महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम को मिली कानूनी, आर्थिक और सामाजिक मान्यता
महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक न्यायिक पहल
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

भारतीय न्यायपालिका ने 11 जून 2026 को एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए गृहिणियों के अवैतनिक घरेलू श्रम को कानूनी, आर्थिक और सामाजिक मान्यता प्रदान की है। शिशुपाल @ शिशराम बनाम सुरजीत एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणियां केवल घर संभालने वाली महिलाएं नहीं, बल्कि “नेशन बिल्डर” (राष्ट्र निर्माता) हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की सेवा, भोजन व्यवस्था और पारिवारिक प्रबंधन जैसे कार्यों का महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य है। न्यायालय ने कहा कि यदि यही सेवाएं बाजार से ली जाएं तो इनके लिए अलग-अलग पेशेवरों को भुगतान करना पड़ेगा।

फैसले में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए गृहिणी की काल्पनिक न्यूनतम मासिक आय 30,000 रुपये मानने का सिद्धांत निर्धारित किया गया। साथ ही, “घरेलू देखभाल की हानि” (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की एक स्वतंत्र श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गृहिणी को केवल “आश्रित” मानना उचित नहीं है, क्योंकि वास्तव में पूरा परिवार उसके श्रम और देखभाल पर निर्भर रहता है। न्यायालय ने माना कि महिलाओं का अवैतनिक घरेलू श्रम भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की अदृश्य लेकिन मजबूत नींव है।
यह फैसला केवल एक मुआवजा विवाद का समाधान नहीं, बल्कि महिलाओं के घरेलू कार्य को सम्मान और मान्यता देने की दिशा में बड़ा कदम है। भविष्य में यह निर्णय महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा, भरण-पोषण और लैंगिक समानता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ बन सकता है। गृहिणियों को राष्ट्र निर्माण की साझेदार के रूप में स्थापित करने वाला यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाएगा।








