गुरुग्राम का SIR कार्यक्रम या कांग्रेस की गुटबंदी का शक्ति प्रदर्शन?

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“SIR कार्यशाला की आड़ में शक्ति प्रदर्शन की चर्चा, प्रदेश अध्यक्ष की गैरमौजूदगी से गहराए गुटबंदी के सवाल”

“हुड्डा की मौजूदगी, राव नरेंद्र की गैरहाजिरी ने बढ़ाए सियासी कयास”

“संगठनात्मक प्रशिक्षण या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन? कांग्रेस में उठे कई सवाल”

गुरुग्राम : हरियाणा कांग्रेस में एक बार फिर संगठनात्मक एकता पर सवाल उठने लगे हैं। गुरुग्राम के बादशाहपुर स्थित एक निजी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यशाला को लेकर पार्टी के भीतर ही कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। आधिकारिक तौर पर इसे मतदाता सूची पुनरीक्षण और बूथ स्तर के प्रशिक्षण का कार्यक्रम बताया गया, लेकिन कांग्रेस के कई असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का दावा है कि यह आयोजन संगठनात्मक प्रशिक्षण से अधिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बन गया।

कार्यकर्ताओं के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस SIR अभियान की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी, उसके काफी समय बाद इतनी बड़ी कार्यशाला आयोजित करने की जरूरत आखिर क्यों महसूस हुई? उनका कहना है कि यदि उद्देश्य वास्तव में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना था, तो यह कार्यक्रम अभियान शुरू होने से पहले आयोजित किया जाना चाहिए था, ताकि उसका व्यावहारिक लाभ मिल सके।

कांग्रेस कार्यालय की बजाय निजी स्थल क्यों?

पार्टी के भीतर चर्चा इस बात की भी है कि गुरुग्राम में कांग्रेस का अपना कार्यालय कमान सराय में मौजूद होने के बावजूद कार्यक्रम को बादशाहपुर के निजी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित किया गया। कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि यह पूरी तरह संगठनात्मक बैठक होती तो उसका स्वाभाविक स्थान पार्टी कार्यालय होना चाहिए था।

क्या उद्देश्य केवल दो नेताओं का राजनीतिक कद बढ़ाना था?

नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जिला ग्रामीण अध्यक्ष वर्धन यादव और कार्यकारी अध्यक्ष जितेंद्र भारद्वाज के संगठनात्मक प्रभाव को प्रदर्शित करना था। उनके अनुसार मंच पर मौजूद नेताओं की सूची भी इसी ओर संकेत करती है।

कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मंत्री सुखबीर कटारिया, कार्यकारी अध्यक्ष जितेंद्र भारद्वाज, महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष पर्ल चौधरी, जिला अध्यक्ष पंकज डावर सहित अनेक वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। लेकिन सबसे अधिक चर्चा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र की अनुपस्थिति को लेकर हुई।

क्या बढ़ रही हैं हुड्डा और राव नरेंद्र के बीच दूरियां?

राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ समय से यह चर्चा लगातार सुनाई दे रही है कि प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच राजनीतिक समन्वय पहले जैसा नहीं रहा।

कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का दावा है कि प्रदेश अध्यक्ष की चौधरी बीरेंद्र सिंह के साथ बढ़ती राजनीतिक निकटता और राहुल गांधी के हरियाणा दौरे के बाद दोनों शीर्ष नेताओं के बीच दूरी महसूस की जाने लगी है। हालांकि इस विषय पर कांग्रेस नेतृत्व की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की गई है।

इसी कारण गुरुग्राम का यह कार्यक्रम भी राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि यह पूरी तरह संगठनात्मक कार्यक्रम होता तो प्रदेश अध्यक्ष की मौजूदगी स्वाभाविक मानी जाती।

क्या संदेश गया कार्यकर्ताओं के बीच?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े दल में शीर्ष नेतृत्व की साझा उपस्थिति संगठनात्मक एकता का संदेश देती है। इसके विपरीत जब एक बड़े कार्यक्रम में अधिकांश वरिष्ठ नेता उपस्थित हों लेकिन प्रदेश अध्यक्ष न हों, तो राजनीतिक अटकलों को बल मिलना स्वाभाविक है।

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इस कार्यक्रम के बाद कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा और तेज हो गई है कि हरियाणा कांग्रेस में अलग-अलग शक्ति केंद्र सक्रिय हैं और संगठन अभी भी पूरी तरह एकजुट दिखाई नहीं देता।

ब्लॉक अध्यक्षों की मुलाकात ने भी बढ़ाई चर्चाएं

इसी बीच फर्रुखनगर ब्लॉक अध्यक्ष सुनील यादव और सोहना ब्लॉक अध्यक्ष शैलेश खटाना द्वारा प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र से अलग मुलाकात को भी राजनीतिक पर्यवेक्षक इसी घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह मुलाकात संगठन के भीतर संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में भी देखी जा रही है, हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया है।

आगामी चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने चुनौती

हरियाणा विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं। ऐसे समय में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा का मुकाबला करना नहीं बल्कि अपने संगठन में एकजुटता का स्पष्ट संदेश देना भी होगी।

गुरुग्राम का SIR कार्यक्रम संगठनात्मक प्रशिक्षण से अधिक राजनीतिक संदेश छोड़ गया। अब देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इन चर्चाओं को केवल अफवाह मानकर छोड़ देता है या संगठन के भीतर मौजूद असंतोष को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण यह संदेश भी होता है कि पार्टी का नेतृत्व एक मंच पर और एक दिशा में खड़ा दिखाई दे।

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Author: Bharat Sarathi

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