झुक गया अमेरिका और शेर बन गया पाकिस्तान 

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राजेश श्रीवास्तव

4० दिन तक ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच घमासान छिड़ने के बाद सीजफायर हो गया। इस युद्ध में दो बड़ी चीजें निकल कर आयीं. एक तो दुनिया का सबसे बड़ी ताकत रखने वाला ट्रंप ईरान जैसे देश के सामने कैसे झुक गया, यह पूरी दुनिया ने देख लिया। ईरान ने दस सूत्रीय मांगे भेजी, उन सभी शर्तों पर अमेरिका ने हामी भर ली। एक तरह से कहें तो ईरान ने अपनी शर्तों पर ही समझौता किया। होर्मुज स्टेट खोला तो लेकिन अपनी मर्जी और अपने कहे पर। अमेरिका की किसी भी धमकी पर उसने घुटने नहीं टेके। और दूसरी जो अहम बात उजागर हुई वह यह कि इस पूरी महफिल को पिद्दी पाकिस्तान ने लूट लिया। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान को इसका क्रेडिट दे दिया जबकि भारत इस पर मुंह ताकता रह गया। दुनिया में विश्वगुरू बनने का ऐलान करने वाला भारत अब इस पूरे मामले पर बहुत पीछे रह गया है। दरअसल भारत सबके साथ रहता है और सबके साथ रहने का दावा करता है लेकिन किसी शख्स ने कहा है कि जो सबका होता है वह किसी का नहीं होता और इसीलिए भारत को इस पूरे मामले में कहीं किसी ने कुछ नहीं समझा। खुद ईरान ने भी कहा कि अगली 1० अप्रैल की बैठक इस्लामाबाद में होगी। 

अमेरिका-ईरान के बीच दो हफ्तों का युद्धविराम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसका ऐलान करते हुए इसे ‘विश्व शांति के लिए बड़ा दिन’ करार दिया है। अमेरिका और ईरान दोनों ने इसके पीछे पाकिस्तान की कोशिशों की तारीफ की है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में पाकिस्तान की वाहवाही हो रही है मगर, भारत में आतंक फैलाने वाला पाकिस्तान क्या वाकई में शांति का सूत्रधार है, या इसके पीछे कोई अलग ही खेल चल रहा है। यह भी सवाल उठ रहा है कि भारत क्या इस मामले में कूटनीतिक तौर पर पीछे रह गया है। 

अमेरिका-ईरान सीजफायर में पाकिस्तान की भूमिका वाकई में काबिले-तारीफ है। इस मामले में पाकिस्तान ने बढ़त बना ली है। मध्यस्थता वही करा सकता है, जिस पर दोनों पक्षों को भरोसा है। ऐसे में दुनिया में पाकिस्तान का कद बढ़ा है। खासतौर पर मुस्लिम दुनिया में। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बाकायदा पाकिस्तान का नाम लिया है, जो बड़ी बात है लेकिन यह भी सच है कि पाकिस्तान ने भले ही सीजफायर करा दिया हो, मगर वह विश्वगुरु नहीं बन सकता है क्योंकि पाकिस्तान की आर्थिक ताकत भारत जैसी नहीं है। भारत ने जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब पिछले साल ही हासिल कर लिया था। अब वह जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर हुआ है। अब इससे पाकिस्तान की दुनिया की तीनों महाशक्तियों के बीच पैठ बढ़ी है। अमेरिका, चीन और रूस तीनों से उसके ताल्लुकात गहरे हुए हैं।

इस क्षेत्र में पाकिस्तान का कद बढ़ने से भारत के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि पाकिस्तान हमेशा से भारत को नुकसान पहुंचाता रहा है। भारत में आतंकवाद फैलाता रहा है। ऐसे में वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के खिलाफ आतंकरोधी गठजोड़ बनाने की भारत की कोशिश कमजोर होगी। इन ताकतों के चलते पाकिस्तान अब खुलकर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे सकता है। जहां तक भारत के मध्यस्थता कराने की बात है, तो भारत के अमेरिका-इजरायल और ईरान तीनों से अच्छे संबंध हैं, मगर भारत ने शुरू से इंतजार करो और देखो की नीति का पालन किया है। भारत एक-एक कदम फूंककर आगे बढ़ता है। जब इस सबंध में जयशंकर से पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि भारत दलाल देश नहीं है।

