सत्ता की प्रतिष्ठा बनते स्थानीय चुनाव
सतवंती नेहरा

गुरुग्राम/चंडीगढ़ – हरियाणा में चल रहे निकाय चुनाव अब केवल नगर निगम, परिषद या पालिका के प्रतिनिधियों के चुनाव भर नहीं रह गए हैं। ये चुनाव धीरे-धीरे सत्ता की प्रतिष्ठा, राजनीतिक वर्चस्व और भविष्य की दिशा तय करने वाले संघर्ष में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक दल अपनी जीत को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं, जबकि लोकतंत्र का वास्तविक प्रश्न यह होना चाहिए कि इन चुनावों से जनता को क्या मिलेगा, शहरों और कस्बों का कितना विकास होगा और आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर बनेगा।
निकाय चुनावों की आत्मा स्थानीय समस्याओं और स्थानीय विकास में बसती है। सड़कें टूटी हों, सीवर जाम हों, सफाई व्यवस्था चरमराई हो, पीने का पानी संकट में हो, स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हों और नागरिक सुविधाएं बदहाल हों, तो चुनाव का केंद्र इन्हीं विषयों को होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि स्थानीय मुद्दे राजनीतिक नारों और शक्ति प्रदर्शन की भीड़ में कहीं गुम हो गए हैं।
स्थानीय समस्याएं गायब, बड़े राजनीतिक भाषण हावी
पंचकूला जैसे छोटे निकाय चुनावों में मुख्यमंत्री के लगातार दौरे यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि सत्ता इन चुनावों को केवल स्थानीय लोकतंत्र का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन मान रही है। मंचों से राष्ट्रीय उपलब्धियों और प्रदेश स्तर की योजनाओं का बखान तो खूब होता है, लेकिन स्थानीय समस्याओं का जिक्र तक नहीं किया जाता।
जनता पूछ रही है कि जिन गलियों में पानी भरता है, जिन मोहल्लों में सफाई व्यवस्था दम तोड़ चुकी है, जिन बाजारों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, आखिर उन विषयों पर चर्चा कब होगी? क्या निकाय चुनाव अब स्थानीय जनता की जरूरतों से कटकर केवल सत्ता के प्रचार अभियान बनकर रह गए हैं?
असंतोष की आग : हर वर्ग बेचैन
इन चुनावों के बीच सबसे बड़ा और गंभीर पक्ष वह व्यापक असंतोष है, जो हर वर्ग में दिखाई दे रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आंदोलनरत हैं। नगर निगम और पालिका कर्मचारी हड़तालों पर बैठे हैं। किसान अपनी मांगों को लेकर नाराज हैं। कर्मचारी वर्ग में असंतोष गहराता जा रहा है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग भी विरोध में हैं। आशा वर्कर, सफाई कर्मचारी और विभिन्न विभागों के कर्मचारी लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
स्थिति यह है कि व्यवस्था का लगभग हर पहिया किसी न किसी रूप में असंतोष व्यक्त कर रहा है। सवाल यह नहीं कि कौन नाराज है, बल्कि सवाल यह है कि आखिर कौन संतुष्ट है?
यह असंतोष केवल वेतन, सुविधाओं या मांगों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वह भावना भी छिपी है कि सरकार जनता और कर्मचारियों की बात सुनने के बजाय केवल चुनावी गणित में व्यस्त हो चुकी है।
वोट की दिशा तय करेगी हरियाणा की राजनीति
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह असंतुष्ट वर्ग चुनावों में किस दिशा में जाएगा? लोकतंत्र में नाराज जनता अंततः अपने मत से ही जवाब देती है। निकाय चुनावों के परिणाम केवल मेयर या पार्षद तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि हरियाणा की राजनीति आने वाले समय में किस दिशा में बढ़ेगी।
यदि असंतोष सत्ता के खिलाफ मतदान में बदलता है तो यह भविष्य की बड़ी राजनीतिक चेतावनी होगी। और यदि सत्ता पक्ष इस असंतोष के बावजूद चुनाव जीत जाता है, तब भी कई गंभीर प्रश्न समाप्त नहीं होंगे।
सत्ता के प्रतिनिधि या जनता की आवाज?
यदि सत्ता समर्थित उम्मीदवार जीतते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि वे वास्तव में जनता के प्रतिनिधि होंगे या सत्ता के? क्योंकि टिकट सत्ता देती है, चुनावी संसाधन सत्ता उपलब्ध कराती है और राजनीतिक दबाव भी सत्ता का ही होता है।
ऐसे में क्या जनप्रतिनिधि जनता की पीड़ा को शासन तक पहुंचाने का साहस कर पाएंगे? या फिर वे केवल सत्ता की प्रशंसा और चाटुकारिता तक सीमित होकर रह जाएंगे?
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का पहला दायित्व जनता के प्रति होता है, न कि सत्ता के प्रति। लेकिन जब राजनीति में जीत ही अंतिम लक्ष्य बन जाए, तब जनता का हित अक्सर पीछे छूट जाता है।
जनता में बढ़ती असुरक्षा और अकेलेपन की भावना
आज आम नागरिक के भीतर एक गहरी बेचैनी दिखाई देती है। जनता का एक बड़ा वर्ग स्वयं को असुरक्षित, उपेक्षित और अकेला महसूस कर रहा है। लोगों के मन में यह भावना लगातार मजबूत हो रही है कि उनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है।
यदि लोकतंत्र में जनता को ही यह महसूस होने लगे कि उसका कोई संरक्षक नहीं, तो यह केवल राजनीतिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक विश्वास का संकट भी बन जाता है। ऐसी परिस्थितियां व्यवस्था और जनता के बीच खतरनाक दूरी पैदा करती हैं।
‘ट्रिपल इंजन’ का नारा और जनता के सवाल
इन चुनावों में एक बार फिर ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ का नारा जोर-शोर से दिया जा रहा है। लेकिन जनता यह भी देख रही है कि जहां पहले से ट्रिपल इंजन सरकारें मौजूद हैं, वहां भी लोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।
यदि विकास अपेक्षित गति से नहीं हुआ, यदि स्थानीय समस्याएं जस की तस बनी रहीं, यदि कर्मचारियों और आम नागरिकों में असंतोष बढ़ता गया, तो केवल नारों के आधार पर वोट मांगना जनता के मन में सवाल खड़े करता है।
आज की जनता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल वादे नहीं, परिणाम देखना चाहती है। उसे भाषण नहीं, बदलाव चाहिए।
चुनाव नहीं, जनता का विश्वास जीतना जरूरी
निकाय चुनावों का उद्देश्य सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि स्थानीय विकास का विस्तार होना चाहिए। चुनाव जीतना लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि जनता की सेवा का अवसर है।
हरियाणा के ये निकाय चुनाव केवल प्रतिनिधि नहीं चुनेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि आने वाले समय में राजनीति जनता के भरोसे पर चलेगी या केवल सत्ता के समीकरणों पर।
क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं, जनता का विश्वास होता है।









