उमेश कुमार साहू

सृष्टि के विस्तार में यदि कोई तत्व शाश्वत, निर्विकार और स्वयंभू है तो वह ‘मातृत्व’ है। यह केवल एक जैविक संबंध नहीं, बल्कि एक दार्शनिक चेतना है। वैदिक ऋचाओं से लेकर आधुनिक कविताओं तक, माँ को ‘धरा’ कहा गया है—वह जो सहती है, जो अंकुरित करती है और जो अंततः सब कुछ स्वयं में समेट लेती है। आज जब हम ‘मातृ दिवस’ के उपलक्ष्य में शब्दों के अर्घ्य अर्पित कर रहे हैं, तो हमें इस उत्सव के शोर से इतर उस मौन तपस्या को समझना होगा, जो एक स्त्री के ‘माँ’ बनने के साथ शुरू होती है और उसके अस्तित्व के विलीनीकरण तक जारी रहती है।
मातृत्व : एक आध्यात्मिक और दार्शनिक विमर्श
भारतीय दर्शन में ‘शक्ति’ को जगत जननी माना गया है। माँ केवल वह नहीं है जो जन्म देती है, वह वह ‘कुम्भकार’ है जो गीली मिट्टी जैसी संतान को संस्कारों की आंच में पकाकर ‘पात्र’ बनाती है। किसी वरिष्ठ साहित्यकार की दृष्टि से देखें तो माँ एक ‘मेटाफर’ (रूपक) है—निस्वार्थता का।
आधुनिक मनोविज्ञान जिसे ‘अनकंडीशनल लव’ कहता है, वह हमारे लोकजीवन में सदियों से ‘ममता’ के रूप में प्रवाहित है। विचारणीय यह है कि जिस माँ ने अपनी देह से रक्त और अस्थियाँ देकर एक नया जीवन रचा, क्या हम उसे केवल एक ‘रिश्ते’ के खांचे में बांध सकते हैं? नहीं, वह एक जीवंत पाठशाला है जहाँ करुणा, धैर्य और त्याग का पाठ बिना किसी ब्लैकबोर्ड के पढ़ाया जाता है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य : उत्सव बनाम यथार्थ
आज के समय में मातृ दिवस का स्वरूप कुछ ‘बाज़ारवादी’ हो गया है। अखबारों के संपादकीय स्तंभों और साहित्यानुरागियों के बीच यह चर्चा का विषय है कि क्या एक दिन का ‘स्टेटस’ उस जीवनभर के ‘स्टेटस’ का विकल्प हो सकता है जो माँ ने हमें समाज में दिलाया है?
· बदलता सामाजिक ढांचा: संयुक्त परिवारों के बिखरने और एकल परिवारों के उदय ने माँ की भूमिका को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। आज की माँ एक ओर ‘करियर’ की प्रतिस्पर्धा में है, तो दूसरी ओर वह अपने बच्चों में उन जड़ों को सींचने का प्रयास कर रही है जो कंक्रीट के जंगलों में सूखती जा रही हैं।
· अकेलेपन का दंश: महानगरीय संस्कृति में जहाँ ‘डे’ मनाने का चलन सबसे ज्यादा है, वहीं वृद्धाश्रमों के आँकड़े सबसे अधिक भयावह हैं। यह एक बौद्धिक विडंबना है कि हम माँ की महिमा पर लेख तो उत्कृष्ट लिखते हैं, लेकिन उनके एकाकीपन की व्याधि को पढ़ने में असफल रहते हैं।
साहित्य और कविता में माँ की छवि
साहित्य में माँ को ‘आदि-काव्य’ कहा गया है। एक लेखक जब कलम उठाता है, तो वह पाता है कि माँ पर लिखना वास्तव में स्वयं की जड़ों को टटोलना है।
“माँ वह कविता है, जिसे विधाता ने सबसे फुर्सत के क्षणों में लिखा होगा।”
आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि माँ केवल वह नहीं जो रसोई के धुएं में अपनी आँखें जलाती है, बल्कि वह वह चेतना है जो संकट के समय हमारे भीतर ‘ढाल’ बनकर खड़ी हो जाती है। वह हमारे व्यक्तित्व का वह अदृश्य हिस्सा है, जो तब भी बोलता है जब हम चुप होते हैं।
विचारणीय प्रश्न: क्या हम कृतज्ञ हैं या केवल औपचारिक?
एक विचारशील लेख का उद्देश्य केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि झकझोरना भी होता है। हमें आत्म-मंथन करना चाहिए:
1. क्या हम माँ को एक ‘इंसान’ के रूप में स्वीकार करते हैं, जिसकी अपनी थकावट और अपनी कुंठाएं हो सकती हैं?
2. क्या हम ‘मातृ देवो भव’ के मंत्र को ड्राइंग रूम की दीवारों से निकालकर अपने आचरण में ला पाए हैं?
विद्वानों का मत है कि माँ को ‘देवी’ बनाकर हमने उसे एक ऊँचे आसन पर तो बैठा दिया, लेकिन उसकी मानवीय जरूरतों और अधिकारों को गौण कर दिया। उसे देवी नहीं, एक ‘सहचर’ और ‘आदरणीय मार्गदर्शक’ के रूप में देखना ही सच्ची सार्थकता होगी।
निष्कर्ष : शाश्वत सत्ता को नमन
अंततः, मातृ दिवस का संदेश उपहारों या सोशल मीडिया की चकाचौंध में नहीं, बल्कि उस ‘मौन संवाद’ में है जो एक संतान अपनी माँ के साथ करती है। वह हमारे अस्तित्व की वह नींव है जो दिखती नहीं, लेकिन पूरे मकान का भार उठाए रखती है।
अखबार के पन्नों से लेकर इतिहास की किताबों तक, सभ्यताएं माँ के त्याग पर टिकी हैं। आज का दिन उस आदि-शक्ति के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर उनके चरणों की धूल को माथे पर लगाने का है, ताकि हमारे भीतर की मनुष्यता जीवित रहे।