अगर अमेरिका ने तुर्की, भारत, कतर और सऊदी अरब के बजाय पाकिस्तान को मध्यस्थ चुना है तो इसके पीछे कुछ बड़ी वजहें हैं- तुर्की का क्षेत्र में काफी प्रभाव है और उसकी कूटनीति बेहद एक्टिव है। भारत की वैश्विक साख काफी ज्यादा है और यह रणनीतिक रूप से स्वायत्त देश है। कतर को पहले से ही मध्यस्थता निभाने का अच्छा-खासा अनुभव रहा है। सऊदी अरब की वित्तीय ताकत काफी और क्षेत्र में उसका भी अच्छा-खासा प्रभाव है। पाकिस्तान को चुनने के पीछे की बड़ी वजह समझना होगा। पाकिस्तान का बेहद कम विदेशी विनिमय रिजर्व होना। दिवालिया होने से बचने के लिए इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड से बेलआउट पैकेज मिलना। चीन और खाड़ी देशों पर वित्तीय निर्भरता ज्यादा होना। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था बाहरी सपोर्ट पर टिकी होती है तो उसकी विदेश नीति भी सीमित होती है। यही कुछ कारण हैं जिसके चलते अमेरिका पाकिस्तान को तरजीह दे रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों  की मानें तो पाकिस्तान की कूटनीतिक मजबूती बढ़ने से भारत की एक और चिंता यह हो सकती है कि पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन 2०3० के बाद भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ सकता है, जैसा कि चीन की भारत विरोधी रणनीतियों के खुलासे से होता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी डेडलाइन खत्म होने से पहले दो हफ्ते का सीजफायर करने के पीछे ये दलील दी है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसके लिए निवेदन किया था। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट में सीजफायर के बारे में बताया। मगर, उनके पोस्ट पर ही बवाल हो गया। एक्स पर कई यूजर यह कहने लगे कि शरीफ ने जिस पोस्ट पर युद्ध रोकने की अपील की थी, उसका शुरुआती ड्रॉफ्ट अमेरिका या इजरायल ने तैयार किया था।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर को ‘प्रिय भाई’ बताते हुए उनके प्रयासों की सराहना की। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी इस भूमिका को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया। पाकिस्तान ने ही दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता तैयार किया और सीजफायर तक पहुंचने में मदद की। किसी भी देश को मध्यस्थ बनने के लिए दोनों पक्षों का भरोसा जरूरी होता है। ईरान को अपने अरब पड़ोसियों पर भरोसा नहीं है क्योंकि उनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं। पाकिस्तान का ईरान के साथ अच्छा संबंध है और दोनों देशों की सीमा भी जुड़ी हुई है। इसके अलावा पाकिस्तान के इजरायल से राजनयिक संबंध नहीं हैं जो ईरान के लिए भरोसे की बड़ी वजह है। वहीं, अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान के संबंध पिछले कुछ समय में बेहतर हुए हैं। असीम मुनीर के अमेरिका और ईरान दोनों के रक्षा तंत्र में संपर्क होने से पाकिस्तान को इस भूमिका में बढ़त मिली।

 पाकिस्तान का सीजफायर के लिए प्रयास केवल कूटनीतिक भूमिका तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके अपने हित भी जुड़े थे। देश अपनी ऊर्ज़ा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर काफी निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ीं, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा। इसके अलावा बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा भी अहम मुद्दा है। देश पहले से आर्थिक संकट और अफगानिस्तान के साथ तनाव का सामना कर रहा है, ऐसे में एक और अस्थिर पड़ोसी उसके लिए नुकसानदेह होता। हालांकि, यह युद्धविराम अभी काफी नाजुक माना जा रहा है। अगर यह समझौता टूटता है, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक साख को बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान के पास इतना सामरिक प्रभाव नहीं है कि वह इस सीजफायर को लागू करा सके। अगर फिर से संघर्ष शुरू होता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में फिलहाल पाकिस्तान को कूटनीतिक सफलता जरूर मिली है लेकिन आने वाले समय में इस समझौते की सफलता ही उसकी असली परीक्षा होगी।

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Author: Bharat Sarathi

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