प्रदीप कुमार वर्मा

सदियों से गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को विदेशी शासकों की दासता से मुक्त कराने के लिए सबसे पहले आजादी का बिगुल फूंकने वाले शख्स का नाम मंगल पांडे है। वर्ष 1857 में पंडित मंगल पांडे अपने राष्ट्र धर्म की पालना करते हुए आजादी की अलग जगा दी थी। सैकड़ों साल पहले मंगल पांडे द्वारा आजादी की जो चिंगारी जलाई वह 1947 में एक ज्वाला बनी, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत को भारत छोड़ना पड़ा था और भारत मां गुलामी की बेड़ियों से आजाद हो गई। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक मंगल पांडे की आज शहादत का दिन है। आज ही के दिन अंग्रेजी हुकूमत में मंगल पांडे को फांसी की सजा दी थी। इस ऐतिहासिक घटना को भले ही सैकड़ों साल बीत चुके हैं और देश आजाद भी हो चुका है लेकिन अमर शहीद मंगल पांडे भारतीयों के दिलों में भी आज भी जिंदा है और देशवासी उन्हें नम आंखों से नमन भी कर रहे हैं।
अमर शहीद मंगल पांडे का जन्म 30 जनवरी 1831 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। इनके पिता दिवाकर पांडे तथा माता अभय रानी थी। इसे तत्कालीन परिस्थिति कहे या मां भारती की पुकार, जिसके चलते उच्च ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मंगल पांडे को अपनी आजीविका के लिए वर्ष 1849 में महज 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती होना पड़ा। ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वार्थी नीतियों के कारण मंगल पांडे के मन में अंग्रेजी हुकुमत के प्रति पहले ही नफरत थी। जब कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में ‘एनफील्ड पी.53’ राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ तो इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। तब छावनी सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है जो कि हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए गंभीर और धार्मिक विषय था। तब यह नफरत आजादी के जज्बे में बदल गई।
फिर क्या था, इस खबर ने भारतीय सैनिकों के मन में अंग्रेजी सेना के विरूद्ध अघोषित आक्रोश पैदा कर दिया। इसके बाद जब 9 फरवरी 1857 को यह कारतूस देशी पैदल सेना को बांटा गया, तब मंगल पांडे ने यह कारतूस नहीं लिए। इस बात से गुस्साए अंग्रेज अफसर द्वारा मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लेने और वर्दी उतरवाने का आदेश दिया, जिसे मानने से मंगल पांडे ने इनकार कर दिया। हालात से गुस्साए मंगल पांडे ने राइफल छीनने के लिए आगे बढ़ने वाले अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन पर आक्रमण कर उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद पांडे ने उनके रास्ते में आए एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉब को भी मौत के घात उतार दिया। अमर शहीद मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया, और फिर समूचे भारत मे शुरू हुई आजादी की जंग।
इस घटना के बाद उन्हें अंग्रेज सिपाहियों द्वारा गिरफ्तार किया गया और उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 को फांसी की सजा सुना दी गई। फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी लेकिन अंग्रेजों द्वारा मंगल पांडे को दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी दे दी गई। मंगल पांडे द्वारा विद्रोह किए जाने के एक महीने बाद ही 10 मई को मेरठ की सैनिक छावनी में भी बगावत हुई और यह विद्रोह देखते-देखते पूरे उत्तर भारत में फैल गया। मंगल पांडे की शहादत की खबर फैलते ही अंग्रेजों के खिलाफ जगह-जगह संघर्ष भड़क उठा। हालांकि तब अंग्रेजी हुकूमत इसे काबू करने में कामयाब रही लेकिन मंगल पांडे द्वारा लगाई गई यह चिंगारी ही आजादी की लड़ाई का मूल बीज साबित हुई। यह चिंगारी बुझी नहीं और अंतत: 1947 में अंग्रेजों को वापस जाना ही पड़ा।
वैसे तो भारतीय स्वाधीनता संग्राम की गाथा बहुत विशाल है और आजादी की लड़ाई में कई शहीदों ने अपने साथ दी है। लेकिन यह सर्वमान्य सत्य है कि मंगल पांडे को प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक माना जाता है। मंगल पांडे के जीवन के पर फिल्म और नाटक भी प्रदर्शित हुए हैं और उन पर कई पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं। वर्ष 2005 में केतन मेहता के निर्देशन में प्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान द्वारा अभिनित ‘मंगल पांडे: द राइजिंग’ प्रदर्शित हुई थी। इसी वर्ष ही ‘द रोटी रिबेलियन’ नामक नाटक का भी मंचन किया गया। जेडी स्मिथ के प्रथम उपन्यास ‘वाइट टीथ’ में भी मंगल पांडे का जिक्र है। भारत सरकार ने भी अमर शहीद मंगल पांडे की स्मृति में वर्ष 1984 में मंगल पांडे के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया। लेकिन शहीदों के प्रति सम्मान और समर्पण का भाव उनकी शहादत की सच्ची कीमत है, जो अमर शहीद मंगल पांडे के प्रति आज भी हर भारतीय के दिल में कायम है।









