एल्गोरिदम, डेटा और माइक्रोटार्गेटिंग के जरिए नागरिकों की सोच को चुपचाप प्रभावित करने का बढ़ता खतरा
डॉ. शैलेश शुक्ला

लोकतंत्र की आत्मा उस क्षण कमजोर हो जाती है, जब कोई नागरिक यह मानकर अपनी राय बनाता है कि वह स्वतंत्र रूप से सोच रहा है, जबकि उसके विचारों को अदृश्य तरीके से आकार दिया जा चुका होता है। डिजिटल युग में राजनीतिक प्रचार का सबसे खतरनाक स्वरूप वही है जो दिखाई नहीं देता—जो एल्गोरिदम की परतों, डेटा विश्लेषण की सुरंगों और व्यक्तिगत अनुभव की बारीकियों में छिपा रहता है। यही “अदृश्य राजनीतिक एजेंडा” आज राजनीति का सबसे प्रभावी, लेकिन सबसे कम समझा गया औज़ार बन चुका है।
फेसबुक, यूट्यूब, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे मंच अब केवल सूचना के माध्यम नहीं रहे। ये प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता के लिए एक “व्यक्तिगत वास्तविकता” का निर्माण करते हैं। यह वास्तविकता उसके व्यवहार, पसंद, सामाजिक दायरे और लोकेशन के आधार पर तैयार होती है। इसी प्रक्रिया को “फिल्टर बबल” कहा जाता है—एक ऐसा डिजिटल घेरा, जिसमें व्यक्ति केवल वही देखता है जो उसकी मौजूदा सोच को मजबूत करे।
2016 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव इस अदृश्य एजेंडे का सबसे चर्चित उदाहरण रहा। कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण ने यह उजागर किया कि कैसे लाखों उपयोगकर्ताओं के डेटा का इस्तेमाल उनकी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों के आधार पर राजनीतिक संदेश देने के लिए किया गया। इस तकनीक को “साइकोग्राफिक टार्गेटिंग” कहा जाता है, जिसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि डेटा अब सिर्फ तकनीकी संसाधन नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का नया स्रोत है।
भारत में यह चुनौती और अधिक जटिल है। देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म राजनीतिक संवाद का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। बंद समूहों में प्रसारित होने वाली राजनीतिक सामग्री न तो किसी एल्गोरिदमिक निगरानी से गुजरती है और न ही तथ्य-परीक्षण से। परिणामस्वरूप, यह प्रचार तंत्र तेज़, व्यापक और कई बार भ्रामक भी हो सकता है।
इस परिघटना का एक और पहलू “एस्ट्रोटर्फिंग” है—यानी नकली जनमत का निर्माण। हजारों बॉट अकाउंट मिलकर किसी मुद्दे को ट्रेंड करा देते हैं, विरोधी विचारों को दबा देते हैं और एक कृत्रिम सहमति का माहौल बना देते हैं। इसी तरह “इको चेंबर” प्रभाव के कारण व्यक्ति केवल समान विचारों के बीच घिर जाता है, जिससे उसकी आलोचनात्मक सोच कमजोर होती जाती है।
यूट्यूब का रेकमेंडेशन एल्गोरिदम भी इस संदर्भ में चर्चा में रहा है। कई विशेषज्ञों ने बताया है कि यह एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को धीरे-धीरे अधिक उत्तेजक और विभाजनकारी सामग्री की ओर धकेलता है, क्योंकि ऐसी सामग्री अधिक “एंगेजमेंट” पैदा करती है। इसका परिणाम यह होता है कि सामान्य रुचि से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे चरम विचारों तक पहुंच सकता है।
माइक्रोटार्गेटिंग इस पूरे तंत्र का सबसे परिष्कृत रूप है। इसमें अलग-अलग समूहों को अलग-अलग संदेश दिए जाते हैं—और ये संदेश सार्वजनिक जांच से बाहर रहते हैं। एक ही नेता अलग समुदायों के सामने अलग-अलग वादे करता है, और यह प्रक्रिया पारदर्शिता से परे रहती है।
डिजिटल कंपनियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। कई मामलों में यह सामने आया है कि कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म के दुष्प्रभावों से अवगत होते हुए भी व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता देती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और नीतिगत भी है।
हालांकि कुछ देशों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं। यूरोपीय संघ का “डिजिटल सर्विसेज एक्ट” प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास है, लेकिन भारत में अभी भी व्यापक और प्रभावी नियमन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
इस चुनौती का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है। “मीडिया साक्षरता” यानी डिजिटल कंटेंट को समझने और परखने की क्षमता आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। जब तक नागरिक यह नहीं समझेंगे कि उन्हें क्या और क्यों दिखाया जा रहा है, तब तक वे इस अदृश्य एजेंडे के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकते।
अंततः यह मुद्दा लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा है। जब डिजिटल मंच यह तय करने लगें कि नागरिक क्या देखेगा, क्या सोचेगा और किससे प्रभावित होगा, तब यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं रहता—यह स्वतंत्रता के मूल स्वरूप को चुनौती बन जाता है। इस अदृश्य एजेंडे से मुकाबला सरकार, समाज और नागरिक—तीनों की साझा जिम्मेदारी है।






