिकता और आदत की गिरफ्त में हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों पर नागरिकों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है क्योंकि स्वस्थ समाज ही विकसित राष्ट्र के संकल्प को साकार कर सकता है। इसके लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में ढांचागत सुधारों एवं आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है किंतु चिंताजनक यह है कि विकसित भारत का संकल्प लेकर बढ़ रहे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को भ्रष्टाचार बीमार कर रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सामान्य व्यक्ति की पहुंच कठिन बनी हुई है। अस्पतालों में तकनीक आधारित पंजीकरण, जांच और इलाज में लापरवाही और इलाज के नाम पर मरीज और परिवार के शोषण का व्यवस्थित तंत्र बन चुका है। अधिकांश सरकारी अस्पतालों और चिकित्सालयों में बदहाली फैली है तो निजी अस्पतालों में लूट का तंत्र। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग सेवा मिशन भूलकर कमीशन में लगे हैं। धनबल के जरिए बड़े-बड़े अस्पताल खड़े होना, पेपर लीक और मोटी रकम देखकर मेडिकल की सीट प्राप्त करना सामान्य होता जा रहा है।
हाल ही में दिल्ली सरकार की सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी में दवाओं व चिकित्सा उपकरणों की खरीद में 650 करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला सामने आया है। शुरुआती जांच में सरकारी अस्पतालों के लिए दवा, चिकित्सा उपकरणों, चादरों, एक्स रे मशीनों और एनेस्थीसिया के आवश्यक उपकरणों की खरीद में भारी अनियमितता का पता चला है। गौरतलब है कि फरवरी 2025 की कैग रिपोर्ट में भी यह सामने आया था कि राजधानी की स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराई हुई हैं। दिल्ली सरकार के अस्पताल और मेडिकल कालेज में डाक्टरों, नर्स और पैरामेडिकल कर्मियों की कमी है। यह भी सामने आया था कि अस्पतालों में दवाओं की खरीद में भी अनियमितता हुई और मरीजों को घटिया दवाएं दी गई। ब्लैकलिस्ट और प्रतिबंधित फर्म से भी दवाएं खरीदी गई। अस्पतालों की लैब व विभागों में उपकरणों व कर्मचरियों की कमी पाई गई। प्रश्न यह है कि वर्ष 2025 की कैग रिपोर्ट पर क्या कार्रवाही की गई? हाल ही का दवा घोटाला और समय-समय पर उजागर होने वाले ऐसे ही अनेक घोटाले यह स्पष्ट करते हैं कि भ्रष्टाचार के तंत्र की कई परते हैं। एक तंत्र भ्रष्टाचार को उजागर करता है तो दूसरा तंत्र भ्रष्टाचार के जरिए उस पर पर्दा डाल देता है और यह सिलसिला वर्षों से जारी है।
विगत में नकली और जहरीले कफ सिरप से मध्यप्रदेश और राजस्थान के कई हिस्सों में दर्जनों बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है। क्या राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे हजारों नर्सिंग होम स्वास्थ्य विभाग के मानक और नियमों से चल रहे हैं? क्या यह स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए चिंता एवं जांच का विषय नहीं होना चाहिए?
जनवरी 2025 में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन व स्टेट ड्रग अथारिटी की ओर से जारी ड्रग अलर्ट में देशभर की 135 दवाओं के सैंपल गुणवत्ता में खरे नहीं पाए गए। इनमें सर्दी, खांसी, जुकाम, एलर्जी व दर्द निवारण के लिए प्रयोग होने वाली दवाएं शामिल हैं, जिनका उत्पादन हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, बंगाल, पंजाब, मध्यप्रदेश, कर्नाटक,असम व हरियाणा के उद्योगों में होता है। इसी प्रकार मार्च 2025 में 145 दवाएं गुणवत्ता की कसौटी पर खड़ी नहीं उतरी। इनमें उच्च रक्तचाप, एलर्जी व संक्रमण जैसी बीमारियों के उपचार की दवाएं शामिल थी। नवंबर 2025 में छपे एक समाचार से भी यह सामने आया कि देशभर में निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं के खिलाफ जारी अभियान के अंतर्गत 111 सैंपल गुणवत्ता के मानक पर खरे नहीं उतरे और कुछ सैंपल नकली भी मिले। क्या दोषी लोगों व कंपनियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाही की गई?
विडंबना यह है कि हृदय रोग और कैंसर जैसी घातक बीमारियों के इलाज में प्रयुक्त होने वाली दवाइयां और उपकरण भी नकली अथवा घटिया बेचे जा रहे हैं। बीमार व्यक्ति इन्हें जीवन के लिए आवश्यक समझकर खरीदता है। इनका असर न होने पर फिर वह लगातार अस्पतालों के चक्कर लगाता है और फिर नई-नई दवाइयों और डाक्टरों के चुंगल में फंसता चला जाता है। जिन पर उसका जीवन बचाने का जिम्मा है वे ही उसके जीवन से खिलवाड़ करते हैं. फिर उसके जीवन की रक्षा कौन करेगा अथवा उसे सही स्वास्थ्य सुविधाएं कौन मुहैया करवाएगा?
विगत दिनों छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कारपोरेशन लिमिटेड घोटाले में भी यह सामने आया कि दवा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए 305 करोड़ रुपए की दवाएं उधारी में खरीदी गई थी। इसी प्रकार सैकड़ों करोड़ के रिएजेंट और उपकरण भी बिना स्वीकृति के खरीदे गए थे। चिंताजनक यह भी है कि देश में डायबिटीज, हृदय रोग व कैंसर जैसी अनेक बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। जनसंख्या के अनुपात में स्वास्थ्य केंद्रों एवं डाक्टरों की भारी कमी है। कहीं पर डाक्टर उपलब्ध हैं तो जांच- उपकरण अथवा तकनीक उपलब्ध नहीं है और कहीं तकनीक उपलब्ध है तो डाक्टरों की कमी है। क्या ऐसे में स्वस्थ भारत का संकल्प अधूरा नहीं है?
स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों में डाक्टर और कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आ रही है। हाल ही के दवा घोटाले में 10 डाक्टरों समेत 45 स्वास्थ्य कर्मियों को नोटिस जारी किया गया है और दिल्ली की स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डा. वत्सला अग्रवाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। सामान्यतः अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों में दो-चार दिन जांच के समाचार आते हैं। दो-चार लोगों का निलंबन अथवा स्थानांतरण किया जाता है और फिर मामला लगभग समाप्त हो जाता है। यदि पूर्व में हुए भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के लिए दोषियों को कठोर दंड दिया जाता तो आगे भ्रष्टाचार करने वालों के हौसले खत्म होते। स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार विषयक जीरो टालरेंस और कठोर दंड का प्रविधान कब लागू होगा?
स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता प्रत्येक नागरिक का संविधान सम्मत अधिकार है। राज्य और केंद्र मिलकर यदि इस दिशा में समुचित योजना बनाकर आगे बढ़ेंगे तो विकसित भारत की राह में स्वस्थ नागरिक अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकेगा। आज आवश्यकता है छोटी-छोटी बस्तियों में अवैध रूप से चल रहे चिकित्सालय और नर्सिंग होम्स पर लगाम कसी जाए। उनके सुरक्षा ऑडिट, उनके डाक्टरों, उपकरणों और दवाइयों की समुचित रूप में समय-समय पर जांच हो। उनके पंजीकरण सुनिश्चित किए जाएं ताकि ऐसे डॉक्टर और अस्पताल लोगों के जीवन से खिलवाड़ न कर सकें।








