विश्व पर्यावरण दिवस विशेष (5 जून) : कैसी विकास यात्रा, जो हरियाणा की जीवनरेखा को ही निगल जाए?

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गुरुग्राम : हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े संकल्प लिए जाते हैं। सरकारी मंचों पर पौधारोपण के कार्यक्रम होते हैं, उद्योगपति अपनी ‘ग्रीन रिपोर्ट’ जारी करते हैं और विकास की नई योजनाओं को पर्यावरण हितैषी बताकर प्रचारित किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित हो रहा है, या फिर हरियाणा जैसे राज्यों में विकास के नाम पर प्रकृति की बुनियाद ही कमजोर की जा रही है?

हरियाणा आज देश के सबसे तेजी से विकसित हो रहे राज्यों में गिना जाता है। एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक कॉरिडोर, रियल एस्टेट परियोजनाएं, स्मार्ट सिटी और नए औद्योगिक क्षेत्र विकास के प्रतीक माने जा रहे हैं। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक भयावह सच्चाई छिपी है—हरियाणा की प्राकृतिक धरोहरें लगातार सिकुड़ रही हैं। अरावली की पहाड़ियां टूट रही हैं, भूजल तेजी से खत्म हो रहा है, कृषि भूमि कंक्रीट के जंगलों में बदल रही है और वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक होता जा रहा है।

अरावली : हरियाणा की प्राकृतिक सुरक्षा दीवार

हरियाणा की पर्यावरणीय सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ अरावली पर्वतमाला है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह और महेंद्रगढ़ जिलों से होकर गुजरने वाली अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की जीवनरेखा है।

विशेषज्ञों के अनुसार अरावली मरुस्थलीकरण को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार का काम करती है। यदि यह पर्वतमाला कमजोर पड़ती है, तो राजस्थान का रेगिस्तान धीरे-धीरे हरियाणा और दिल्ली की ओर बढ़ सकता है। बावजूद इसके अवैध खनन, अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों ने अरावली के अस्तित्व को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

विडंबना यह है कि जिस अरावली को बचाने की आवश्यकता है, उसी के आसपास लगातार निर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है। विकास के नाम पर पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सड़कें और कॉलोनियां आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरणीय भविष्य को दांव पर लगा रही हैं।

भूजल संकट : हरियाणा का मौन आपातकाल

यदि हरियाणा के सामने कोई सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट है तो वह भूजल का लगातार गिरता स्तर है। राज्य के अधिकांश जिले ‘डार्क जोन’ की श्रेणी में पहुंच चुके हैं।

धान जैसी अत्यधिक जल-खपत वाली फसलों, शहरी विस्तार और औद्योगिक उपयोग ने भूमिगत जल भंडारों पर भारी दबाव डाला है। अनेक क्षेत्रों में जल स्तर हर वर्ष एक से दो मीटर तक नीचे जा रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में पेयजल संकट विकराल रूप ले सकता है।

दुखद तथ्य यह है कि भूजल का यह संकट दिखाई नहीं देता, इसलिए इस पर उतना सार्वजनिक दबाव भी नहीं बनता जितना बनना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हरियाणा का विकास मॉडल अपने सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन को ही समाप्त करता जा रहा है।

कंक्रीट के जंगल और घटती हरियाली

गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और पंचकूला जैसे शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने प्राकृतिक हरित क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया है।

जहां कभी खेत, तालाब और खुले क्षेत्र हुआ करते थे, वहां आज बहुमंजिला इमारतें खड़ी हैं। विकास की इस दौड़ में पेड़ों की कटाई को अक्सर एक प्रशासनिक औपचारिकता मान लिया जाता है। कुछ पौधे लगाकर हजारों पुराने वृक्षों की भरपाई का दावा किया जाता है, जबकि एक परिपक्व वृक्ष द्वारा प्रदान की जाने वाली पर्यावरणीय सेवाओं की बराबरी कोई नया पौधा दशकों तक नहीं कर सकता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसाओं की तुलना में हरियाणा के कई शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति हरित क्षेत्र अत्यंत कम है। इसका सीधा प्रभाव गर्मी, प्रदूषण और जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

गुरुग्राम : विकास की चमक के पीछे छिपता पर्यावरणीय संकट

गुरुग्राम आज भारत के सबसे आधुनिक और तेजी से विकसित होते शहरों में गिना जाता है। गगनचुंबी इमारतें, कॉर्पोरेट कार्यालय, चौड़ी सड़कें और रियल एस्टेट परियोजनाएं इसकी पहचान बन चुकी हैं। लेकिन विकास की इस चकाचौंध के पीछे पर्यावरणीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। एक समय जो क्षेत्र अरावली की प्राकृतिक हरियाली, जोहड़ों और कृषि भूमि के लिए जाना जाता था, वह आज कंक्रीट के विस्तार से जूझ रहा है। शहर में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, गर्मियों में तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक दर्ज किया जाता है और बरसात के दिनों में जलभराव की समस्या यह संकेत देती है कि प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा है। गुरुग्राम की वायु गुणवत्ता भी वर्ष के अधिकांश समय चिंताजनक बनी रहती है। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो यह शहर आर्थिक प्रगति का प्रतीक होने के साथ-साथ पर्यावरणीय अव्यवस्था का उदाहरण भी बन सकता है।

प्रदूषण : विकास की सबसे महंगी कीमत

हरियाणा के अनेक शहर आज देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल रहते हैं। वाहन, उद्योग, निर्माण गतिविधियां और फसल अवशेषों का धुआं मिलकर वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

सर्दियों में गुरुग्राम, फरीदाबाद और बहादुरगढ़ जैसे क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर कई बार खतरनाक श्रेणी में पहुंच जाता है। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं बल्कि लाखों नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि विकास मॉडल की असंतुलित सोच का परिणाम है।

क्या है न्यायसंगत विकल्प?

विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। हरियाणा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम अत्यंत आवश्यक हैं—

अरावली संरक्षण के लिए विशेष कानून

अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार के अवैध खनन और निर्माण पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए तथा संवेदनशील क्षेत्रों को पूर्ण संरक्षण प्रदान किया जाए।

भूजल पुनर्भरण को जनआंदोलन बनाया जाए

वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाया जाए और जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामाजिक अभियान का रूप दिया जाए।

शहरी हरित क्षेत्र बढ़ाए जाएं

हर नए शहरी विकास प्रोजेक्ट में न्यूनतम हरित क्षेत्र सुनिश्चित किया जाए तथा पुराने वृक्षों के संरक्षण को कानूनी प्राथमिकता दी जाए।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को मजबूत बनाया जाए

बड़ी परियोजनाओं की स्वीकृति केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखकर दी जाए।

निष्कर्ष

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हरियाणा आज जिस विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है, वहां आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य हो गया है।

यदि अरावली कमजोर होती रही, भूजल समाप्त होता रहा और हरियाली कंक्रीट के नीचे दबती रही, तो आने वाली पीढ़ियों को विकास की उपलब्धियों से अधिक पर्यावरणीय संकटों की विरासत मिलेगी।

प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है; वह उसकी सबसे बड़ी साझेदार है। आवश्यकता इस बात की है कि हरियाणा विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का नया मॉडल प्रस्तुत करे। क्योंकि अंततः कोई भी अर्थव्यवस्था प्रकृति से बड़ी नहीं हो सकती, और कोई भी विकास उस भविष्य से मूल्यवान नहीं हो सकता जिसमें जीवन ही संकट में पड़ जाए।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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