जब पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं, तो फिर भारतीय होने का सबूत क्या है?

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-सुरेश गोयल धूप वाला ….. पूर्व जिला महामंत्री भाजपा जिला हिसार 

हाल ही में समाचार पत्रों में प्रकाशित एक समाचार ने देश के करोड़ों नागरिकों के मन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया। समाचार के अनुसार विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट भारत की नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं है, बल्कि यह मुख्यतः विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला एक यात्रा दस्तावेज है। यदि ऐसा है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि आखिर एक सामान्य भारतीय अपने आपको भारत का वास्तविक नागरिक किस आधार पर सिद्ध करे?

वर्तमान समय में किसी व्यक्ति के पास आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वरिष्ठ नागरिक पहचान पत्र, राशन कार्ड अथवा अन्य सरकारी पहचान पत्र हो सकते हैं। इन सभी दस्तावेजों का अपना-अपना महत्व है, किंतु प्रत्येक का उपयोग एक निश्चित उद्देश्य तक ही सीमित है। कोई बैंकिंग कार्य के लिए आवश्यक है, कोई मतदान के लिए, तो कोई वाहन चलाने की अनुमति का प्रमाण है। यदि इन सभी के बावजूद किसी नागरिक की पहचान या नागरिकता पर प्रश्नचिह्न लग जाए, तो यह चिंता का विषय अवश्य है।

आज तकनीक ने जितनी सुविधाएँ दी हैं, उतनी ही चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। आधुनिक सॉफ्टवेयर और डिजिटल माध्यमों से अनेक प्रकार के फर्जी पहचान पत्र तैयार किए जाने के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में केवल कागजी दस्तावेजों पर निर्भर रहना भविष्य की दृष्टि से पर्याप्त नहीं माना जा सकता। देश की आंतरिक सुरक्षा, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक अधिक सुदृढ़ एवं विश्वसनीय पहचान व्यवस्था विकसित करना समय की आवश्यकता है।

इस दिशा में आधार एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ है। इसमें व्यक्ति की बायोमेट्रिक जानकारी दर्ज रहती है, जिससे उसकी पहचान अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित बनती है। किंतु आवश्यकता इस बात की है कि आधार प्रणाली को और अधिक व्यापक, पारदर्शी तथा त्रुटिरहित बनाया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की जालसाजी या फर्जीवाड़े की संभावना लगभग समाप्त हो सके।

एक प्रभावी व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक की पहचान एकीकृत डिजिटल प्रणाली से जुड़ी होनी चाहिए। आधार के साथ उसका सत्यापित मोबाइल नंबर, पैन कार्ड, बैंक खाता, ईमेल पता, स्थायी एवं वर्तमान पता, रक्त समूह, रोजगार या संस्थान का प्रमाण तथा आवश्यक होने पर स्थानीय पुलिस द्वारा सत्यापित पहचान भी सुरक्षित रूप से दर्ज हो सकती है। इससे न केवल सरकारी सेवाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचेगा, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों को भी आवश्यक जानकारी समय पर उपलब्ध हो सकेगी।

हालाँकि इस प्रकार की व्यवस्था बनाते समय नागरिकों की निजता (प्राइवेसी) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी पूरा सम्मान होना चाहिए। किसी भी डिजिटल पहचान प्रणाली का उद्देश्य नागरिकों की निगरानी करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक सुरक्षित, सुविधाजनक और प्रमाणिक पहचान उपलब्ध कराना होना चाहिए। इसलिए इस प्रकार के किसी भी तंत्र में सशक्त डेटा सुरक्षा कानून और गोपनीयता के उच्च मानकों का पालन अनिवार्य होना चाहिए।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। ऐसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी पहचान और नागरिकता किसी भ्रम या विवाद का विषय नहीं बन सकती। सरकार, प्रशासन और नीति-निर्माताओं को इस दिशा में स्पष्ट और व्यापक नीति बनानी चाहिए, जिससे भविष्य में नागरिकों के मन में इस प्रकार के प्रश्न उत्पन्न ही न हों।

नागरिकता केवल एक कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि व्यक्ति के अधिकारों, कर्तव्यों और राष्ट्रीय अस्मिता का आधार है। इसलिए यह आवश्यक है कि देश में ऐसी सुदृढ़, सुरक्षित और सर्वमान्य पहचान प्रणाली विकसित की जाए, जिस पर सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन और सबसे बढ़कर देश का प्रत्येक नागरिक पूर्ण विश्वास कर सके। तभी प्रत्येक भारतीय पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कह सकेगा कि उसकी भारतीय नागरिकता का प्रमाण निर्विवाद, सुरक्षित और सर्वस्वीकृत है।

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Author: Bharat Sarathi

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