अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस विशेष : परिवार से ही है रिश्तों की  गर्माहट ! 

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डॉ. घनश्याम बादल

मानव सभ्यता के विकास का इतिहास इस बात का साक्षी है कि मनुष्य ने सबसे पहले जिस सामाजिक संस्था को जन्म दिया, वह परिवार था। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संस्कारों, विश्वास, सुरक्षा और सहयोग का जीवंत संसार है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 15 मई को “अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस” मनाया जाता है।

आज जब दुनिया तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में तेजी से आगे बढ़ रही है, तब यह दिवस हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता अब भी रिश्तों की गर्माहट ही है। वर्तमान समय में मनुष्य दो दुनियाओं में जी रहा है—एक आभासी दुनिया और दूसरी व्यवहारिक दुनिया। आभासी दुनिया अर्थात सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट का संसार, जहां हजारों “फॉलोअर” और “फ्रेंड” दिखाई देते हैं; जबकि व्यवहारिक दुनिया वह है जहां वास्तविक संबंध, संवेदनाएं और मानवीय स्पर्श मौजूद होते हैं।

विडंबना यह है कि तकनीक ने दूरियों को कम करने का दावा किया, लेकिन सच तो यह है कि इसने दिलों की दूरियां बढ़ा दीं। एक ही घर में बैठे लोग मोबाइल स्क्रीन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि आपसी संवाद कम होता जा रहा है। परिवार साथ रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ता दिखाई देता है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार का महत्व और भी बढ़ जाता है।

परिवार व्यवहारिक दुनिया की वह सच्चाई है जो आभासी दुनिया के कृत्रिम आकर्षण के बीच मनुष्य को वास्तविकता से जोड़े रखती है। सोशल मीडिया पर मिलने वाली “लाइक” और “कमेंट” क्षणिक संतोष दे सकते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में सहारा देने वाला हाथ केवल परिवार का ही होता है। इंटरनेट की दुनिया सूचना दे सकती है, परंतु आत्मीयता नहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सलाह दे सकती है, लेकिन मां के स्पर्श जैसी शांति नहीं दे सकती। यही कारण है कि आधुनिक जीवन में परिवार की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाने का मूल उद्देश्य समाज को परिवार संस्था के प्रति जागरूक करना है। तेज़ी से बदलती जीवनशैली, बढ़ती व्यक्तिवादी सोच और तकनीकी निर्भरता के कारण परिवारों में विघटन बढ़ रहा है। अकेलापन, अवसाद, तनाव, बुजुर्गों की उपेक्षा और बच्चों में असुरक्षा जैसी समस्याएं लगातार गंभीर होती जा रही हैं।

परिवार मनुष्य की पहली पाठशाला है। बच्चा बोलना, चलना, व्यवहार करना, सम्मान देना, प्रेम करना और अनुशासन सीखना परिवार से ही सीखता है। माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन और अन्य सदस्य केवल रिश्तेदार नहीं होते, बल्कि जीवन के पहले शिक्षक होते हैं। आज जब बच्चे वास्तविक खेल के मैदानों से अधिक मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताने लगे हैं, तब परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह उन्हें मानवीय मूल्यों और सामाजिक व्यवहार से जोड़े रखे।

आभासी दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वहां संबंधों की गहराई कम और प्रदर्शन अधिक होता है। लोग अपनी खुशियों का प्रदर्शन तो करते हैं, लेकिन अपने दर्द को छिपाते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति धीरे-धीरे भीतर से अकेला होता जाता है। मानसिक तनाव और अवसाद की बढ़ती घटनाएं इसी सामाजिक विघटन का संकेत हैं। ऐसे समय में परिवार ही वह स्थान है जहां व्यक्ति बिना किसी दिखावे के स्वयं को व्यक्त कर सकता है। परिवार मनुष्य को यह विश्वास देता है कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, कुछ रिश्ते ऐसे हैं जो बिना शर्त उसके साथ खड़े रहेंगे।

परिवार का टूटना और बिखरना आज समाज के सामने गंभीर समस्या है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि बुजुर्गों के लिए पारिवारिक सहारा कमजोर पड़ रहा है। बच्चों में बढ़ती आक्रामकता, नशे की प्रवृत्ति और मानसिक अस्थिरता भी कहीं न कहीं पारिवारिक विघटन से जुड़ी हुई है। जब व्यक्ति को परिवार का भावनात्मक संरक्षण नहीं मिलता, तब वह भीतर से असुरक्षित हो जाता है। यही असुरक्षा समाज में हिंसा, अपराध और असंवेदनशीलता के रूप में दिखाई देती है।

भारतीय संस्कृति में परिवार को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दृष्टि का आधार है। यहां परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची और पड़ोस तक उसका विस्तार दिखाई देता रहा है। संयुक्त परिवार भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति माने जाते थे। इनमें आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ भावनात्मक सहयोग भी मिलता था, बच्चे संस्कार सीखते थे और संकट के समय पूरा परिवार एकजुट होकर खड़ा रहता था।

हालांकि आधुनिक समय में एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है। रोजगार, शिक्षा और शहरीकरण के कारण लोगों को छोटे परिवारों में रहना पड़ रहा है। एकल परिवारों के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं, जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निर्णय लेने में सुविधा और सीमित जिम्मेदारियां। लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हैं। एकल परिवारों में बच्चों को दादा-दादी का स्नेह नहीं मिल पाता, बुजुर्ग अकेले पड़ जाते हैं और पति-पत्नी पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है। कई बार छोटी समस्याएं भी बड़े तनाव का कारण बन जाती हैं क्योंकि सहारा देने वाला विस्तृत पारिवारिक ढांचा अनुपस्थित होता है।

इसके विपरीत संयुक्त परिवारों में सामूहिकता की भावना अधिक होती है। वहां जिम्मेदारियां साझा की जाती हैं और कठिन परिस्थितियों का सामना मिलकर किया जाता है।

आज के संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि परिवारों को कैसे जोड़े रखा जाए। इसका सबसे सरल उत्तर है—संवाद। परिवार में संवाद समाप्त होते ही दूरी शुरू हो जाती है। व्यस्तता कितनी भी हो, परिवार के साथ समय बिताना आवश्यक है। साथ बैठकर भोजन करना, त्योहार मनाना, बुजुर्गों का सम्मान करना और बच्चों की बातें ध्यान से सुनना—ये छोटे-छोटे कदम परिवार को मजबूत बनाते हैं।

बुजुर्गों की भूमिका भी आज अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे परिवार की स्मृतियों, संस्कारों और अनुभवों के संरक्षक होते हैं। जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहां बच्चों में संवेदनशीलता और नैतिकता स्वतः विकसित होती है। उसी प्रकार महिलाओं की भूमिका परिवार को जोड़ने में केंद्रीय होती है।

परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई होते हुए भी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। मजबूत परिवार ही स्वस्थ समाज और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करते हैं। जब परिवारों में प्रेम, विश्वास और सहयोग होगा, तभी समाज में शांति और मानवीयता कायम रह सकेगी। परिवार हमें केवल रिश्ते नहीं देता, बल्कि जीवन को अर्थ देता है।

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Author: Bharat Sarathi

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