नये शिक्षा सत्र में अभिभावकों पर बढ़ा आर्थिक बोझ: गुरुग्राम में किताब–ड्रेस को लेकर उठे सवाल

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

— कांग्रेस कार्यकर्ता एवं समाजसेवी सतवंती नेहरा ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की

गुरुग्राम, 3 अप्रैल। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही गुरुग्राम में अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ने के आरोप तेज हो गए हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता एवं समाजसेवी सतवंती नेहरा ने शहर की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि किताबों और स्कूल ड्रेस के नाम पर अभिभावकों का शोषण किया जा रहा है।

सतवंती नेहरा के अनुसार, कई निजी स्कूल अभिभावकों को तय बुक डिपो से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे उन्हें मनमाने दाम चुकाने पड़ते हैं। उनका कहना है कि जहां NCERT की किताबें सस्ती और मानक आधारित होती हैं, वहीं निजी प्रकाशकों की किताबें 10 से 15 गुना तक महंगी बेची जा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें स्कूल प्रबंधन और प्रकाशकों के बीच कमीशन का खेल चलता है।

ड्रेस के मुद्दे पर भी उन्होंने कहा कि हर साल यूनिफॉर्म में बदलाव कर दिया जाता है, जिससे अभिभावकों को नई ड्रेस खरीदनी पड़ती है। यह ड्रेस भी अक्सर निर्धारित दुकानों से ही लेने के लिए कहा जाता है, जहां कीमत अधिक और गुणवत्ता संतोषजनक नहीं होती।

हालांकि, इस पूरे मामले में स्कूल प्रबंधन का पक्ष भी सामने आया है। स्कूलों का कहना है कि निजी स्कूलों को फीस, एनुअल चार्जेज और अन्य खर्च लेने की अनुमति सरकार द्वारा दी गई है। इन सभी मदों का विवरण हर साल फॉर्म-6 के माध्यम से स्कूल अपनी वेबसाइट पर अपलोड करते हैं और रिकॉर्ड में दिखाते हैं। उनका दावा है कि सरकार की ओर से इस पर कोई सख्त पाबंदी नहीं है, इसलिए वे नियमों के तहत ही शुल्क और अन्य खर्च वसूल रहे हैं।

इसके बावजूद सतवंती नेहरा का कहना है कि नियमों की आड़ में अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर अभिभावकों को खुले बाजार से किताबें और ड्रेस खरीदने की स्वतंत्रता क्यों नहीं दी जाती?

उन्होंने शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन से मांग की कि जल्द से जल्द इस मुद्दे पर संज्ञान लिया जाए और स्कूल प्रबंधन के साथ बैठक कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके।

निष्कर्ष:
गुरुग्राम में शिक्षा के नाम पर बढ़ते खर्च और व्यवस्थागत खामियों को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर स्कूल प्रबंधन नियमों का हवाला दे रहा है, तो दूसरी ओर अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता इसे आर्थिक शोषण बता रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें